Right to Vote: निर्वाचन क्षेत्रों के दशकों तक आरक्षित रहने के कारण सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को वोट न दे पाने की दलील देने वाली याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।
मतदाताओं का अधिकार संसद के चुनावी कानून के अधीन
हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने परिसीमन अधिनियम, 2002 (Delimitation Act, 2002) की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार (Uphold) रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी नागरिक किसी आरक्षित सीट को सामान्य सीट (De-reservation) घोषित करने की मांग को अपना कानूनी या मौलिक अधिकार नहीं मान सकता। “भारत के संविधान के तहत वोट देने के अधिकार (Right to Vote) का मतलब यह कतई नहीं है कि कोई भी मतदाता निर्वाचन क्षेत्र (Constituency) के आवंटन की शर्तें तय करने लगे या इस बात पर अड़ जाए कि उसका क्षेत्र किसी विशेष वर्ग या सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के लिए ही आवंटित हो। मतदाताओं का अधिकार संसद द्वारा बनाए गए चुनावी कानूनों और संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।”
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मामला क्या है?: ‘6 दशकों से आरक्षित सीट और जाति-बाध्य वोट’ का तर्क
यह कानूनी चुनौती एक मतदाता द्वारा दायर की गई थी, जिसने परिसीमन कानून के मूल सिद्धांतों को ही अदालत में चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता का कहना था कि उसका निर्वाचन क्षेत्र इसके गठन के बाद से पिछले लगभग छह दशकों (60 साल) से अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित चला आ रहा है। इसके कारण वह और उसकी पीढ़ियां केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को ही ‘जाति-बाध्य वोट’ (Caste-bonded vote) देने के लिए मजबूर हैं। उसने दलील दी कि यह स्थिति उसे सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को चुनने के उसके अधिकार से वंचित करती है और इसे एक प्रकार का ‘सशर्त मतदान’ (Conditional Voting) करार दिया।
संबद्ध कानूनी प्रावधान: परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) स्पष्ट करती है कि अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए निर्वाचन क्षेत्र उन क्षेत्रों में आरक्षित किए जाएंगे, जहां कुल आबादी की तुलना में उनकी जनसंख्या का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक (Comparatively Large) होता है।
हाई कोर्ट का फैसला: वोट देने का अधिकार असीमित नहीं है
खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की ‘सशर्त मतदान’ और भेदभाव की दलील को पूरी तरह से योग्यताहीन (Devoid of merits) बताते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं इस प्रकार हैं।
संवैधानिक सीमाओं के अधीन है मतदान का अधिकार
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 के तहत मिलने वाला मत देने का अधिकार संप्रभु या पूर्ण अधिकार नहीं है, बल्कि यह संसद द्वारा निर्धारित सीमाओं और कानूनों के अधीन है। संसद को चुनाव से जुड़े कानून बनाने का पूरा अधिकार है।
आरक्षण के सिद्धांतों के साथ सामंजस्य (Harmonious Construction)
अदालत ने उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के प्रसिद्ध फैसले राजबाला और अन्य बनाम हरियाणा राज्य का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि वोट देने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के साथ मिलाकर (सामंजस्यपूर्ण ढंग से) पढ़ा जाना चाहिए, जो लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण का प्रावधान करते हैं। याचिकाकर्ता के विद्वान वकील का यह तर्क कि उनका निर्वाचन क्षेत्र दशकों से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, जिससे वे सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए हैं, पूरी तरह निराधार है। मतदाता यह तय नहीं कर सकते कि सीट किस श्रेणी को आवंटित होगी।”
केस शीट: इलाहाबाद उच्च न्यायालय परिसीमन समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और रुख |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय (खंडपीठ) |
| प्रासंगिक कानून | परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) |
| संविधान के अनुच्छेद | अनुच्छेद 325, 326 (मतदान) और अनुच्छेद 330, 332 (सीटों का आरक्षण) |
| विवाद का मुख्य बिंदु | क्या कोई सीट लंबे समय तक आरक्षित रहने पर मतदाता उसे अनारक्षित करने की मांग कर सकता है? |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका पूरी तरह खारिज; परिसीमन कानून की धारा और आरक्षण की प्रक्रिया को वैध माना। |

