Tuesday, August 25, 2026
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Wrongful Confinement: कागज पर रिहाई, जेल में तबाही… उत्तराखंड के वैवाहिक विवाद में यूपी की जेल में पति कैद, जानिए कोर्ट का क्या रहा आदेश

Wrongful Confinement: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की पुलिस और निचली अदालतों की गंभीर लापरवाही के कारण एक ‘क्षेत्राधिकार के शून्य’ (Jurisdictional Vacuum) में फंसे पति को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तुरंत रिहा करने का ऐतिहासिक आदेश दिया है।

कानून किसी भी कैदी को लावारिस (Orphan) नहीं छोड़ सकता

हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने पति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को स्वीकार करते हुए रामपुर जिला जेल में उसके कारावास को ‘प्रशासनिक अपहरण’ (Administrative Kidnapping) और ‘गलत तरीके से बंधक बनाना’ (Wrongful Confinement) करार दिया। कहा, कानून किसी भी कैदी को लावारिस (Orphan) नहीं छोड़ सकता। अदालत की सक्रिय फाइल (Active Judicial File) या वैध रिमांड वारंट (Remand Warrant) के बिना किसी व्यक्ति को सलाखों के पीछे रखना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सबसे क्रूर हनन है। कोई भी नागरिक हर एक घंटा जो बिना कानूनी आदेश के जेल में बिताता है, वह संविधान के अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन है। इस नाइंसाफी की भरपाई न तो पैसों के मुआवजे से की जा सकती है और न ही बाद में किसी प्रशासनिक सुधारात्मक कार्रवाई से।”

मामला क्या है?: उत्तराखंड का विवाद, रामपुर में सरेंडर और अजीब विधिक वैक्यूम

यह पूरा कानूनी ड्रामा एक वैवाहिक कलह (Matrimonial Dispute) से शुरू हुआ।

एफआईआर और सरेंडर: पत्नी के साथ विवाद के बाद, रामपुर (यूपी) के टांडा थाने में पति के खिलाफ मारपीट और लूटपाट की एफआईआर दर्ज कराई गई। पुलिस के कहने पर पति ने 3 मई को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), रामपुर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और 11 मई को उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

समझौता और क्षेत्राधिकार की गलती: इस बीच 26 मार्च को ही दोनों पक्षों में गांव के बुजुर्गों की मौजूदगी में लिखित समझौता हो गया था, और पत्नी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं चाहती थी। जांच के दौरान खुद जांच अधिकारी (IO) ने पाया कि जिस घटना का आरोप लगाया गया है, वह असल में उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के जसपुर थाना क्षेत्र में घटी थी। यानी रामपुर पुलिस का इस पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था।

अदालत की बड़ी चूक: रामपुर के सीजेएम (CJM) ने क्षेत्राधिकार न होने के कारण केस के सभी न्यायिक रिकॉर्ड जांच अधिकारी को वापस कर दिए ताकि उन्हें उत्तराखंड की सक्षम अदालत में पेश किया जा सके। लेकिन वे यह भूल गए कि आरोपी शारीरिक रूप से अभी भी रामपुर की जेल में बंद है!

कागज़ों पर रामपुर कोर्ट का केस खत्म हो चुका था (यानी जीरो कस्टडी), लेकिन हकीकत में पति रामपुर जेल की कोठरी में ही बंद रहा, क्योंकि उसके पास उत्तराखंड की अदालत का कोई नया रिमांड ऑर्डर नहीं था।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘वकालतनामा ही इस अवैध कैद का सबसे बड़ा सबूत है’

अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की मूल भावना को रेखांकित करते हुए रामपुर की निचली न्यायपालिका और जेल प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई।

जेल प्रशासन का अपना ही विरोधाभास (Legal Paradox)

राज्य सरकार और पुलिस यह छिपाने की कोशिश कर रहे थे कि हिरासत अवैध है, लेकिन हाई कोर्ट ने उनके ही दस्तावेजों से उनकी कलई खोल दी। कहा, याचिकाकर्ता ने जेल के भीतर से अपने वकील के लिए जो ‘वकालतनामा’ साइन किया है, उस पर रामपुर जेल अथॉरिटी के सक्षम अधिकारी के बकायदा हस्ताक्षर और मुहर हैं। यह दस्तावेजी सबूत किसी भी प्रशासनिक दिखावे को ध्वस्त कर देता है और इस बात का जीता-जागता सबूत है कि राज्य की मशीनरी ने एक नागरिक को बिना किसी कानूनी मंजूरी के सलाखों के पीछे रखा हुआ है।”

कागज़ पर ‘शून्य’, सलाखों में ‘क्रूर हकीकत’

जस्टिस सिद्धार्थ की पीठ ने टिप्पणी की कि जब रामपुर की अदालत के पास उस कैदी की कोई फाइल ही नहीं बची, तो उसे जेल में रखना न्याय प्रक्रिया नहीं, बल्कि कानून का घोर मज़ाक है। कानून किसी कैदी को इस तरह ‘अनाथ’ नहीं बना सकता कि उसकी फाइल किसी और राज्य की पुलिस के पास घूम रही हो और वह खुद यूपी की जेल में ‘पिंजरे’ में बंद हो।

केस शीट: इलाहाबाद उच्च न्यायालय निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और रुख
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी (खंडपीठ)
याचिका का प्रकारबंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus Petition)
मूल वैवाहिक विवाद का क्षेत्रग्राम मुरलीवाला, जसपुर, उधम सिंह नगर (उत्तराखंड)
अवैध कस्टडी का स्थानजिला जेल, रामपुर (उत्तर प्रदेश)
प्रासंगिक कानूनभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS, 2023) और संविधान का अनुच्छेद 21, 22
अदालत का अंतिम आदेशपति को तुरंत रिहा करने का आदेश; रामपुर की सभी कार्यवाही रद्द; हालांकि उत्तराखंड पुलिस को कानूनन जांच जारी रखने की छूट।
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