Society Matter: कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपार्टमेंट परिसरों में निवासियों के बीच होने वाले आम विवादों में कड़े सामाजिक कानूनों के दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति पर एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक फैसला सुनाया है।
अपार्टमेंट के कुछ निवासियों के खिलाफ जारी आदेश को किया खारिज
हाईकोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने राज्य दिव्यांग जन आयुक्त (State Commissioner for PwD) द्वारा एक अपार्टमेंट के कुछ निवासियों के खिलाफ जारी किए गए ‘चेतावनी आदेश’ (Warning Order) को पूरी तरह खारिज (Quash) कर दिया। अदालत ने पाया कि मूल शिकायत में दिव्यांगता के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव (Discrimination) का कोई आरोप नहीं था, इसलिए यह पूरा मामला दिव्यांग अधिकार कानून के दायरे से बाहर है।
दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम की व्याख्या
अदालत ने कहा, “दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम (RPwD Act) जैसे कानून समाज के वंचित और जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए बनाए गए ‘कल्याणकारी कानून’ (Beneficial Legislations) हैं। यदि लोग अपने निजी स्वार्थ, आपसी रंजिश या अपार्टमेंट के रोजमर्रा के झगड़ों को निपटाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग (Misuse) करने लगेंगे, तो जिन लोगों को सचमुच इसकी जरूरत है, वे इसके लाभ से वंचित रह जाएंगे। अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों को यह समझना होगा कि सामुदायिक जीवन (Community Living) में सह-अस्तित्व जरूरी है, न कि हर बात पर विशेष विशेषाधिकारों की मांग करना।”
मामला क्या है?: रखरखाव शुल्क (Maintenance) के विवाद में पॉवर का इस्तेमाल
यह कानूनी विवाद [वाई वेंकटेश्वर प्रसाद और अन्य बनाम राज्य आयुक्त] मामले से जुड़ा है।
पृष्ठभूमि: बेंगलुरु के एक अपार्टमेंट परिसर में रहने वाले एक दिव्यांग व्यक्ति (शिकायतकर्ता) का अपार्टमेंट के अन्य मालिकों और एसोसिएशन के साथ मुख्य रूप से मेंटेनेंस शुल्क (Maintenance Charges) को लेकर विवाद चल रहा था।
आयुक्त की कार्रवाई: शिकायतकर्ता ने राज्य दिव्यांग जन आयुक्त के समक्ष शिकायत दर्ज कराई कि अन्य निवासी उसे परेशान कर रहे हैं। इस शिकायत पर आयुक्त ने 19 फरवरी, 2026 को अपार्टमेंट के अन्य निवासियों के खिलाफ एक आधिकारिक ‘चेतावनी आदेश’ जारी कर दिया। निवासियों ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं के तर्क: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता बालराज ए.सी. ने दलील दी कि यह शिकायत पूरी तरह से झूठी और अपार्टमेंट के मेंटेनेंस बकाए से ध्यान भटकाने के लिए की गई थी। उन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) या स्पष्ट कारण बताए यह आदेश जारी कर दिया, जिसका इस्तेमाल शिकायतकर्ता अन्य निवासियों को डराने-धमकाने के लिए कर रहा था। उनका आरोप था कि शिकायतकर्ता सुरक्षा व्यवस्था होने के बावजूद अपनी जाति और दिव्यांगता की आड़ में ‘विशेष विशेषाधिकार’ (Special Privileges) चाहता है।
‘लोफर’ कहना या मेंटेनेंस लिस्ट डालना भेदभाव नहीं: हाई कोर्ट
शिकायतकर्ता की वकील अवनि चोकशी ने तर्क दिया कि सुरक्षाकर्मियों को मदद न करने के निर्देश देना, गेट न खोलना और शिकायतकर्ता के घर के सामने सीसीटीवी (CCTV) कैमरा लगाना मानसिक उत्पीड़न और भेदभाव के दायरे में आता है। हालांकि, जब जस्टिस सूरज गोविंदराज ने मूल शिकायत की बारकी से जांच की, तो उन्होंने पाया कि आरोपों का दिव्यांगता से कोई लेना-देना नहीं था। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार थीं।
दिव्यांगता पर भेदभाव कहां है?
जज ने शिकायतकर्ता की वकील से सीधे सवाल किया कि “इस शिकायत में दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव का आरोप कहां है? किसी ने आपको ‘लोफर’ (Lofer) कह दिया या किसी अन्य शब्द का इस्तेमाल किया जिससे आपको दुख पहुंचा। लेकिन यह इस विशेष अधिनियम (RPwD Act) के तहत कैसे आ सकता है? जब भेदभाव का कोई आधार ही नहीं है, तो दिव्यांग आयुक्त के पास इस विवाद में हस्तक्षेप करने का कोई क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) ही नहीं था।”
डिफॉल्टरों की सूची डालना उत्पीड़न नहीं, सिर्फ सूचना है
व्हाट्सएप ग्रुप और नोटिस बोर्ड पर मेंटेनेंस न देने वालों के नाम सार्वजनिक करने को उत्पीड़न बताने पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की, उन्हें मेंटेनेंस चार्ज देने दीजिए, कोई उन्हें परेशान नहीं करेगा। स्वाभाविक है कि अगर मेंटेनेंस नहीं दिया गया है, तो व्हाट्सएप ग्रुप पर इसकी जानकारी डाली जाएगी और उसमें सबका नाम होगा। अधिवक्ताओं का एसोसिएशन (Advocates’ Association) भी बकायेदारों के नाम दरवाजे के बाहर नोटिस बोर्ड पर लगाता है। क्या वह उत्पीड़न है? नहीं, वह केवल एक सूचना (Information) है।”
‘यह कोई स्वतंत्र बंगला नहीं है’: सामुदायिक जीवन पर कोर्ट का पाठ
जस्टिस गोविंदराज ने अपने फैसले में शहरों में बढ़ रहे अपार्टमेंट कल्चर और लोगों की असहिष्णु मानसिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के समय में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं जहां एक निवासी दूसरे को पसंद नहीं करता और सीधे कड़े कानूनों का सहारा ले लेता है। आप सभी को एक समुदाय में रहना सीखना होगा। यह एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स है, जिसके लिए एक अलग विचार प्रक्रिया (Thought Process) की आवश्यकता होती है। आप किसी स्वतंत्र घर (Independent House) में नहीं रह रहे हैं जहाँ आप जो चाहें कर सकें। यह ‘कम्युनिटी लिविंग’ है… कृपया इन कल्याणकारी कानूनों का दुरुपयोग न करें।
भविष्य के लिए निर्देश
हाई कोर्ट ने राज्य दिव्यांग जन आयुक्त को भी कड़ी सलाह दी है कि भविष्य में ऐसी किसी भी शिकायत पर कार्रवाई करने से पहले उसकी गहनता से जांच (Scrutinise) करें, ताकि कानूनी प्रक्रिया के इस तरह के दुरुपयोग (Abuse of statutory process) को रोका जा सके।
केस शीट: कर्नाटक उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सूरज गोविंदराज (एकल पीठ) |
| मुकदमे का नाम | वाई वेंकटेश्वर प्रसाद और अन्य बनाम राज्य आयुक्त |
| प्रासंगिक कानून | दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016 |
| विवाद का मुख्य बिंदु | क्या निजी या अपार्टमेंट के मेंटेनेंस विवादों में दिव्यांगता कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है? |
| अदालत का अंतिम आदेश | कमिश्नर का चेतावनी आदेश रद्द; कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना भेदभाव के आरोपों के दिव्यांग कानून लागू नहीं होता। |

