Saturday, August 8, 2026
HomeHigh CourtDismissal Of Police Constable: पुलिस कांस्टेबल की सीधे बर्खास्तगी संभव नहीं...ऐसा क्यों...

Dismissal Of Police Constable: पुलिस कांस्टेबल की सीधे बर्खास्तगी संभव नहीं…ऐसा क्यों का जवाब अनुशासनात्मक कार्यवाही के सिद्धांतों से समझें

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
संबंधित नियमU.P. Police Officers of the Subordinate Ranks (Punishment and Appeal) Rules, 1991 (Rule 8(2)(a))
संवैधानिक प्रावधानभारतीय संविधान का अनुच्छेद 311(2) का दूसरा उपबंध
मुख्य कानूनी सिद्धांतआपराधिक मामले में सजा के बाद सीधे बर्खास्तगी नहीं हो सकती; प्राधिकारी को सजा देने से पहले संबंधित कर्मचारी के ‘आचरण’ (Underlying Conduct) पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।
अदालत का निर्णयराज्य सरकार की अपील खारिज; अनुशासनात्मक प्राधिकारी को आचरण पर विचार कर नए सिरे से आनुपातिक निर्णय लेने का निर्देश।

Dismissal Of Police Constable: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आपराधिक दोषसिद्धि पर पुलिस कांस्टेबल को सीधे बर्खास्त नहीं किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अपील (Special Appeal) को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा, अनुशासनात्मक प्राधिकारी को उस आचरण पर विचार करना होगा जिसके कारण सजा हुई है। फैसले की व्याख्या करते हुए खंडपीठ ने कहा, उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी (अधीनस्थ रैंक) (दंड और अपील) नियमावली, 1991 के नियम 8(2)(a) के तहत किसी पुलिस कांस्टेबल को केवल इसलिए सेवा से बर्खास्त (Dismiss) नहीं किया जा सकता क्योंकि उसे किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराया गया है, जब तक कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) उस आचरण पर विचार न कर ले जिसके कारण वह दोषसिद्धि हुई है।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • आचरण पर विचार करना क्षेत्राधिकार की अनिवार्य शर्त:“ऐसे आचरण पर विचार करना सक्षम प्राधिकारी द्वारा बर्खास्तगी का दंड देने का क्षेत्राधिकार प्राप्त करने की एक अनिवार्य शर्त (Condition Precedent) है। याचिका में चुनौती दिया गया आदेश इस पहलू पर पूरी तरह से मौन है और इसमें कोई विवेक का प्रयोग (Application of Mind) नहीं झलकता। बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले, अनुशासनात्मक प्राधिकारी के लिए उस आचरण को तौलना अनिवार्य था और उसके बाद ही उपयुक्त सजा तय की जानी चाहिए थी।”
  • अनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality): अदालत ने कहा कि 1991 के नियमों के तहत तीन प्रमुख दंड उपलब्ध हैं—सेवा से हटाना (Removal), सेवा से बर्खास्तगी (Dismissal), और पद/वेतनमान में अवनति (Reduction in Rank)। इसलिए जब एक से अधिक प्रमुख दंड मौजूद हों, तो प्राधिकारी को आचरण की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष और आनुपातिक सजा चुनने के लिए उस आचरण का सूक्ष्म परीक्षण करना चाहिए।

Dismissal Of Police Constable: मामला क्या था? (Case Background)

  1. सजा और बर्खास्तगी
    • प्रतिवादी (पुलिस कांस्टेबल) को सत्र अदालत (Sessions Court) द्वारा धारा 304-B (दहेज हत्या), 201, 498-A आईपीसी और दहेज निषेध अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था और अधिकतम 10 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी।
    • इस दोषसिद्धि के आधार पर, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 25 जुलाई 2006 को 1991 के नियमों के नियम 8(2)(a) के तहत बिना किसी जांच के सीधे बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया।
  2. जेल से रिहाई और रिट याचिका
    • जेल से रिहा होने के तुरंत बाद कांस्टेबल ने 7 साल की देरी से हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
    • सिंगल जज (Single Judge) ने 3 अक्टूबर 2013 को इस आधार पर देरी को माफ कर दिया कि कांस्टेबल जेल में बंद था और सीधे कोर्ट नहीं आ सकता था। सिंगल जज ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए नए सिरे से कानून के अनुसार आदेश पारित करने का निर्देश दिया था।
  3. राज्य सरकार की विशेष अपील
    • राज्य सरकार ने इस फैसले को डबल बेंच में चुनौती दी और तर्क दिया कि आपराधिक अपील अभी भी लंबित है और 7 साल बाद दायर की गई याचिका ‘विलंब’ (Laches) के कारण खारिज होनी चाहिए थी।

Dismissal Of Police Constable: देरी और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर अदालत का रुख

  1. देरी की माफी (Condonation of Delay)
    • हाई कोर्ट ने राज्य के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जांच इस बात की होती है कि देरी का कारण कितना पर्याप्त है (Sufficiency of Cause), न कि देरी कितनी लंबी है।
    • कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मामलों (H.D. Bora एवं Mool Chandra) का हवाला देते हुए कहा कि केवल तकनीकी आधारों पर किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता। जेल में होना एक ऐसा कारण था जो कांस्टेबल के नियंत्रण से बाहर था।
  2. सिंगल जज के आदेश में हस्तक्षेप की सीमा
    • पीठ ने स्पष्ट किया कि अंतर-अदालत अपील (Intra-Court Appeal) में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब सिंगल जज का फैसला स्पष्ट रूप से गलत या विकृत (Demonstrably Erroneous/Perverse) हो। यदि एक तर्कसंगत विचार अपनाया गया है, तो अपील पीठ उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
33.9 ° C
33.9 °
33.9 °
52 %
6.7kmh
58 %
Sat
35 °
Sun
35 °
Mon
37 °
Tue
35 °
Wed
36 °