मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- मामला क्या था? ज्योति विद्या मंदिर स्कूल और गोंडा नगर पालिका के बीच 1997 से नजूल जमीन को लेकर मुकदमा सिविल जज शबीना खान की अदालत में लंबित था।
- फोन कॉल का विवाद: सिविल जज शबीना खान ने जिला जज को रिपोर्ट सौंपी कि मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने उन्हें फोन किया, जिसकी भाषा और लहजे से ऐसा लगा कि विचाराधीन मामले में उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
- न्यायाधीश ने केस ट्रांसफर की मांग की: इस घटना के बाद 4 अगस्त 2026 को सिविल जज शबीना खान ने मामले को अपनी अदालत से स्थानांतरित करने का अनुरोध किया, जिसके बाद जिला जज ने केस गोंडा की दूसरी समकक्ष अदालत में ट्रांसफर कर दिया।
- हाईकोर्ट का कड़ा संज्ञान: हालांकि केस ट्रांसफर होने से याचिका निष्प्रभावी (Infructuous) हो गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने जज को प्रभावित करने के प्रयासों को नजरअंदाज करने से इनकार कर दिया और इसे ‘क्रिमिनल कंटेंप्ट’ का मामला माना।
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने देवीपाटन मंडल की मंडलायुक्त (Divisional Commissioner) दुर्गा शक्ति नागपाल द्वारा तीन दशक पुराने जमीन विवाद के मामले में सिविल जज को कथित तौर पर फोन कर ‘प्रभावित’ करने के प्रयास पर कड़ा एतराज जताया है। अदालत ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा करार दिया है [ज्योति विद्या मंदिर बनाम नगरपालिका परिषद, गोंडा]।
न्यायमूर्ति सैयद क़मर हसन रिज़वी की एकल पीठ ने मामले को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की सुनवाई करने वाली उपयुक्त पीठ के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश से निर्देश प्राप्त करने का आदेश दिया है।
उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियां
पीठ ने पीठासीन न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने के प्रयास पर नाराजगी जताते हुए कहा:
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला: अधीनस्थ अदालतों और न्यायिक अधिकारियों को किसी भी प्रकार के अपमान, दबाव या प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए ताकि वे बिना किसी भय या पक्षपात के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
- मुकदमे के पक्षकार द्वारा सीधा संपर्क स्तब्ध करने वाला: अदालत ने कहा कि जब कोई अधिकारी खुद उस मामले में मुकदमे का एक पक्षकार (Litigant) हो, तो उसके द्वारा विचाराधीन मामले के संदर्भ में पीठासीन जज को फोन करना चौंकाने वाला है।
- प्रभावित करने की प्रत्यक्ष मंशा: जज द्वारा रिपोर्ट की गई बातचीत की भाषा और शैली से प्रथम दृष्टया यह साफ प्रतीत होता है कि सिविल जज को प्रभावित करने का प्रयास किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- 30 साल पुराना भूमि विवाद: यह मामला गोंडा में नजूल भूमि के कई टुकड़ों से जुड़ा है, जो राजस्व रिकॉर्ड में कमिश्नर, देवीपाटन मंडल के नाम पर दर्ज हैं। प्रशासन का दावा है कि यह जमीन सरकारी कार्यालय और अन्य जनहित के कार्यों के लिए आरक्षित थी, जिस पर ‘ज्योति विद्या मंदिर स्कूल’ का निर्माण कर लिया गया। यह दीवानी वाद वर्ष 1997 से लंबित है।
- ट्रायल कोर्ट में स्थिति: यह मुकदमा सिविल जज (सीनियर डिवीजन), गोंडा शबीना खान की अदालत में साक्ष्य (Evidence) के स्तर पर लंबित था और इस पर यथास्थिति (Status Quo) का आदेश प्रभावी था।
- ट्रांसफर अर्जी: स्कूल प्रबंधन ने अधिकारियों पर अपने पद का दुरुपयोग करने और अदालत पर अनुचित दबाव बनाने का आरोप लगाते हुए मामले को देवीपाटन मंडल से बाहर किसी अन्य जिले में स्थानांतरित करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
विवाद का घटनाक्रम
- सिविल जज की रिपोर्ट: सिविल जज शबीना खान ने गोंडा के जिला जज को औपचारिक रूप से सूचित किया कि मंडलायुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने उन्हें फोन किया, जिसमें उनकी छुट्टी के साथ-साथ अदालत में लंबित उक्त मुकदमे का भी जिक्र था।
- जज द्वारा केस छोड़ने का अनुरोध: इस घटना के बाद 4 अगस्त 2026 को सिविल जज ने जिला जज से अनुरोध किया कि यह मामला उनकी अदालत से किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित कर दिया जाए।
- गोंडा में केस ट्रांसफर: जिला जज ने मुकदमे को गोंडा की ही दूसरी समकक्ष अदालत में भेज दिया, जिससे हाईकोर्ट के समक्ष दायर ट्रांसफर याचिका तकनीकी रूप से निष्प्रभावी हो गई।
- कमिश्नर का रुख: अदालत ने नोट किया कि मंडलायुक्त ने सिविल जज को फोन करने की बात से इनकार नहीं किया है।
आपराधिक अवमानना पीठ को भेजा गया मामला
न्यायमूर्ति सैयद क़मर हसन रिज़वी ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मुख्य स्थानांतरण याचिका निष्प्रभावी हो गई है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया और पीठासीन अधिकारी पर दबाव बनाने के इस गंभीर आरोप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायाधीशों पर दबाव बनाने या धमकी देने से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के तहत विचार के लिए मुख्य न्यायाधीश के आदेशानुसार उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिज़वी ने अपने आदेश में कहा: “अदालत इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि एक मुकदमेबाज़ पक्ष (Litigant Party) लंबित मामले के संदर्भ में किसी जज को फोन करे। जज द्वारा रिपोर्ट की गई बातचीत की भाषा से यह साफ प्रभाव मिलता है कि उन्हें प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। अधीनस्थ अदालतों को किसी भी दबाव या अपमान से बचाया जाना चाहिए ताकि न्यायिक अधिकारी बिना किसी डर के अपना कर्तव्य निभा सकें।” अदालत ने कहा कि चाहे कोई व्यक्ति, मुकदमैबाज़ हो या वकील, अगर वह अदालत पर दबाव बनाने की कोशिश करता है, तो यह न्याय की प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप है। हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के निर्देशानुसार इस मामले को आपराधिक अवमानना से निपटने वाली उचित पीठ के समक्ष रखने का आदेश दिया है।
Criminal Contempt:एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिज़वी (Justice Syed Qamar Hasan Rizvi) |
| संबंधित अधिकारी | दुर्गा शक्ति नागपाल (मंडलायुक्त, देवीपाटन मंडल) |
| संबंधित सिविल जज | शबीना खान (सिविल जज सीनियर डिवीजन, गोंडा) |
| मुख्य आदेश | मामले को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की सुनवाई करने वाली पीठ के समक्ष भेजने के निर्देश। |

