Tuesday, August 25, 2026
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Pecuniary Jurisdiction: जिला अदालतों की आर्थिक अधिकार क्षेत्र बढ़ाने वाली रिपोर्ट पर रोक लगाने से इनकार…पढ़िए DHCBA का दिया गया तर्क

Pecuniary Jurisdiction: दिल्ली की न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कानूनी और प्रशासनिक विकासक्रम के तहत, दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है।

यह रही अदालत की टिप्पणी

हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें जिला अदालतों के ‘पिक्यूनियरी ज्यूरिसडिक्शन’ (आर्थिक अधिकार क्षेत्र) को बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही जजों की समिति की रिपोर्ट को ‘फुल कोर्ट’ (Full Court) के सामने पेश करने से रोकने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल खेत्रपाल और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया कि इस प्रक्रिया को रोकने का कोई कानूनी आधार नहीं है, जिससे अब समिति अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट के फुल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर सकेगी।

विवाद की जड़: क्या है पिक्यूनियरी ज्यूरिसडिक्शन का मुद्दा?

वर्तमान में, दिल्ली की जिला अदालतों में उन दीवानी मामलों की सुनवाई होती है जिनका मूल्य ₹2 करोड़ तक है।

प्रस्ताव: ‘ऑल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स बार एसोसिएशन’ की समन्वय समिति ने मई 2025 में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर मांग की थी कि इस सीमा को बढ़ाकर ₹20 करोड़ कर दिया जाए।

समिति का गठन: इस मांग पर विचार करने और हितधारकों के साथ चर्चा करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट के जजों की एक समिति बनाई गई थी।

समिति के सदस्य: जस्टिस वी. कामेश्वर राव, जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे, जस्टिस दिनेश मेहता, जस्टिस विवेक चौधरी, जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस नवीन चावला।

डीएचसीबीए (DHCBA) का विरोध क्यों?

दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन इस पूरी प्रक्रिया की संवैधानिक और प्रक्रियात्मक वैधता पर सवाल उठा रहा है।

प्रक्रिया पर सवाल: बार एसोसिएशन का कहना है कि यह पत्र (समन्वय समिति द्वारा) केंद्रीय कानून मंत्रालय को संबोधित था, न कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को। इसके बावजूद, फुल कोर्ट ने इस पत्र का स्वतः संज्ञान (Cognisance) लिया।

पारदर्शिता का अभाव: एसोसिएशन का आरोप है कि हाई कोर्ट ने जजों की समिति क्यों गठित की, इसके पीछे कोई स्पष्ट कारण या तर्क नहीं दिया गया है।

सीधी चुनौती: डीएचसीबीए पहले से ही एक याचिका के माध्यम से जजों की इस समिति के गठन को ही चुनौती दे रही है।

केस शीट: न्यायिक प्रशासनिक समीक्षा (2026)

मापदंडविवरण
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (खंडपीठ)
वर्तमान स्थितिजजों की समिति को रिपोर्ट पेश करने की अनुमति
विवाद का मुख्य मुद्दाजिला अदालतों की आर्थिक सीमा को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़ करना
विरोध पक्षदिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA)
अगला चरणजजों की समिति अपनी रिपोर्ट ‘फुल कोर्ट’ (सभी जजों की बैठक) के सामने रखेगी।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

यह मामला केवल आर्थिक सीमाओं (Pecuniary Jurisdiction) को बढ़ाने का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रशासनिक शक्तियों और बार-बेंच के बीच संबंधों का है। जब जिला अदालतों की आर्थिक सीमा बढ़ती है, तो मुकदमों का भार हाई कोर्ट से जिला अदालतों में स्थानांतरित हो जाता है। यह बार (वकीलों) के लिए एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि यह उनकी प्रैक्टिस के दायरे और कोर्ट परिसर की गतिशीलता को सीधे प्रभावित करता है। डीएचसीबीए की चुनौती यह दर्शाती है कि वे इस बड़े नीतिगत बदलाव की प्रक्रिया में ‘प्रक्रियात्मक शुचिता’ (Procedural Propriety) पर जोर दे रहे हैं। हाई कोर्ट ने फिलहाल रिपोर्ट टेबल करने की अनुमति देकर गेंद को अब ‘फुल कोर्ट’ के पाले में डाल दिया है। अब सभी की निगाहें इस बात पर होंगी कि जजों की समिति अपनी रिपोर्ट में सिफारिशें क्या देती है और फुल कोर्ट उस पर क्या निर्णय लेता है।

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