परिचर्चा मैट्रिक्स एवं प्रमुख उद्धरण (Key Highlights)
| विचारणीय बिंदु / विषय | जस्टिस जोयमाल्या बागची के विचार |
| कार्यक्रम एवं आयोजक | 5वां जस्टिस एच.आर. खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोजियम (CAN Foundation) |
| मुख्य विषय (Theme) | “From Classrooms to Courtrooms: Syllogisms, Stories & Lessons of Life from the Bench” |
| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता | कानूनी जीत के बावजूद सड़क पर भीड़तंत्र द्वारा अधिकारों को छीना जा सकता है। |
| न्यायिक सुरक्षा | सुरक्षा स्टेटस का प्रतीक नहीं, बल्कि न्यायाधीश को बिना किसी डर के फैसला सुनाने की शक्ति देती है। |
| अंतिम संदेश | “सुप्रीम कोर्ट के जज न्याय की घोषणा (Declare) कर सकते हैं, लेकिन हर भारतीय के घर तक न्याय पहुंचाने का काम युवा वकीलों का है।” |
Justice Joymalya Bagchi:अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech), भीड़तंत्र (Mob Rule) और कानून के शासन (Rule of Law) के बीच के संवेदनशील अंतर पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, जस्टिस जोयमाल्या बागची ने एक बेहद गंभीर और विचारणीय बयान दिया है।
‘कैन फाउंडेशन’ (CAN Foundation) द्वारा आयोजित 5वें जस्टिस एच.आर. खन्ना मेमोरियल नेशनल सिम्पोजियम के दौरान लॉ स्टूडेंट्स से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा: “यदि लोगों के दिलों में न्याय का दीपक बुझ जाए, तो दुनिया की कोई भी अदालत उसे बचा नहीं सकती। उन्होंने कहा कि अदालत के भीतर किसी पुस्तक या विचार के पक्ष में कानूनी जीत हासिल कर लेना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह आजादी कोर्टरूम के बाहर भी जीवित रहेगी।
तसलीमा नसरीन केस का अनुभव: “जब कोर्ट की जीत पर भारी पड़ा भीड़तंत्र”
जस्टिस बागची ने अपने वकालत के दिनों का उदाहरण देते हुए प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन की पुस्तक पर सरकार द्वारा लगाए गए बैन के खिलाफ लड़ी गई कानूनी लड़ाई को याद किया:
- अदालत में जीत: उन्होंने बताया कि हमने कोर्ट के भीतर इस मामले को लड़ा और सफलतापूर्वक जीत भी हासिल की। अदालत ने किताब पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था।
- सड़क पर हार: लेकिन कोर्टरूम के बाहर जो स्थिति बनी, उसने पूरी कहानी बदल दी। व्यापक सार्वजनिक अव्यवस्था और विरोध प्रदर्शनों के चलते अंततः तसलीमा नसरीन के वीजा को सीमित कर दिया गया और उन्हें भारत छोड़ना पड़ा।
- भीड़तंत्र का प्रभाव: जस्टिस बागची ने कहा, “कोर्टरूम के बाहर जो हुआ वह इस कड़वी सच्चाई का वसीयतनामा है कि भले ही आप कानून की अदालत में जीत जाएं, फिर भी आप उस स्वतंत्रता का आनंद नहीं ले सकते, क्योंकि कानून के शासन (Rule of Law) को भीड़ के शासन (Rule of the Mob) द्वारा दबाया जा सकता है।”
मुख्य कानूनी एवं संवैधानिक विचार (Key Takeaways)
जस्टिस बागची ने बातचीत के दौरान कई अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक और न्यायिक पहलुओं पर प्रकाश डाला।
अभिव्यक्ति की आजादी बनाम राज्य का दृष्टिकोण (State vs. Free Speech)
जब उनसे पूछा गया कि फेक न्यूज पर लगाम लगाने और अभिव्यक्ति की आजादी के बीच संतुलन कैसे बने, तो उन्होंने कहा, “जब भी कोई अभिव्यक्ति किसी की संवेदनशील भावनाओं (Raw Nerves) को छूती है, तो सरकारें हमेशा सुरक्षित रास्ता चुनती हैं। वे अभिव्यक्ति की रक्षा नहीं करतीं; वे अभिव्यक्ति को नियंत्रित करती हैं ताकि जनाक्रोश और आक्रोश को शांत रखा जा सके।“
उन्होंने आगे जोड़ा कि यह केवल भारत की बात नहीं है, बल्कि दुनिया भर की सरकारों का यही सुसंगत दृष्टिकोण रहा है कि वे अधिकारों के विस्तार के बजाय व्यवस्था (Order) बनाए रखने की ओर अधिक झुकती हैं।
न्यायिक सुरक्षा बनाम स्टेटस (Judicial Security vs. Status)
न्यायाधीशों की सुरक्षा पर बात करते हुए जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि भारत में अक्सर ‘सुरक्षा’ को ‘स्टेटस’ (रुतबे) से जोड़कर देखने की भूल की जाती है।
- वास्तविक सुरक्षा: उन्होंने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से सुरक्षा का मतलब है—न्यायाधीश को भयमुक्त वातावरण देना ताकि वह बिना किसी डर के लोकप्रिय या अप्रिय (Unpopular) फैसला सुना सके।
- डिजिटल सुरक्षा: उन्होंने रेखांकित किया कि आज के दौर में न्यायाधीशों की शारीरिक सुरक्षा के साथ-साथ उनकी डिजिटल मौजूदगी (Digital Presence) को भी सुरक्षित करना बेहद जरूरी है।
‘किताबी कानून’ और ‘व्यावहारिक कानून’ के बीच की खाई
गिरफ्तारी के आधार बताने जैसे स्थापित कानूनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार दोहराए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कानून एक ‘मानक स्थिति’ (Normative State) में मौजूद रहता है, लेकिन जब लोग उसे अनुभव करते हैं तो वह एक ‘गतिशील स्थिति’ (Kinetic State) में होता है।
- इस खाई को केवल एसओपी (SOPs) से नहीं भरा जा सकता।
- इसके लिए युवा वकीलों को आगे आना होगा जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचा सकें।

