ADJ Murder: वर्ष 2021 के बहुचर्चित अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) उत्तम आनंद हत्याकांड में झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है।
आरोपी ने चुराए ऑटो रिक्शा को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की तरफ मोड़ दिया
हाईकोर्ट के जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दोनों मुख्य आरोपियों लखन कुमार वर्मा और राहुल कुमार वर्मा की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास (Life Imprisonment) की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। अदालत ने कहा, यह महज एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि देश की न्यायपालिका की गरिमा पर एक सीधा और सुनियोजित हमला (An Affront To Judiciary) था। सीसीटीवी फुटेज, थ्री-डायमेंशनल (3D) फॉरेंसिक रीकंस्ट्रक्शन और वैज्ञानिक सबूत यह साबित करने के लिए काफी हैं कि चुराए गए ऑटो-रिक्शा को जानबूझकर जज उत्तम आनंद की तरफ मोड़ा गया था। जब प्रत्यक्ष और तकनीकी सबूत इतने अकाट्य हों, तो हत्या के पीछे का ‘मकसद’ (Motive) साबित न होना कोई मायने नहीं रखता।
मामला क्या है?: धनबाद का वो खौफनाक सुबह का मंजर
यह मामला 28 जुलाई 2021 की सुबह का है, जिसने पूरे देश के न्यायिक जगत को हिलाकर रख दिया था।
वारदात: धनबाद के रणधीर वर्मा चौक के पास जज उत्तम आनंद अपनी रोजमर्रा की सुबह की सैर (Morning Walk) पर निकले थे। इसी दौरान पीछे से आ रहे एक ऑटो-रिक्शा ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी।
सीबीआई जांच: शुरुआत में इसे एक साधारण हिट-एंड-रन का मामला माना जा रहा था, लेकिन घटना का सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भारी जन आक्रोश फैल गया। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के संज्ञान के बाद अगस्त 2021 में मामले की जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी गई।
ट्रायल कोर्ट का फैसला: ठीक एक साल बाद, 28 जुलाई 2022 को धनबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने दोनों आरोपियों को हत्या (धारा 302/34) और सबूत मिटाने (धारा 201/34) का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया है।
हाई कोर्ट की बड़ी बातें: सीसीटीवी फुटेज और फॉरेंसिक सबूतों ने खोली पोल
झारखंड हाई कोर्ट ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा पेश की गई वैज्ञानिक और तकनीकी कड़ियों की जमकर सराहना की और बचाव पक्ष की ‘एक्सीडेंट’ वाली दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया।
सड़क पर कोई पत्थर नहीं था (Fragile Defence): मुख्य आरोपी (ड्राइवर लखन) ने दलील दी थी कि सड़क पर एक पत्थर आ जाने के कारण ऑटो अनियंत्रित होकर जज से टकरा गया था। कोर्ट ने इसे ‘खोखला’ बताते हुए कहा कि जांच एजेंसियों के निरीक्षण और सीसीटीवी में दूर-दूर तक किसी पत्थर या बाधा का कोई नामोनिशान नहीं था। ऑटो बिल्कुल स्मूथ चल रहा था।
ड्राइवर के चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी: जजों ने कोर्ट रूम में खुद सीसीटीवी फुटेज देखी और नोट किया कि लखन वर्मा ने अचानक ऑटो को बाईं ओर मोड़ा, जहां जज वॉक कर रहे थे। टक्कर मारने के बाद उसने न तो ब्रेक लगाया, न गाड़ी मोड़ी और न ही कोई घबराहट दिखाई, बल्कि वह सामान्य रूप से गाड़ी चलाकर फरार हो गया। यह साफ तौर पर एक प्री-मेडिएटेड (पहले से तय) मर्डर था।
बिहेवियरल प्रोफाइलिंग (Behavioral Profiling): फॉरेंसिक विशेषज्ञों और क्राइम सीन प्रोफाइलर की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने माना कि आरोपी अच्छे मानसिक संतुलन में थे। वे जज का पीछा कर रहे थे और उनका इरादा साफ़ तौर पर जान लेने का ही था। 3D रीकंस्ट्रक्शन ने भी गणितीय रूप से साबित किया कि ऑटो का एंगल जानबूझकर जज की तरफ मोड़ा गया था।
एक टक्कर भी है मर्डर: कोर्ट ने वीरशाह सिंह बनाम पंजाब राज्य के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए साफ किया कि यदि कोई आरोपी जानबूझकर शरीर के किसी संवेदनशील हिस्से पर ऐसा प्रहार करता है जो प्रकृति के सामान्य नियम में मौत का कारण बनने के लिए पर्याप्त है, तो वह मर्डर (धारा 300 IPC) की श्रेणी में ही आएगा।
कोर्ट ने मददगार राहगीरों को सराहा
हाई कोर्ट ने उस दुखद सुबह का जिक्र करते हुए कहा कि हालांकि दुर्घटना के बाद कई लोग और जॉगर्स जज उत्तम आनंद को तड़पता छोड़कर आगे बढ़ गए, लेकिन कोर्ट ने उस राहगीर की जमकर तारीफ की जिसने तुरंत एक ई-रिक्शा का इंतजाम कर बेसुध जज को अस्पताल पहुंचाया। साथ ही उस एएनएम (ANM) नर्स की भी सराहना की जिसने आपातकालीन उपचार से ठीक पहले उन्हें प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराई थी।
विधिक केस शीट: झारखंड हाई कोर्ट जज उत्तम आनंद मर्डर रिव्यू (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान रिकॉर्ड |
| संबंधित अदालत | झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस रोंगोन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव |
| दोषी व्यक्ति | लखन कुमार वर्मा और राहुल कुमार वर्मा |
| अपराध की तारीख और स्थान | 28 जुलाई 2021, रणधीर वर्मा चौक, धनबाद |
| प्रासंगिक कानूनी धाराएं | आईपीसी की धारा 302/34 (हत्या) और 201/34 (सबूत मिटाना) |
| अदालत का अंतिम आदेश | विशेष सीबीआई कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा और दोषसिद्धि पूरी तरह बरकरार। |
जज उत्तम आनंद को तो वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन न्यायपालिका ने यह साफ कर दिया है कि अपने अधिकारियों की सुरक्षा और सम्मान के लिए वह किसी भी हद तक जाएगी। यह भारतीय न्याय व्यवस्था में वैज्ञानिक साक्ष्यों (Scientific Evidence) के बढ़ते प्रभाव की एक ऐतिहासिक मिसाल है।

