Friday, July 31, 2026
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Promotional Pay Scales: अपनी ही गलती का फायदा नहीं उठा सकता नियोक्ता…गलत तरीके से बर्खास्त जजों को पदोन्नति वेतनमान से वंचित संभव नहीं

केस मैट्रिक्स: SC Ruling on Reinstatement & Promotional Pay Scales

पहलूविवरण
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय पीठजस्टिस जे.बी. पारदीवाला एवं जस्टिस मनोज मिश्रा
पक्षकारराजस्थान हाई कोर्ट (आवेदक) बनाम अभय जैन (पूर्व में डिस्चार्ज न्यायिक अधिकारी)
मुख्य कानूनी सिद्धांत“No one can take advantage of their own wrong” (कोई अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकता)
राहत/वेतनमान16 जुलाई 2018 से Selection Scale और 16 जुलाई 2021 से Super Time Scale का अधिकार
अनुपालन समय सीमा3 महीने के भीतर बकाए (Arrears) का पुनर्भुगतान

Promotional Pay Scales: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए फैसला सुनाया है कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को गलत तरीके से सेवा से मुक्त (Discharged) कर दिया गया था और बाद में पुनर्नियोजित (Reinstate) किया गया, तो उसे केवल इसलिए करियर प्रोग्रेशन या पदोन्नति वेतनमान (Promotional Pay Scales) देने से मना नहीं किया जा सकता क्योंकि अंतरिम अवधि के लिए उसकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACRs) उपलब्ध नहीं हैं।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला (Justice J.B. Pardiwala) और जस्टिस मनोज मिश्रा (Justice Manoj Misra) की पीठ ने स्पष्ट किया कि कोई भी नियोक्ता अपने ही गलत कृत्य (Wrongful Act) का लाभ उठाकर कर्मचारी को उसके वैधानिक लाभों से वंचित नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की मुख्य बातें

अदालत ने राजस्थान उच्च न्यायालय की उस स्पष्टीकरण याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें बिना ACRs के उच्च वेतनमान देने पर मार्गदर्शन मांगा गया था।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: चूंकि राजस्थान हाई कोर्ट स्वयं न्यायिक अधिकारी की गलत बर्खास्तगी और उसके परिणामस्वरूप आवश्यक ACRs की अनुपलब्धता के लिए जिम्मेदार था, इसलिए इस परिस्थिति का सहारा लेकर अधिकारी को सेलेक्शन स्केल (Selection Scale) या सुपर टाइम स्केल (Super Time Scale) देने से मना नहीं किया जा सकता। नियोक्ता को उस कमी पर भरोसा करने की अनुमति देना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण होगा जिसे उसने स्वयं निर्मित किया है। अधिकारी की पात्रता का मूल्यांकन उसकी सेवा के दौरान उपलब्ध शेष वैध ACRs के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

मामला क्या था?: अभय जैन बनाम राजस्थान हाई कोर्ट

  1. बर्खास्तगी और बहाली: अभय जैन को 2013 में राजस्थान में न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था और 2016 में सेवा से डिस्चार्ज कर दिया गया। मार्च 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और सेवा की निरंतरता (Continuity of Service), वरिष्ठता और 50% पिछले वेतन (Back Wages) के साथ उनकी बहाली का आदेश दिया।
  2. ACR का मुद्दा: बहाली के बाद, जब उनके सेलेक्शन स्केल (16 जुलाई 2018 से) और सुपर टाइम स्केल (16 जुलाई 2021 से) पर विचार किया गया, तो राजस्थान हाई कोर्ट ने यह कहते हुए रोक लगा दी कि 2016 से 2021 तक की अवधि की ACRs उपलब्ध नहीं हैं, क्योंकि उस दौरान उन्होंने कोई न्यायिक कार्य नहीं किया था।
  3. अदालत का निर्देश: शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि जैन की पात्रता का निर्धारण उनकी 2013 और 2014 की उपलब्ध वैध ACRs के आधार पर किया जाए। कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट को आदेश दिया कि वह तीन महीने के भीतर उनके वेतन का पुनर्मूल्यांकन करे, सभी परिणामी लाभों को संशोधित करे और बकाए (Arrears) का भुगतान करे।

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