Tuesday, September 1, 2026
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Oraon Tribe Custom: जेठ-ससुर नहीं बना सकते घर-जमाई… उरांव जनजाति के पारंपरिक उत्तराधिकार नियम पर क्या है फैसला, जानिए

Oraon Tribe Custom: झारखंड और छोटानागपुर क्षेत्र की आदिवासी उत्तराधिकार परंपराओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने निचली अदालत, प्रथम अपीलीय अदालत और झारखंड हाई कोर्ट के उस संयुक्त फैसले को पूरी तरह पलट (Set Aside) दिया है, जिसने एक जेठ-ससुर (Uncle-in-law) द्वारा बनाए गए घर जमाई के अरेंजमेंट को कानूनी मान्यता दे दी थी। अपने फैसले में साफ किया कि रूढ़िवादी परंपराओं का पालन उसी तरह किया जाना चाहिए जैसा वे समाज में स्वीकृत हैं, उनमें अपनी मर्जी से नए रिश्ते नहीं जोड़े जा सकते।

उरांव आदिवासी समुदाय के पारंपरिक और रूढ़िवादी कानून

उरांव (Oraon) आदिवासी समुदाय के पारंपरिक और रूढ़िवादी कानूनों (Customary Laws) के तहत केवल ससुर या उनकी विधवा ही किसी व्यक्ति को ‘घर जमाई’ (Ghar Damad) के रूप में गोद ले सकती है या संपत्ति का हकदार बना सकती है। रूढ़िवादी परंपराओं में कहीं भी यह स्थापित नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने भाई की बेटी (भतीजी) के पति को अपना घर जमाई बना ले और उसे पैतृक संपत्ति सौंप दे। यदि कोई सीधा पुरुष उत्तराधिकारी या वैध घर जमाई नहीं है, तो संपत्ति पर पहला हक सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार (Agnate) का होगा।

मामला क्या है?: भतीजी के पति को घर जमाई बनाने पर छिड़ा कानूनी युद्ध

यह पूरा विवाद सुक्खू उरांव नामक व्यक्ति की पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा है, जिसके तीन बेटे थे: धुंगरू, लेदुरा और भौला।

पारिवारिक पृष्ठभूमि: सुक्खू के तीन बेटों में से लेदुरा की कोई संतान नहीं थी, जबकि भौला की एक बेटी थी जिसका नाम बुधैन था। धुंगरू का एक बेटा था जिसका नाम बेजला उरांव (याचिकाकर्ता) था।

दावेदारी का विवाद: भौला और लेदुरा की मृत्यु के बाद, उनके भाई के बेटे बेजला उरांव ने दावा किया कि वह सबसे करीबी जीवित पुरुष रिश्तेदार (Nearest Male Agnate) है, इसलिए कानूनन इस संपत्ति का असली वारिस वही है।

विपक्षी दल का तर्क: दूसरी तरफ, प्रतिवादियों (विपक्ष) का दावा था कि बुधैन के पति ‘पुनई’ को उसके चाचा-ससुर (लेदुरा) ने घर जमाई के रूप में रखा था। उन्होंने इसके समर्थन में 27 फरवरी, 1975 का एक कथित विभाजन विलेख (Partition Deed) भी पेश किया और कहा कि पुनई ही संपत्ति का हकदार है।

इस दलील को निचली अदालत से लेकर झारखंड हाई कोर्ट तक ने स्वीकार कर लिया था, जिसके बाद बेजला उरांव ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: क्या कहता है उरांव जनजाति का कानून?

जस्टिस संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में कोर्ट ने आदिवासी समाज की परंपराओं को समझने के लिए विख्यात मानवविज्ञानी एस.सी. रॉय की प्रामाणिक पुस्तक ‘द उरांव ऑफ छोटानागपुर’ (The Oraon of Chotanagpur) का हवाला दिया। कोर्ट ने मामले का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:

जेठ-ससुर को अधिकार नहीं (No Right to Uncle-in-law)

अदालत ने माना कि उरांव कस्टमरी लॉ में ‘घर जमाई’ की व्यवस्था को मान्यता प्राप्त है, लेकिन उसके नियम बेहद कड़े हैं। घर जमाई को संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार केवल तभी मिल सकता है जब उसे जमीन के आखिरी मूल पुरुष मालिक (लड़की के पिता) या उसकी विधवा द्वारा घर में शामिल किया गया हो। इस मामले में, पुनई को लेदुरा ने घर जमाई बनाया था, जो लड़की (बुधैन) का पिता नहीं बल्कि महज चाचा/ताऊ था।

करीबी पुरुष रिश्तेदार का हक सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, अगर किसी भूमि मालिक का अपना कोई सीधा वारिस, बेटा या वैध घर जमाई नहीं है, तो परिवार के अन्य पुरुष सदस्यों में से जो सबसे करीबी पुरुष रिश्तेदार (Nearest Male Agnate) होगा, जमीन पर उसी का अधिकार माना जाएगा। प्रतिवादी यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे कि उनके द्वारा किया गया घर जमाई का अरेंजमेंट उरांव जनजाति के पारंपरिक नियमों की शर्तों को पूरा करता है। अदालत ने माना कि चूंकि लेदुरा द्वारा पुनई को घर जमाई बनाना परंपरा के खिलाफ था, इसलिए संपत्ति पर केवल और केवल धुंगरू के बेटे बेजला उरांव का हक है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में डिक्री जारी करते हुए अपील को मंजूर कर लिया।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट आदिवासी उत्तराधिकार समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
फैसले की तिथि9 जुलाई, 2026
संबंधित समुदाय और क्षेत्रउरांव जनजाति (Oraon Tribe), छोटानागपुर/झारखंड
ऐतिहासिक संदर्भ/पुस्तकएस.सी. रॉय की ‘The Oraon of Chotanagpur’
अदालत का अंतिम निर्णयझारखंड हाई कोर्ट का आदेश रद्द; भतीजी के पति को चाचा-ससुर द्वारा घर जमाई बनाने की व्यवस्था अमान्य।
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