Thursday, August 6, 2026
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Proof Of Saptapadi Ceremony: दूसरे विवाह की शिकायत पर संज्ञान के चरण में सप्तपदी रस्म निभाई या नहीं …यह तो ट्रायल का विषय है, यहां केस पढ़ें

केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
मामले का नामउत्तराखंड हाई कोर्ट CrPC धारा 482 याचिका (हलद्वानी/नैनीताल)
माननीय न्यायाधीशन्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह
संबंधित कानूनी धाराएंIPC की धारा 494 (Bigamy) एवं 504; CrPC की धारा 482
संबद्ध सुप्रीम कोर्ट नजीरK. Neelaveni v. State (सप्तपदी का साक्ष्य ट्रायल का विषय है)
अदालत का फैसलायाचिका खारिज; पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश बरकरार।

Proof Of Saptapadi Ceremony: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 (द्विविवाहम/Bigamy) के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय दिया है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की एकल पीठ ने के. नीलावेणी बनाम राज्य (K. Neelaveni v. State) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा जताते हुए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना है कि पति द्वारा किए गए कथित दूसरे विवाह में सप्तपदी (सात फेरे) जैसी आवश्यक रस्में निभाई गई थीं या नहीं, यह परीक्षण (Trial) का विषय है और “संज्ञान लेने (Taking Cognizance) या समन जारी करने के प्राथमिक चरण में इसकी गहराई से जांच नहीं की जा सकती।”

मामला क्या था? (The Background)

  1. पति पर द्विविवाहम (Bigamy) का आरोप: शिकायतकर्ता पत्नी ने आरोप लगाया कि 7 मार्च 1988 को उसका विवाह आवेदक-पति के साथ हुआ था। पहले विवाह के प्रभावी रहते हुए, उसके पति ने 4 जुलाई 2010 को कानूनी रूप से तलाक लिए बिना दूसरा विवाह कर लिया।
  2. समन आदेश और रिवीजन खारिज: CrPC की धारा 200 के तहत दर्ज बयान और पुलिस रिपोर्ट के आधार पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, हलद्वानी ने 4 अगस्त 2016 को पति को IPC की धारा 494 और 504 के तहत समन जारी किया। इसके खिलाफ दायर आपराधिक निगरानी (Criminal Revision) याचिका को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, नैनीताल ने 7 अगस्त 2021 को खारिज कर दिया था।
  3. हाई कोर्ट में धारा 482 के तहत याचिका: पति ने हाई कोर्ट का रुख किया और इलाहाबाद हाई कोर्ट के निशा बनाम यूपी राज्य निर्णय का हवाला देते हुए तर्क दिया कि हिंदू कानून के तहत सप्तपदी एक अनिवार्य रस्म है। चूंकि शिकायत में सप्तपदी के प्रमाण का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए धारा 494 के तहत कोई अपराध नहीं बनता और समन आदेश रद्द किया जाना चाहिए।

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Proof Of Saptapadi Ceremony: उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां (Key High Court Findings)

याचिका को खारिज करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णयों और सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला दिया।

उत्तराखंड हाई कोर्ट की टिप्पणी: “सप्तपदी की रस्म विवाह की उन आवश्यक रस्मों में से एक होगी जो विचारण (Trial) के दौरान ट्रायल कोर्ट के समक्ष विचारणीय होगी, और उस प्रश्न पर संज्ञान लेने या समन जारी करने के प्राथमिक चरण में विचार नहीं किया जा सकता।”

पहली पत्नी के लिए सबूत जुटाने की व्यावहारिक कठिनाई

अदालत ने शिकायतकर्ता पक्ष के इस तर्क को महत्वपूर्ण माना कि समन जारी करने से पहले ही विवाह की हर रस्म का सबूत मांगने से पहली पत्नी पर अत्यधिक बोझ (Onerous Burden) पड़ेगा, क्योंकि आम तौर पर पहली पत्नी को पति के दूसरे गुप्त विवाह को प्रत्यक्ष रूप से देखने या उसका साक्ष्य एकत्र करने का अवसर नहीं मिलता है।

परीक्षण (Trial) का विषय, न कि प्राथमिक संज्ञान का

सुप्रीम कोर्ट के के. नीलावेणी मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संज्ञान के चरण में केवल प्राथमिक दृष्टया (Prima Facie) मामला देखा जाता है। सप्तपदी हुई थी या नहीं, यह सबूतों के आधार पर ट्रायल के दौरान साबित होगा।

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