Sunday, July 19, 2026
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AI Role: एआई को हाई-रिस्क न्यायिक कार्यों में तैनात करना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा…SCAORA की चिंता एआई के ड्राफ्ट बिल पर यह है

AI Role: अदालती कामकाज में एआई के बढ़ते इस्तेमाल और उसके संभावित खतरों को लेकर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सतर्क रुख अपनाया है।

Supreme Court Advocates-on-Record Association ने ड्राफ्ट रेगुलेशन, 2026 दी टिप्पणी

एसोसिएशन की कार्यकारी समिति ने ‘अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग के लिए ड्राफ्ट रेगुलेशन, 2026′ पर अपनी विस्तृत टिप्पणियां और सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट की एआई कमेटी के अध्यक्ष जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे को सौंपी हैं। कहा, न्यायिक प्रणाली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करते समय तकनीकी रफ्तार से ज्यादा न्यायिक स्वतंत्रता और वादियों के अधिकारों (Litigants’ Rights) को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। समकालीन एआई प्रणालियां यह समझाने में पूरी तरह असमर्थ हैं कि वे अपने निष्कर्ष या परिणाम (Outputs) पर कैसे पहुंचीं। ऐसे में, बिना पुख्ता सुरक्षा उपायों के एआई को हाई-रिस्क न्यायिक कार्यों में तैनात करना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा।

ड्राफ्ट रेगुलेशन पर SCAORA की आपत्तियां: ‘ब्लैक बॉक्स’ और ‘एआई मतिभ्रम’

सुप्रीम कोर्ट की एआई कमेटी (जिसमें जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं) द्वारा जून में जारी किए गए ड्राफ्ट नियमों का SCAORA की उप-समिति ने धारा-वार (Clause-by-Clause) विश्लेषण किया और निम्नलिखित मुख्य चिंताओं को रेखांकित किया।

ब्लैक बॉक्स पैराडॉक्स (Black Box Paradox): SCAORA ने ड्राफ्ट नियमों में मौजूद एक बड़े अंतर्विरोध की आलोचना की है। एक तरफ नियम ‘एक्सप्लेनेबिलिटी’ (Explainability – यानी एआई कैसे काम करता है, यह समझाने की क्षमता) की मांग करते हैं, और दूसरी तरफ अपारदर्शी (Opaque) एआई सिस्टम के उपयोग की अनुमति भी देते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आधुनिक जेनेरेटिव एआई जटिल न्यूरल नेटवर्क पर काम करते हैं, जिनकी आंतरिक तर्क प्रक्रिया को इंसानों द्वारा सत्यापित नहीं किया जा सकता। ऐसे में हाई-रिस्क न्यायिक कार्यों में इन ‘ब्लैक बॉक्स’ प्रणालियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगना चाहिए।

जवाबदेही का संकट: ड्राफ्ट नियम एआई का उपयोग करने वाले न्यायाधीशों और अदालती अधिकारियों पर अंतिम जवाबदेही डालते हैं। लेकिन अखाड़े का सवाल है कि जब एआई की तर्क प्रक्रिया ही समझ से परे (Incomprehensible) होगी, तो कोई न्यायाधीश उसकी सत्यता की व्यावहारिक जिम्मेदारी कैसे ले सकता है?

एआई मतिभ्रम (AI Hallucinations): रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ‘पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड’ का हवाला दिया गया है, जिसमें कोर्ट ने फर्जी या एआई-जनरेटेड काल्पनिक कानूनी नजीरों (Hallucinated Precedents) के प्रति ‘जीरो-टॉलरेंस’ (शून्य-सहनशीलता) का रुख अपनाया था। एसोसिएशन ने मांग की है कि अदालत की हर प्रक्रिया में एआई आउटपुट के लिए ‘ह्यूमन-इन-द-लूप’ (मानवीय निगरानी) अनिवार्य हो।

