Women’s’ Right: कार्यस्थल पर महिलाओं के अधिकारों और गरिमा को मजबूत करने वाला एक बेहद युगांतकारी फैसला सुनाते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सरकारी तंत्र की घोर प्रशासनिक ओवररीच (अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम करना) को कड़ा सबक सिखाया है।
महिला डॉक्टरों को मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन देने से मना कर दिया था
हाईकोर्ट के जस्टिस रजनीश ओसवाल की एकल पीठ ने केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के उस आदेश को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है, जिसके तहत कांट्रैक्ट/टेन्योर पर काम करने वाली महिला डॉक्टरों को मातृत्व अवकाश के दौरान वेतन देने से मना कर दिया गया था। अदालत ने सख्त निर्देश दिया है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन इन सभी पीड़ित महिला डॉक्टरों के मातृत्व अवकाश की अवधि का पूरा वेतन और भत्ता तुरंत जारी करे। अदालत ने कहा, मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) कोई सरकारी दान या खैरात नहीं है, बल्कि यह महिला की गरिमा से जुड़ा उसका एक अटूट संवैधानिक अधिकार है। जब सरकार नियमों के तहत किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व अवकाश देती है, तो उस अवधि का पूरा वेतन और भत्ता (Paid Leave) पाना उसका स्वाभाविक अधिकार बन जाता है। किसी भी मनमाने प्रशासनिक आदेश (Executive Fiat) या वित्तीय विभाग की मनमर्जी से एक कामकाजी मां के इस हक को छीना नहीं जा सकता।
मामला क्या है?: ‘आउट ऑफ असाइनमेंट’ का बहाना और वेतन पर रोक
यह कानूनी लड़ाई जम्मू-कश्मीर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में तैनात सीनियर रेजिडेंट्स और ट्यूटर्स (महिला डॉक्टरों) से जुड़ी है।
डॉ. सोनाक्षी गुप्ता का मामला: डॉ. सोनाक्षी गुप्ता और अन्य महिला डॉक्टरों की नियुक्ति ‘जम्मू-कश्मीर मेडिकल एंड डेंटल एजुकेशन रूल्स, 2020’ के तहत एकेडमिक अरेंजमेंट (कॉन्ट्रैक्ट/टेन्योर बेसिस) पर हुई थी।
सरकार का यू-टर्न: जम्मू-कश्मीर सरकार ने 8 जुलाई, 2024 को एक आधिकारिक आदेश जारी कर इन सीनियर रेजिडेंट्स और ट्यूटर्स को भी मौजूदा सरकारी नियमों के तहत मातृत्व अवकाश का लाभ देने की मंजूरी दी थी। लेकिन इसके बाद, 14 अक्टूबर, 2025 को स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने वित्त विभाग की सलाह पर एक नया नोटिस जारी कर दिया। इस नोटिस में कहा गया कि चूंकि ये डॉक्टर रेगुलर स्टाफ नहीं हैं और छुट्टी के दौरान ड्यूटी पर नहीं थीं, इसलिए वे ‘आउट ऑफ असाइनमेंट’ (असाइनमेंट से बाहर) मानी जाएंगी और उन्हें इस अवधि का कोई वेतन नहीं मिलेगा।
अदालत में चुनौती: इस मनमाने रवैये के खिलाफ महिला डॉक्टरों ने एडवोकेट अभिनव जामवाल के जरिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि ‘जम्मू-कश्मीर सिविल सर्विसेज (लीव) रूल्स, 1979 के नियम 41(1)’ के तहत पेड मैटरनिटी लीव का प्रावधान है। जब 2024 में सरकार ने उन्हें छुट्टी की मंजूरी दी, तो वेतन रोकने की बात कभी नहीं बताई गई।
सरकार की दलीलें और हाई कोर्ट का करारा जवाब
अदालत में सरकार की तरफ से एडिशनल एडवोकेट जनरल रमन शर्मा और एडवोकेट सलीका शेख पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि ये डॉक्टर नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि टेन्योर-बेस्ड (निश्चित अवधि की) हैं। मातृत्व अवकाश के बाद उनके कार्यकाल को सिर्फ इसलिए बढ़ाया गया ताकि वे अपनी अधूरी अकादमिक ट्रेनिंग पूरी कर सकें, इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें छुट्टी के दिनों की सैलरी भी मिले। जस्टिस रजनीश ओसवाल ने सरकार के इस ‘दोहरे रवैये’ (Blowing Hot and Cold) को पूरी तरह खारिज करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत तय किए।
अवकाश और वेतन एक-दूसरे के पूरक हैं
अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश को उसके वेतन लाभ से अलग नहीं किया जा सकता। यदि आप छुट्टी को मान्यता देते हैं लेकिन उस अवधि का वेतन रोक लेते हैं, तो यह उस मातृत्व लाभ के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है। वित्तीय नुकसान का डर दिखाकर किसी महिला को मातृत्व का अधिकार चुनने से नहीं रोका जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की नज़ीर
हाई कोर्ट ने अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत के तीन सबसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया।
MCD बनाम फीमेल वर्कर्स (मस्टर रोल): जहां सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि दिहाड़ी/मस्टर रोल पर काम करने वाली महिलाओं को भी मातृत्व लाभ मिलना चाहिए।
दीपिका सिंह बनाम पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़: मातृत्व को महिलाओं के जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया।
कविता यादव बनाम दिल्ली राज्य (NCT): संविदात्मक (Contractual) कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों को सुरक्षा दी गई।
कोर्ट ने पूर्व के ‘जेएंडके बैंक लिमिटेड बनाम तनु गुप्ता’ मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया था कि मातृत्व अवकाश लेने के कारण किसी भी महिला कर्मचारी को आर्थिक या करियर के स्तर पर नुकसान (Financial Disadvantage) नहीं पहुंचाया जा सकता।
केस शीट: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट विधिक समीक्षा (2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस रजनीश ओसवाल (एकल पीठ) |
| मुख्य याचिकाकर्ता | डॉ. सोनाक्षी गुप्ता और अन्य महिला डॉक्टर |
| याचिकाकर्ताओं के विधिक प्रतिनिधि | एडवोकेट अभिनव जामवाल |
| विवादित सरकारी आदेश | 14 अक्टूबर, 2025 का कम्युनिकेशन (जिसके तहत वेतन रोका गया) |
| प्रासंगिक सेवा नियम | जेएंडके सिविल सर्विसेज (लीव) रूल्स, 1979 का नियम 41(1) |
| अदालत का अंतिम निर्णय | सरकारी आदेश पूरी तरह रद्द; महिला डॉक्टरों को मातृत्व अवकाश का पूरा वेतन देने का निर्देश। |

