Monday, August 3, 2026
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Criminal Justice System: मर्डर ट्रायल में 22 साल और अपील में 22 साल और…44 साल की देरी, झारखंड HC और वहां की सरकार से मांगी रिपोर्ट

केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुउच्चतम न्यायालय का अवलोकन एवं आदेश
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जे.बी. पारडीवाला एवं जस्टिस के. विनोद चंद्रन
याचिकाकर्तासाइमन सोरेन (Simon Soren)
घटना का वर्ष1981 (हत्या का आरोप)
निचली अदालत का फैसला2002 (22 साल का समय लगा)
हाई कोर्ट की अपील का फैसला2024 (और 22 साल का समय लगा; कुल = 44 वर्ष)
अदालत का मुख्य आदेश1. झारखंड सरकार व हाई कोर्ट से विलंब पर विस्तृत रिपोर्ट तलब।
2. 70 वर्षीय बीमार अभियुक्त की जेल अस्पताल से मेडिकल रिपोर्ट मांगी गई।
अगली सुनवाई की तिथि19 अगस्त 2026

Criminal Justice System: भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) में अत्यधिक और अस्वाभाविक देरी पर गहरा दुख और चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कड़ा रुख अपनाया है।

जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस असाधारण विधिक विलंब पर झारखंड सरकार और झारखंड उच्च न्यायालय से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। हत्या के एक मामले की सुनवाई में 22 साल और उसके बाद हाई कोर्ट में अपील के निपटारे में और 22 साल—यानी कुल 44 साल की देरी को शीर्ष अदालत ने बेहद “परेशान करने वाला” (Very Disturbing) करार दिया है।

विधिक पृष्ठभूमि: 1981 की घटना, 2002 में फैसला और 2024 में अपील का निपटारा

यह चौंकाने वाला मामला याचिकाकर्ता साइमन सोरेन (Simon Soren) से जुड़ा है।

  • 1981 (घटना और ट्रायल की शुरुआत): याचिकाकर्ता के खिलाफ वर्ष 1981 में हत्या का मुकदमा (Murder Trial) शुरू हुआ था।
  • 1994 (CrPC धारा 313 का बयान): अभियुक्त का दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत बयान घटना के 13 साल बाद यानी 1994 में दर्ज किया गया।
  • 2002 (ट्रायल कोर्ट का फैसला): निचली अदालत को मुकदमा पूरा करने और दोषी ठहराने में 22 साल लग गए और फैसला 2002 में आया।
  • 2024 (हाई कोर्ट का फैसला): सजा के खिलाफ झारखंड हाई कोर्ट में दायर अपील को तय होने में और 22 साल लग गए, जिसके बाद वर्ष 2024 में हाई कोर्ट ने अपील का निपटारा किया।

सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल: “44 साल क्यों लगे?”

जस्टिस पारडीवाला और जस्टिस विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की भयावहता पर हैरानी जताते हुए कहा, यह नोट करना बेहद विचलित करने वाला है कि हालांकि यह घटना वर्ष 1981 की है, फिर भी ट्रायल कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता को दोषी ठहराने का आदेश 2002 का है। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि ट्रायल कोर्ट को ट्रायल पूरा करने में 22 साल क्यों लगे?

अदालत ने आगे कहा: इसके अलावा, हम यह जानकर भी बहुत परेशान हैं कि CrPC की धारा 313 के तहत बयान 1994 में दर्ज किया गया था और उसके बाद 2002 में फैसला सुनाया गया। यहां तक कि झारखंड उच्च न्यायालय को भी ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को चुनौती देने वाली अपील का फैसला करने में 22 साल लग गए। यह देरी बहुत विचलित करने वाली है।

जेल अस्पताल से स्वास्थ्य रिपोर्ट तलब

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि साइमन सोरेन की उम्र अब लगभग 70 वर्ष हो चुकी है और वे वर्तमान में जेल के अस्पताल में भर्ती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत कार्रवाई की।

  1. अस्पताल रिपोर्ट: कोर्ट ने जेल अस्पताल के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ता की बीमारियों और उन्हें दिए जा रहे इलाज की पूरी रिपोर्ट पेश करें।
  2. जवाबदेही: झारखंड राज्य और झारखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है कि आखिर इस मुकदमे और अपील के निपटारे में 44 साल का समय क्यों लगा।
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