Wednesday, July 15, 2026
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Commercial Quantity: कमर्शियल क्वांटिटी मामलों में धारा 37 की शर्तें अनिवार्य, शॉर्टकट नहीं चलेगा…NDPS एक्ट के केस की हिस्ट्री सभी जरूर पढ़ें

Commercial Quantity: मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और नीतिगत फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा एक शातिर ड्रग तस्कर को दी गई नियमित जमानत को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने जमानत देते समय कानून द्वारा अनिवार्य रूप से स्थापित ‘धारा 37’ की शर्तों की पूरी तरह अनदेखी की, जिसके कारण उसका आदेश कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है।

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के तहत सुनवाई

शीर्ष अदालत ने कहा, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के तहत जब मामला ‘व्यावसायिक मात्रा’ (Commercial Quantity) यानी भारी मात्रा में नशीले पदार्थों की तस्करी का हो, तो अदालतें सीधे तौर पर जमानत (Bail) नहीं दे सकतीं। ऐसे मामलों में NDPS एक्ट की धारा 37 के तहत दी गई ‘जुड़वां शर्तों’ (Twin Conditions) को संतुष्ट करना कानूनी रूप से अनिवार्य (Mandatory) है। यद्यपि संविधान के अनुच्छेद 21 और लंबे समय तक जेल में रहने (Prolonged Incarceration) के आधार पर जमानत देने के सिद्धांत मौजूद हैं, लेकिन जब देश की संप्रभुता, अर्थव्यवस्था और युवाओं के स्वास्थ्य के खिलाफ ‘ड्रग्स का युद्ध’ छेड़ा गया हो, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर देश का हित सर्वोपरि होगा।

मामला क्या है?: जेल के भीतर से चल रहा था ड्रग नेटवर्क, हाईकोर्ट ने दे दी थी बेल

यह मामला पंजाब सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक अपील से जुड़ा है, जिसकी पृष्ठभूमि इस प्रकार है।

हेरोइन की बरामदगी: 10 जनवरी, 2024 को पुलिस ने एक वाहन को रोककर 1.465 किलोग्राम हेरोइन बरामद की थी। NDPS एक्ट के तहत यह मात्रा ‘कमर्शियल क्वांटिटी’ (व्यावसायिक श्रेणी) में आती है।

जेल से सिंडिकेट चलाने का आरोप: जांच के दौरान सह-आरोपियों ने खुलासा किया कि इस पूरे नेटवर्क का मास्टरमाइंड बलराज सिंह उर्फ ​​बिल्ला है। वह खुद गोइंडवाल साहिब केंद्रीय जेल में बंद था और वहीं से अवैध मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर बाहर अपने गुर्गों को हेरोइन इकट्ठा करने और उसकी सप्लाई करने के निर्देश दे रहा था।

हाईकोर्ट का फैसला: विशेष अदालत (Special Court) ने तो बिल्ला की जमानत खारिज कर दी थी, लेकिन 15 अक्टूबर, 2025 को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने उसे नियमित जमानत दे दी। हाईकोर्ट का तर्क था कि केवल पुराने आपराधिक इतिहास (Criminal Antecedents) के आधार पर किसी को हमेशा जेल में नहीं रखा जा सकता। ट्रायल में देरी की संभावना और आरोपी के 1 साल 7 महीने से जेल में होने को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने उसे रिहा कर दिया था। इसके खिलाफ पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।

सुप्रीम कोर्ट की विधिक व्याख्या: व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने हाईकोर्ट के फैसले की तीखी आलोचना करते हुए साफ किया कि विशेष कानूनों (Special Statutes) के तहत आम प्रक्रिया लागू नहीं होती।

धारा 37 NDPS एक्ट की ‘जुड़वां शर्तें’ (Twin Conditions) क्या हैं?

जब भी कोई मामला कमर्शियल क्वांटिटी का होता है और सरकारी वकील (Public Prosecutor) जमानत का विरोध करता है, तो कोर्ट तभी जमानत दे सकता है जब वह इन दो बातों से संतुष्ट हो। यह मानने के लिए उचित आधार (Reasonable grounds) मौजूद हैं कि आरोपी इस अपराध का दोषी नहीं है। जमानत पर बाहर आने के बाद आरोपी द्वारा दोबारा ऐसा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि हाईकोर्ट के आदेश की एक सरसरी नजर से ही साफ हो जाता है कि उसने इन दोनों शर्तों पर विचार तक नहीं किया।

‘1 साल 7 महीने’ की कस्टडी कोई लंबी अवधि (Prolonged Incarceration) नहीं है

आरोपी के वकील ने दलील दी थी कि उसका मुवक्किल 19 महीने से जेल में है और 24 में से केवल 2 गवाहों से पूछताछ हुई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के फैसलों (लालरिंतलुआंगा सैलो (2024), बी. रामू (2024) और नामदेव अशरुबा नाकाडे (2025)) का हवाला देते हुए कहा, इस अपराध के लिए अधिकतम 20 साल तक की कैद का प्रावधान है। ऐसे गंभीर मामले में महज 1 साल 7 महीने की हिरासत को ‘प्रोलॉन्गड इनकार्सरेशन’ (अत्यधिक लंबी कैद) नहीं कहा जा सकता कि जिसके आधार पर कोर्ट धारा 37 की वैधानिक पाबंदियों को ही बाईपास कर दे।

संप्रभुता बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Sovereignty vs Personal Liberty)

खंडपीठ ने हाल ही में दिल्ली दंगों से जुड़े मामले (तस्लीम अहमद बनाम एनसीटी दिल्ली – 2026) का जिक्र किया, जहां अनुच्छेद 21 और विशेष कानूनों के टकराव का मुद्दा बड़ी बेंच को भेजा गया है। हालांकि इस केस में कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की, हमारा स्पष्ट मानना है कि सबसे बड़ा विचार ‘न्याय का हित’ है। यदि कभी देश की संप्रभुता (Sovereignty) और किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के बीच कोई टकराव होता है, तो निसंदेह देश की संप्रभुता ही जीतेगी। विशेषकर तब, जब देश के खिलाफ एक छद्म युद्ध (War) छेड़ा गया हो—चाहे वह ड्रग्स की सप्लाई के रूप में हो, जो सीधे हमारी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और लोगों के स्वास्थ्य को दीमक की तरह चाट रही है।

केस शीट: सुप्रीम कोर्ट NDPS धारा 37 जमानत समीक्षा (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह
अपीलकर्ता (Appellant)पंजाब सरकार
प्रासंगिक कानूनNDPS अधिनियम, 1985 की धारा 37(1)(b)(ii) एवं संविधान का अनुच्छेद 21
बरामद नशीला पदार्थ1.465 किलोग्राम हेरोइन (कमर्शियल क्वांटिटी)
अदालत का अंतिम निर्णयपंजाब सरकार की अपील स्वीकार; हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द, आरोपी को तुरंत हिरासत में लेने का निर्देश।

आपराधिक इतिहास ने बंद किए रास्ते

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी बलराज सिंह का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड (Criminal Antecedents) बेहद खराब है और वह पहले भी NDPS एक्ट के तहत ऐसे ही अपराधों में लिप्त रहा है। ऐसे में कानून की यह दूसरी शर्त कि ‘वह बाहर जाकर दोबारा अपराध नहीं करेगा’, किसी भी सूरत में पूरी नहीं होती थी। कोर्ट ने पाया कि उसके सह-आरोपियों की जमानत भी पहले ही रद्द की जा चुकी है। परिणामतः, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया।

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