ऑटोमेशन बायस (Automation Bias): अत्यधिक कार्यभार के कारण न्यायाधीश और कोर्ट स्टाफ मशीन द्वारा तैयार किए गए परिणामों पर आंख मूंदकर भरोसा (Deference) करने लग सकते हैं। प्रशासनिक कार्य जैसे मामलों की लिस्टिंग या कमियां ढूंढना भी वादियों के अधिकारों को प्रभावित करता है, इसलिए वहां भी एआई का सीमित उपयोग होना चाहिए।

डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) और विदेशी कंपनियों पर चिंता

SCAORA ने देश के न्यायिक डेटा की सुरक्षा को लेकर सबसे बड़ा इनपुट दिया है।

विदेशी कंपनियों पर निर्भरता: रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि भारतीय न्यायिक डेटा को विदेशी प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा नियंत्रित एआई बुनियादी ढांचे (AI Infrastructure) के माध्यम से प्रोसेस किया जा सकता है।

संप्रभु बुनियादी ढांचा: यह पुरजोर सिफारिश की गई है कि सभी अदालती डेटा को देश के संप्रभु बुनियादी ढांचे (Sovereign Infrastructure) के भीतर ही रखा जाना चाहिए।

मौजूदा प्रणालियों का ऑडिट: सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से उपयोग की जा रही एआई प्रणालियों जैसे SUPACE, SUVAS, रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन सेवाओं, एआई-assisted ई-फाइलिंग और SuSahayak का तत्काल स्वतंत्र ऑडिट कराया जाना चाहिए।

संवैधानिक आधार पर सवाल: हाई कोर्ट्स पर थोपे नहीं जा सकते नियम

एसोसिएशन ने इस ड्राफ्ट रेगुलेशन के संवैधानिक आधार पर भी उंगली उठाई है। रिपोर्ट के अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत बनाए जा रहे हैं या अनुच्छेद 142 के तहत। SCAORA का तर्क है कि अनुच्छेद 145 सुप्रीम कोर्ट को अपनी प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति तो देता है, लेकिन यह शीर्ष अदालत को देश के उच्च न्यायालयों (High Courts) पर बाध्यकारी नियम थोपने का अधिकार नहीं देता, क्योंकि हाई कोर्ट्स के पास स्वतंत्र नियम बनाने की अपनी संवैधानिक शक्तियां हैं।

विधिक सिफारिश शीट: SCAORA बनाम ड्राफ्ट एआई रेगुलेशन (2026)

कानूनी और तकनीकी श्रेणियांSCAORA की विधिक आपत्तियां और मुख्य सिफारिशें
प्रस्तुतकर्ता संस्थासुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA)
प्राप्तकर्ता विधिक प्राधिकारीजस्टिस पी.एस. नरसिम्हा (अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट एआई कमेटी)
एआई उप-समिति के प्रमुखएडवोकेट देवव्रत (अध्यक्ष), निखिल जैन, युगंधरा पवार झा
मुख्य तकनीकी आपत्ति‘ब्लैक बॉक्स’ एआई सिस्टम की अपारदर्शिता और एआई मतिभ्रम (Hallucinations)
डेटा सुरक्षा मांगन्यायिक डेटा को विदेशी क्लाउड/कंपनियों के बजाय संप्रभु इंफ्रास्ट्रक्चर में रखना
अंतिम विधिक मांगएआई का चरणबद्ध रोलआउट (Phased Rollout) और बार (Bar) का पर्याप्त प्रतिनिधित्व

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा द्वारा इन सिफारिशों पर व्यापक विचार-विमर्श का आश्वासन यह दर्शाता है कि भविष्य में भारतीय अदालतों के लिए जो अंतिम एआई नियमावली बनेगी, वह तकनीकी रूप से उन्नत होने के साथ-साथ विधिक रूप से अधिक सुरक्षित और संप्रभु होगी।

यह है Draft Regulations for the Use of Artificial Intelligence (AI) in Courts, 2026

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