Notary Public: नोटरी द्वारा धड़ल्ले से किए जा रहे फर्जी ‘कोर्ट मैरिज’ के धंधे पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
फर्जी विवाह लेख को खारिज कर नोटरी का लाइसेंस तत्क्ाल प्रभाव से किया सस्पेंड
हाईकोर्ट के जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने न केवल एक फर्जी विवाह विलेख (Marriage Deed) को खारिज किया, बल्कि शक्तियों का दुरुपयोग करने वाले एक नोटरी का लाइसेंस तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया। अदालत ने कहा, एक नोटरी (Notary Public) का काम केवल दस्तावेजों को प्रमाणित करना है, वह कोई ‘मैरिज ऑफिसर’ (विवाह अधिकारी) नहीं है। नोटरी द्वारा तैयार किया गया कोई भी विवाह या तलाक का हलफनामा या सर्टिफिकेट कानूनन पूरी तरह अवैध है। केवल वरमाला पहना देने या नोटरी के सामने दस्तखत कर देने से कोई शादी वैध नहीं हो जाती।
मामला क्या है?: इंस्टाग्राम पर फोटो डालने की धमकी और फर्जी ‘कोर्ट मैरिज’
यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) के जरिए हाई कोर्ट पहुंचा था।
याचिकाकर्ता का दावा: चंद्रपाल सिंह परिहार नामक युवक ने कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि उसकी ‘पत्नी’ को उसके ससुर (लड़की के पिता) ने अवैध रूप से बंधक बना रखा है।
पीड़िता की आपबीती: ग्वालियर के गिरवाई थाने की पुलिस ने जब युवती को कोर्ट में पेश किया, तो पूरी कहानी पलट गई। युवती ने बताया कि चंद्रपाल उसका दोस्त था, जो उस पर शादी का दबाव बना रहा था। उसने धमकी दी थी कि अगर उसने शादी नहीं की, तो वह उसकी तस्वीरें इंस्टाग्राम और फेसबुक पर अपलोड कर देगा।
फर्जी विलेख: डर के मारे लड़की कोर्ट परिसर गई, जहां एक वकील ने कुछ कागजों और रजिस्टर पर दस्तखत करा लिए और कहा कि तुम्हारी ‘कोर्ट मैरिज’ हो गई। इसके बाद बाहर आकर उन्होंने एक-दूसरे को वरमाला पहना दी। युवती ने स्पष्ट किया कि कोई ‘सप्तपदी’ (सात फेरे) या धार्मिक रीति-रिवाज नहीं हुए थे। वह अपने माता-पिता के साथ रहकर आगे पढ़ना चाहती है।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: नोटरी का लाइसेंस सस्पेंड, केस दर्ज करने के आदेश
मामले की केस डायरी में जब कोर्ट ने नोटरी राघवेंद्र समाधिया (दतिया) द्वारा अटेस्टेड ‘विवाह पंजीकरण विलेख’ देखा, तो जजों ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई।
नोटरियों को चेतावनी: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि नोटरी राघवेंद्र समाधिया ने अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर जाकर एक ‘रजिस्ट्रेशन ऑफिसर’ की तरह काम किया और लड़की को यह विश्वास दिलाया कि उसकी कानूनी शादी हो चुकी है। यह शक्तियों का घोर दुरुपयोग है।
निलंबन का आदेश: कोर्ट ने आदेश दिया, “चूंकि नोटरी राघवेंद्र समाधिया ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन कर एक कथित विवाह को पंजीकृत करके नागरिकों के अधिकारों को नुकसान पहुंचाया है, इसलिए उनका नोटरी लाइसेंस तत्काल प्रभाव से सस्पेंड किया जाता है। वे तुरंत अपना काम बंद करें और अपना मूल रजिस्टर कोर्ट में जमा करें।”
कारण बताओ नोटिस: कोर्ट ने नोटरी को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न उनका लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिया जाए और उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई 2026 को होगी।
पुराना विधिक नियम और कानून मंत्रालय का आदेश
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ‘ललित रजक बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ और ‘बुंदेल सिंह लोधी बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ के पुराने फैसलों का हवाला दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्रीय कानून मंत्रालय (Union Law Ministry) के अक्टूबर 2024 के उस आदेश का भी जिक्र किया, जिसमें देश के सभी नोटरियों को विवाह या तलाक के दस्तावेज तैयार करने या प्रमाणित करने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
विधिक स्थिति: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत एक वैध विवाह के लिए धार्मिक रीति-रिवाजों (जैसे सप्तपदी) का होना अनिवार्य है। वहीं, कानूनी विवाह के लिए ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (Special Marriage Act) के तहत सरकार द्वारा नियुक्त मैरिज रजिस्ट्रार के समक्ष पंजीकरण कराना होता है। नोटरी के स्टैम्प पेपर पर हुई शादी की कानून की नजर में शून्य (Void) वैल्यू है।
विधिक केस शीट: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट नोटरी विवाह अधिकार समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला |
| संबंधित नोटरी | राघवेंद्र समाधिया, नोटरी पब्लिक, दतिया (लाइसेंस तत्काल निलंबित) |
| मुख्य कानूनी विसंगति | नोटरी द्वारा ‘विवाह पंजीकरण अधिकारी’ की तरह फर्जी विवाह विलेख तैयार करना |
| पीड़िता को संरक्षण | कोर्ट ने युवती को माता-पिता के साथ जाने और पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी |
| पुलिस को निर्देश | आरोपी चंद्रपाल पर BNS और IT एक्ट के तहत 10 दिनों में जांच पूरी करने का आदेश |
| अगली विधिक सुनवाई | 28 जुलाई 2026 |
अदालत ने ब्लैकमेलिंग के शिकार बच्चों को सुरक्षा देने के साथ-साथ कानूनी बिचौलियों और शक्तियों का दुरुपयोग करने वाले नोटरियों को कड़ा संदेश दिया है कि न्यायपालिका अब ऐसी विधिक अराजकता को बर्दाश्त नहीं करेगी।

