Friday, July 10, 2026
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Justice Delay: 11 साल से लंबित कमर्शियल सूट की कछुआ चाल पर तल्खी…एक घोंघा भी इस मुकदमे की रफ्तार पर सवाल उठा सकता है

Justice Delay: देश में व्यावसायिक और व्यापारिक मुकदमों (Commercial Suits) के निपटारे में होने वाली अत्यधिक देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणी की है।

लेविटेट मोबाइल टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट में पिछले 11 साल से लंबित एक कमर्शियल सूट की कछुआ चाल की कड़ी आलोचना की। अदालत ने यह टिप्पणी लेविटेट मोबाइल टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड (LMT) की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें कंपनी ने स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक (SCB) के खिलाफ चल रहे मुकदमे के बीच में नए अतिरिक्त दस्तावेज (Additional Documents) रिकॉर्ड पर शामिल करने की अनुमति मांगी थी।

वर्ष 2015 में दायर याचिका पर अभी कलमबंद हो रहे बयान

अदालत ने कहा, यह मुकदमा साल 2015 में दायर किया गया था और आज 2026 में भी वादी (Plaintiff) के गवाहों के बयान और सबूत दर्ज करने की प्रक्रिया ही चल रही है। हम यह कहने पर मजबूर हैं कि एक घोंघा (Snail) भी इस मुकदमे की कछुआ गति पर सवाल उठा सकता है। जब हम इस हकीकत की तुलना ‘कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट’ (Commercial Courts Act) के मूल विधायी इरादे और व्यावसायिक मुकदमों में होने वाली देरी की बीमारी को ठीक करने के उद्देश्य से करते हैं, तो दोनों के बीच का अंतर बेहद चौंकाने वाला और निराशाजनक दिखाई देता है।”

मामला क्या है?: 2013 का एग्रीमेंट और 11 साल लंबी कानूनी लड़ाई

यह पूरा विवाद टेक्नोलॉजी सेक्टर और बैंकिंग क्षेत्र के दो दिग्गजों के बीच का है।

अनुबंध (Agreement): फरवरी 2013 में लेविटेट मोबाइल (LMT) और स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक (SCB) के बीच एक प्रोफेशनल सर्विसेज एग्रीमेंट हुआ था, जिसके तहत LMT को बैंक के लिए एक मोबाइल एप्लिकेशन विकसित और प्रबंधित करना था।

विवाद की शुरुआत: ऐप को एंड्रॉइड और आईओएस (iOS) पर लॉन्च किया गया, लेकिन बाद में बैंक ने इसे हटाने (Take down) का निर्देश दे दिया। LMT ने रेवेन्यू-शेयरिंग क्लॉज के तहत भारी नुकसान का दावा किया और अप्रैल 2015 में बैंक को कानूनी नोटिस भेजकर 18% वार्षिक ब्याज के साथ ₹4.46 करोड़ की मांग की।

कछुआ चाल की टाइमलाइन: बैंक द्वारा दावे को खारिज करने के बाद, LMT ने मई 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट में सिविल सूट दायर किया। नवंबर 2016 में केस के बिंदु (Issues) तय हुए। जनवरी 2018 में इसे ‘कमर्शियल सूट’ के रूप में नया नंबर दिया गया और वादी को अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने का पहला मौका मिला। हैरानी की बात यह है कि LMT के पहले गवाह का परीक्षण (Examination) शुरू होने के बाद मई 2023 में जाकर पूरा हुआ।

टुकड़ों-टुकड़ों में सबूत देने का रवैया स्वीकार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नवंबर 2023 में, LMT ने फिर से एक नया आवेदन देकर बैंक के साथ हुए ईमेल, अन्य वेंडर्स के साथ अनुबंध और सर्वर का बैकएंड डेटा रिकॉर्ड पर लेने और अपने पुराने गवाह को दोबारा बुलाने (Recall) की मांग की। दिल्ली हाई कोर्ट ने फरवरी 2025 में इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कंपनी के पास इतनी देरी का कोई वाजिब कारण नहीं है और वह केवल अपने केस के गैप (कमियों) को भरने की कोशिश कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पूरी तरह सही ठहराते हुए कहा, यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है कि कोई पक्षकार मुकदमे को ‘टुकड़ों-टुकड़ों में’ (Piecemeal Approach) या ‘रुको और चलो’ (Stop and Go) की नीति से चलाए। यह दलील पूरी तरह से बेअसर है कि सबूत बहुत भारी या भारी मात्रा (Voluminous) में हैं। ये सभी दस्तावेज मुकदमा दायर करते समय और साल 2018 में पहली अर्जी मंजूर होने के वक्त भी वादी के पास मौजूद थे।

‘कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट’ के सख्त नियम लागू होंगे

याचिकाकर्ता LMT ने तर्क दिया था कि चूंकि उनका मुकदमा 2015 का है (जब कमर्शियल कोर्ट कानून कड़ा नहीं था), इसलिए उन पर बाद के सख्त नियम लागू नहीं होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कानून की धारा 15 का हवाला दिया, जो स्पष्ट करती है कि कमर्शियल कोर्ट में ट्रांसफर होने वाले सभी लंबित मुकदमों पर नए और त्वरित नियम पूरी तरह लागू होंगे। “सबूत चाहे कितने भी व्यापक क्यों न हों, वे कानून के वैधानिक इरादे और उसकी कड़ाई को कम नहीं कर सकते। कमर्शियल कोर्ट कानून का मुख्य उद्देश्य ही उच्च मूल्य वाले व्यावसायिक विवादों का तेजी से निपटारा करना है।”

केस शीट: उच्चतम न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
मुकदमे के पक्षकारलेविटेट मोबाइल टेक्नोलॉजीज (LMT) बनाम स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक (SCB)
मूल वैधानिक कानूनकमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 (Commercial Courts Act) की धारा 15
विवाद का मुख्य विषयक्या कमर्शियल मुकदमों के बीच में बार-बार नए दस्तावेज जमा करने की अनुमति दी जा सकती है?
अदालत का अंतिम आदेशLMT की अपील पूरी तरह खारिज; दिल्ली हाई कोर्ट को इस मुकदमे को जल्द से जल्द (Expeditiously) तय करने का निर्देश।

कोर्ट में किसने रखा पक्ष?

  • याचिकाकर्ता (LMT) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के साथ अधिवक्ता प्रीति मक्कर, अभिमन्यु गर्ग, अदिति अग्रवाल, शौर्य दासगुप्ता, माधव गुप्ता और तुषार श्रीवास्तव पेश हुए।
  • प्रतिवादी (Standard Chartered Bank) की ओर से: अधिवक्ता संजय गुप्ता, अतीव माथुर, मनीष पालीवाल, आशीष गुप्ता, जागृति आहूजा, अनमोल मेहता और तृप्ति दास ने पैरवी की।

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