Toxic Material: मद्रास हाईकोर्ट ने डिजिटल युग के एक बेहद गंभीर लेकिन अब तक अनदेखे पहलू पर रोशनी डाली है।
न्याय की पूरी मशीनरी इंसानों से चलती है: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने यौन अपराधों के मामलों में जांच अधिकारियों, वकीलों और जजों द्वारा बार-बार देखे जाने वाले अश्लील और हिंसक डिजिटल सबूतों के कारण होने वाले ‘अप्रत्यक्ष आघात’ (Vicarious Trauma) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। “यौन अपराधों से निपटने वाली विधिक अदालतें इन दिनों ऐसे अश्लील वीडियो और तस्वीरों से पटी पड़ी हैं, जो मानवीय व्यवहार के सबसे घटिया और क्रूर स्तर को दर्ज करते हैं। न्याय की पूरी मशीनरी इंसानों से चलती है, इसे कोई संवेदनहीन कंप्यूटर (Unfeeling Computers) नहीं समझा जा सकता। यदि हम इस डिजिटल युग में जजों और जांच अधिकारियों के दिमाग पर पड़ने वाले न्यूरोलॉजिकल और मानसिक असर को नजरअंदाज करते रहे, तो हम अंत में एक ऐसी कानूनी व्यवस्था की ओर बढ़ेंगे जहां जांचकर्ता, वकील और जज पूरी तरह से मानसिक तनाव के शिकार और भावनात्मक रूप से सुन्न (Emotionally Numbed) हो जाएंगे।
विधिक संदर्भ: ‘सुजी बनाम राज्य’ मामले में आया ऐतिहासिक पोस्टस्क्रिप्ट
यह टिप्पणी कोर्ट ने ‘रोमांस फ्रॉड’ और ब्लैकमेलिंग से जुड़े एक बलात्कार के मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई ताउम्र कैद की सजा को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा।
इस मामले में मुख्य फैसला जस्टिस रामकृष्णन ने लिखा, जिसमें उन्होंने युवा महिलाओं को डिजिटल माध्यमों पर अपनी प्राइवेसी और अंतरंग तस्वीरें साझा न करने की सलाह दी। वहीं, जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने एक विशेष सहमति नोट (Concurring Postscript) जोड़ते हुए न्याय प्रणाली में काम करने वाले इंसानों के मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा उठाया।
“पहले हम शब्दों से न्याय करते थे, अब सीधे हिंसा देखते हैं”: जस्टिस वेंकटेश
जस्टिस वेंकटेश ने अतीत और वर्तमान की न्याय प्रणाली की तुलना करते हुए कुछ बेहद मार्मिक विधिक बिंदु सामने रखे।
अतीत का सुरक्षा कवच (The Text Buffer): जज ने याद दिलाया कि पहले के समय में अदालतों में सबूत मौखिक गवाहियों और क्लिनिकल (डॉक्टरी) रिपोर्ट के रूप में आते थे। इसने जजों और वकीलों को सीधे तौर पर अपराध को देखने से बचाया हुआ था। दुख और पीड़ा को शब्दों के माध्यम से प्रोसेस किया जाता था, सीधे आंखों से नहीं, जिससे एक मानसिक बफर बना रहता था।
वर्तमान की भयावहता (Spectators to Violation): डिजिटल युग ने सब कुछ बदल दिया है। अब जजों को केवल विवरणों का मूल्यांकन नहीं करना पड़ता, बल्कि उन्हें सीधे उस हिंसा और मानवीय गरिमा के हनन को अपनी आंखों से देखना पड़ता है। कानून यह तो देखता है कि डिजिटल फाइलें मैनुपुलेट (छेड़छाड़) न हों, लेकिन यह भूल जाता है कि ये फाइलें इंसानी दिमाग को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं।
ट्रेनिंग भी बेअसर: अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी पुलिस या कानूनी ट्रेनिंग किसी इंसान को ऐसे जहरीले और अश्लील कंटेंट (Toxic Material) के मानसिक दुष्प्रभावों से पूरी तरह नहीं बचा सकती। कानूनी पेशेवरों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना कोई विलासिता (Luxury) नहीं है, बल्कि निष्पक्ष मानवीय निर्णय पर टिकी न्याय प्रणाली की बुनियादी जरूरत है।
हाई कोर्ट की बड़ी सिफारिशें: विधिक स्टाफ के लिए मानसिक सुरक्षा कवच
अदालत ने इस मानसिक और तंत्रिका संबंधी तनाव (Mental & Neurological Toll) से निपटने के लिए निम्नलिखित व्यापक उपायों की सिफारिश की है।
अनिवार्य मनोवैज्ञानिक स्क्रीनिंग: ग्राफिक और हिंसक डिजिटल साक्ष्य (Graphic Evidence) को संभालने वाले सभी पुलिसकर्मियों, वकीलों और न्यायिक अधिकारियों के लिए समय-समय पर अनिवार्य मनोवैज्ञानिक जांच हो।
नियमित काउंसलिंग सत्र: तनाव को कम करने और मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए विधिक कर्मियों के लिए काउंसलिंग अनिवार्य की जाए।
डीकंप्रेशन प्रोटोकॉल: अत्यधिक संवेदनशील और हिंसक फाइलों की समीक्षा करने के बाद विधिक अधिकारियों को तनावमुक्त (Decompress) होने के लिए विशेष प्रोटोकॉल और ब्रेक दिए जाएं।
ड्यूटी रोटेशन: एक ही विधिक अधिकारी या पुलिसकर्मी को लगातार ऐसे संवेदनशील और अश्लील मामलों की जांच में न लगाकर, कर्मियों का समय-समय पर रोटेशन (तबादला) किया जाए।
विधिक केस शीट: मद्रास हाई कोर्ट न्यायिक मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान रिकॉर्ड |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन |
| केस संदर्भ | सुजी बनाम राज्य (Suji v. State) |
| मूल कानूनी मुद्दा | डिजिटल साक्ष्य के कारण होने वाला ‘विपेरियस ट्रॉमा’ (Vicarious Trauma) |
| फैसले की तारीख | 14 जुलाई 2026 |
| प्रशासनिक सिफारिशें | जांच एजेंसियों और अदालतों में मनोवैज्ञानिक सहायता और डीकंप्रेशन प्रोटोकॉल लागू करने का निर्देश। |
जस्टिस वेंकटेश का यह पोस्टस्क्रिप्ट एक मानवीय और संवेदनशील न्यायपालिका की वकालत करता है। तकनीकी नियमों को मजबूत करने के साथ-साथ उन इंसानी दिमागों को भी बचाना जरूरी है जो इन नियमों को लागू करते हैं। अगर न्याय करने वाले ही मानसिक रूप से थक जाएंगे, तो समाज को सही मायनों में न्याय मिलना असंभव हो जाएगा। यह विधिक सुधारों की दिशा में एक क्रांतिकारी सोच है।

