Altruistic Surrogacy: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निःसंतान दंपति को बड़ी राहत देते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत निर्धारित उम्र सीमा पर जिरह
हाईकोर्ट के जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी और जस्टिस शेखर बी. सराफ की खंडपीठ ने सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 की धारा 4(iii)(v)(c)(I) के तहत तय उम्र सीमा के कठोर क्रियान्वयन को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता महिला को परोपकारी सरोगेसी (Altruistic Surrogacy) के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दे दी है। सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत निर्धारित उम्र सीमा का कड़ाई से और यांत्रिक रूप से पालन करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत मान्यता प्राप्त प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। यदि किसी दंपति ने कानून लागू होने से पहले ही आईवीएफ (IVF) या सरोगेसी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, तो केवल उम्र सीमा पार हो जाने के आधार पर उन्हें संतान प्राप्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामला क्या है?: 17 साल का इंतजार और कानून लागू होने की पेचीदगी
पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता दंपति की शादी को 17 साल से अधिक हो चुके हैं। चिकित्सा उपचार और कई बार आईवीएफ (IVF) प्रक्रियाएं विफल होने के बाद डॉक्टरों ने उन्हें सरोगेसी अपनाने की सलाह दी थी।
विवाद का कारण: सरोगेसी प्रक्रिया शुरू करने के दौरान याचिकाकर्ता (पत्नी) की उम्र 50 वर्ष से थोड़ी अधिक हो गई।
कानूनी अड़चन: 25 जनवरी 2022 को लागू हुए ‘सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021’ के अनुसार, सरोगेसी चाहने वाली महिला (Intending Woman) की उम्र 23 से 50 वर्ष के बीच ही होनी चाहिए। चूंकि महिला की उम्र 50 वर्ष से अधिक हो चुकी थी, इसलिए संबंधित अधिकारियों ने सरोगेसी प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
हाई कोर्ट के 3 मुख्य विधिक निष्कर्ष (Key Legal Principles)
अनुच्छेद 21 के तहत ‘प्रजनन स्वायत्तता’ मौलिक अधिकार
अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) में किसी व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार शामिल है कि वह अपने परिवार और संतानोत्पत्ति के संबंध में निर्णय ले सके। कानून की किसी धारा का कठोर लागू होना इस संवैधानिक अधिकार का हनन नहीं कर सकता।
कानून लागू होने से पहले शुरू हुई प्रक्रियाओं को सुरक्षा
खंडपीठ ने माना कि चूंकि दंपति ने 25 जनवरी 2022 (कानून लागू होने की तिथि) से पहले ही इलाज और आईवीएफ (IVF)/सरोगेसी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, इसलिए उन पर सरोगेसी अधिनियम की धारा 4 के कठोर उम्र प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।
सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरों (Precedents) का हवाला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों पर भरोसा जताया।
अरुण मुथुवेल बनाम भारत संघ (2024): जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने उन दंपतियों को राहत दी थी जिन्होंने 25 जनवरी 2022 से पहले एम्ब्रियो फ्रीज (Embryo Frozen) करा लिए थे।
विजया कुमारी एस. व अन्य बनाम भारत संघ (2025): जिसमें इसी तरह के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सरोगेसी की अनुमति दी गई थी।
अदालत का अंतिम आदेश (Court’s Directions)
धारा 4 की छूट: याचिकाकर्ताओं पर सरोगेसी एक्ट की धारा 4 (iii) (v) (c) (I) के तहत तय उम्र सीमा लागू नहीं होगी।
आवेदन दाखिल करने की अनुमति: दंपति को निर्देश दिया गया कि वे मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO), लखनऊ या संबंधित अथॉरिटी के समक्ष 3 सप्ताह के भीतर सरोगेसी एक्ट की धारा 35 के तहत उचित आवेदन जमा करें।
समयबद्ध निर्णय: सीएमओ/सक्षम प्राधिकारी को आदेश दिया गया कि वे याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दें और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों तथा सरोगेसी कानून की भावना को ध्यान में रखते हुए कारण सहित (Reasoned Order) आदेश पारित करें। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रोहन पाठक और केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने पैरवी की।
केस मैट्रिक्स: इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला
| कानूनी और प्रक्रियात्मक बिंदु | अदालत द्वारा तय की गई स्थिति |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Division Bench) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी और जस्टिस शेखर बी. सराफ |
| मूल विधिक मुद्दा | क्या सरोगेसी एक्ट 2021 की 50 वर्ष की उम्र सीमा का कठोर पालन मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है? |
| संबंधित कानून | सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 की धारा 4(iii)(v)(c)(I) एवं धारा 35 |
| अदालत का फैसला | याचिका मंजूर; उम्र सीमा में छूट देते हुए CMO लखनऊ को प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश। |

