Cheap Medicine: कैंसर मरीजों के इलाज के अधिकार और दवा कंपनियों के पेटेंट अधिकारों के बीच संतुलन तलाशते हुए केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक प्रक्रिया शुरू की है।
पेटेंट कानून, 1970 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करें या नहीं
हाईकोर्ट के जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन की एकल पीठ ने देश के शीर्ष चिकित्सा और नियामक निकायों को इस मामले में पक्षकार बनाते हुए उनसे विस्तृत राय मांगी है। अदालत ने कहा, क्या स्तन कैंसर (Breast Cancer) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली बेहद महंगी पेटेंटेड दवा रिबोसिबलिब (Ribociclib) की जगह अब बिना पेटेंट वाली सस्ती दवा ‘पालबोसिबलिब’ (Palbociclib) का सुरक्षित और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है? मामले को लेकर देश की चार बड़ी विशेषज्ञ संस्थाओं से इस पर वैज्ञानिक राय दें। अदालत के इस फैसले से यह तय होगा कि क्या केंद्र सरकार को कैंसर की महंगी जीवन रक्षक दवाओं को आम जनता के लिए सुलभ बनाने के लिए पेटेंट कानून, 1970 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करने की जरूरत है या नहीं।
मामला क्या है?: पेटेंट कानून की आपातकालीन धाराएं बनाम सस्ती दवाएं
यह पूरा कानूनी विवाद इस बात पर केंद्रित है कि क्या सरकार को पेटेंटेड दवाओं की कीमतें कम करने के लिए दखल देना चाहिए।
पेटेंटेड दवा (Ribociclib): स्विट्जरलैंड की कंपनी नोवार्टिस (Novartis) द्वारा बनाई जाने वाली इस दवा की कीमत करीब ₹78,468.75 प्रति माह है। पेटेंट संरक्षण के कारण कोई अन्य भारतीय कंपनी इसे बिना अनुमति के नहीं बना सकती, जिससे यह आम मरीजों की पहुंच से बाहर है।
सस्ती वैकल्पिक दवा (Palbociclib): यह दवा पहले फाइजर (Pfizer) कंपनी के पेटेंट के अधीन थी, लेकिन अब इसका पेटेंट समाप्त (Off-patent) हो चुका है। अब कई भारतीय कंपनियां इसे बहुत कम कीमत पर देश में बना रही हैं।
अदालत का अंतरिम रुख: जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया कि यदि विशेषज्ञ यह प्रमाणित कर देते हैं कि पालबोसिबलिब का इस्तेमाल रिबोसिबलिब की जगह सुरक्षित रूप से किया जा सकता है, तो प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सरकार को पेटेंट अधिनियम की धारा 92 या 100 के तहत ‘अनिवार्य लाइसेंसिंग’ (Compulsory Licensing) लागू करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी।
क्या है अनिवार्य लाइसेंस (Compulsory License)?
धारा 92 (Patents Act): यह केंद्र सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल, अत्यधिक तात्कालिकता या सार्वजनिक गैर-व्यावसायिक उपयोग की स्थिति में पेटेंट धारक की सहमति के बिना किसी भी दवा को अन्य कंपनियों द्वारा बनाने की अनुमति देने का अधिकार देती है।
धारा 100 (Patents Act): यह सरकार को सरकारी उद्देश्यों के लिए किसी भी पेटेंटेड आविष्कार का उपयोग करने की शक्ति देती है।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
न्यायालय मित्र (Amicus Curiae) की दलील: कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायालय मित्र एडवोकेट मैत्रेयी सच्चिदानंद हेगड़े ने तर्क दिया कि किसी भी कंपनी का पेटेंट जनस्वास्थ्य (Public Health) के आड़े नहीं आना चाहिए। पेटेंट कानून खुद यह कहता है कि पेटेंटेड उत्पाद जनता को किफायती कीमतों पर मिलने चाहिए, इसलिए सरकार को अपनी शक्तियों का उपयोग कर दवा को सुलभ बनाना चाहिए।
दवा कंपनियों का विरोध: नोवार्टिस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत सिंह और एली लिली (Eli Lilly) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जी. श्रीकुमार ने इस मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि इसी वर्ग की दूसरी दवा (पालबोसिबलिब) का पेटेंट खत्म हो चुका है और वह भारत में बेहद कम दाम पर उपलब्ध है, इसलिए अनिवार्य लाइसेंसिंग की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है।
याचिकाकर्ता की मौत के बाद भी कोर्ट ने जारी रखी ‘स्वतः संज्ञान’ सुनवाई
इस मामले का इतिहास बेहद संवेदनशील और भावुक करने वाला है। जून 2022 में स्तन कैंसर से पीड़ित एक महिला मरीज ने इस महंगी दवा के खिलाफ याचिका दायर की थी। लेकिन इलाज के दौरान सितंबर 2022 में ही याचिकाकर्ता का निधन हो गया।
उनके निधन के बाद भी, केरल हाई कोर्ट ने इस मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए याचिका को बंद नहीं किया। कोर्ट ने इसे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए “इन री: जीवन रक्षक पेटेंट दवाओं की अत्यधिक कीमत” (In Re Exorbitant Pricing of Life Saving Patented Medicines) के शीर्षक से एक जनहित याचिका के रूप में सुनना जारी रखा।
हाल ही में, दवाओं तक पहुंच के लिए काम करने वाले वर्किंग ग्रुप के सह-संयोजकों (ज्योत्सना सिंह और के.एम. गोपाकुमार) ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था, जिसके बाद कोर्ट ने यह त्वरित कदम उठाया है।
विधिक केस शीट: केरल हाई कोर्ट कैंसर दवा पेटेंट समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्देश |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (High Court of Kerala) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन (Justice Harisankar V Menon) |
| अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी | एडवोकेट मैत्रेयी सच्चिदानंद हेगड़े |
| राय देने वाले विशेषज्ञ संस्थान | राष्ट्रीय कैंसर संस्थान (झज्जर), चितरंजन राष्ट्रीय कैंसर संस्थान (कोलकाता), रीजनल कैंसर सेंटर (तिरुवनंतपुरम) और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) |
| अगली सुनवाई की तारीख | 21 अगस्त 2026 (विशेषज्ञों की राय और काउंटर हलफनामों के साथ) |
केरल हाई कोर्ट ने विशेषज्ञ डॉक्टरों और नियामक (DCGI) से राय मांगकर एक बहुत ही व्यावहारिक रास्ता चुना है। यदि डॉक्टरों ने यह प्रमाणित कर दिया कि सस्ती दवा उतनी ही प्रभावी है, तो मरीजों को तुरंत राहत मिलेगी। लेकिन अगर डॉक्टरों ने कहा कि महंगी पेटेंटेड दवा का कोई विकल्प नहीं है, तो केंद्र सरकार पर पेटेंट कानून की आपातकालीन शक्तियों को लागू करने का भारी नैतिक और कानूनी दबाव बन जाएगा।

