Sunday, August 9, 2026
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Consumer Dispute: कुत्ते को बचाने में क्षतिग्रस्त हुई कार; उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी और रिपेयर वर्कशॉप पर लगाया ₹2.3 लाख का जुर्माना

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (जुलाई 2026)
माननीय निकायजिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, ऊना (हिमाचल प्रदेश)
पीठडी. आर. ठाकुर (अध्यक्ष), मीनाक्षी राणा एवं अनूप कुमार (सदस्य)
संबंधित कानूनउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019)
मुख्य कानूनी सिद्धांतवाहन रिपेयर में अत्यधिक देरी करना और बीमा क्लेम का गलत/कम मूल्यांकन करना ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) है।
कुल राहत/मुआवजा₹1.3 लाख (मरम्मत खर्च) + ₹80,000 (मानसिक क्षतिपूर्ति) + ₹20,000 (कानूनी खर्च) = ₹2.3 लाख

Consumer Dispute: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (District Consumer Disputes Redressal Commission, Una) ने बीमा कंपनी (Insurer) और कार रिपेयर वर्कशॉप दोनों को सेवा में गंभीर कमी (Deficiency in Service) का दोषी ठहराया है।

अध्यक्ष डी. आर. ठाकुर तथा सदस्य मीनाक्षी राणा और अनूप कुमार की पीठ ने आवारा कुत्ते को बचाने के चक्कर में दुर्घटनाग्रस्त हुई कार की मरम्मत में महीनों की देरी करने और क्लेम की सही राशि न चुकाने पर दोनों पर ₹2.3 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है।

उपभोक्ता आयोग की मुख्य टिप्पणियां

  • वर्कशॉप और बीमा कंपनी की जिम्मेदारियां:“वाहन को समय पर ठीक करना रिपेयर वर्कशॉप का कर्तव्य था, और मरम्मत राशि का सही मूल्यांकन करना बीमा कंपनी का कर्तव्य था। इनके कारण शिकायतकर्ता को निश्चित रूप से मानसिक कष्ट सहना पड़ा है क्योंकि वह अपने वाहन का उपयोग नहीं कर सका।”
  • महीनों तक वाहन खड़े रखने पर फटकार: आयोग ने माना कि वर्कशॉप को केवल टोटल लॉस (Total Loss) के अनुमान पर महीनों तक कार खड़ी रखने के बजाय उसका तुरंत निरीक्षण कर मरम्मत शुरू करनी चाहिए थी। वहीं, बीमा कंपनी ने वास्तविक खर्च से काफी कम क्लेम आंककर सेवा में लापरवाही बरती।

मामला क्या था? (Case Background)

  1. दुर्घटना और विवाद
    • 17 मार्च 2024 को शिकायतकर्ता की बीमित कार सड़क पर आवारा कुत्ते को बचाने के प्रयास में दुर्घटनाग्रस्त हो गई।
    • वाहन को मरम्मत के लिए ‘ट्रिनिटी ऑटो’ (Trinity Auto) के वर्कशॉप में भेजा गया। शुरुआत में सर्वेक्षक द्वारा वाहन को ‘टोटल लॉस’ (पूर्ण क्षति) बताए जाने के कारण काम रोक दिया गया, लेकिन दो हफ्ते बाद बीमा कंपनी ने टोटल लॉस मानने से इनकार करते हुए मरम्मत का निर्देश दिया।
  2. मरम्मत में देरी और क्लेम में कटौती
    • वर्कशॉप ने एक महीने में कार देने का वादा किया था, लेकिन कार को नवंबर 2024 तक (करीब 8 महीने) बिना ठीक किए वर्कशॉप में ही खड़ा रखा गया।
    • जब कार ठीक हुई, तो बीमा कंपनी ने कुल बिल में से केवल ₹52,102 का आंशिक भुगतान किया और बाकी खर्च देने से मना कर दिया। वर्कशॉप ने बचा हुआ बकाया बिल न चुकाने पर कार देने से इनकार कर दिया, जिससे परेशान होकर उपभोक्ता ने आयोग का रुख किया।
  3. दोनों पक्षों का तर्क
    • वर्कशॉप का पक्ष: उन्होंने दलील दी कि सर्वेक्षक द्वारा टोटल लॉस संकेत मिलने के कारण काम में देरी हुई। कार नवंबर 2024 में चलने योग्य बना दी गई थी, लेकिन ग्राहक ने बकाया राशि नहीं चुकाई।
    • बीमा कंपनी का पक्ष: उन्होंने इनकार किया कि कार कभी टोटल लॉस घोषित की गई थी। कंपनी ने दावा किया कि सर्वेक्षक ने पाया कि वर्कशॉप का अनुमानित बिल बहुत अधिक था, इसलिए पॉलिसी के तहत स्वीकृत ₹52,103 का सीधा भुगतान कर दिया गया।

⚖️ उपभोक्ता आयोग का अंतिम आदेश

आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी और वर्कशॉप दोनों ही ग्राहक को हुई असुविधा और मानसिक प्रताड़ना के लिए जिम्मेदार हैं। आयोग ने निम्नलिखित राहत का आदेश दिया:

  1. बीमा कंपनी (Insurer) पर दायित्व:
    • मरम्मत लागत के रूप में ₹1,30000 (1.3 लाख रुपये) का अतिरिक्त भुगतान।
    • मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में ₹30,000
  2. रिपेयर वर्कशॉप (Trinity Auto) पर दायित्व:
    • गैर-जरूरी देरी और मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में ₹50,000
  3. मुकदमा खर्च (Litigation Cost): बीमा कंपनी ₹20,000 का कानूनी खर्च चुकाएगी।
  4. वाहन की सुपुर्दगी: वर्कशॉप को निर्देश दिया गया कि वह शिकायतकर्ता से मात्र ₹9,310 की शेष राशि लेकर मरम्मत की गई कार तुरंत उसे सौंप दे।

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