केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (केरल उच्च न्यायालय) |
| संबंधित कानून | Negotiable Instruments Act, 1881 — Section 138, Section 118 & Section 139 |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. चेक पर हस्ताक्षर और प्रविष्टियों (Details) के लिए अलग-अलग स्याही का प्रयोग चेक को अमान्य या संदिग्ध नहीं बनाता। 2. यदि हस्ताक्षर स्वीकृत हैं, तो धारा 118 व 139 की उपधारणाएं लागू होंगी; कर्ज चुकाने का दावा करने वाले को ठोस सबूत देना होगा। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | बरी का आदेश रद्द; आरोपी धारा 138 के तहत दोषी करार, ₹8.15 लाख का जुर्माना। |
Sign on Cheque by Different Inks: केरल हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए किसी चेक को अमान्य या संदिग्ध नहीं माना जा सकता क्योंकि उस पर किए गए हस्ताक्षर (Signature) और अन्य विवरण (जैसे तारीख या राशि) अलग-अलग स्याही (Different Inks) से लिखे गए हैं।
यह फैसला न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (Justice A. Badharudeen) की एकल पीठ ने आरोपी को बरी किए जाने के निचली अदालत (मजिस्ट्रेट) के फैसले को रद्द करते हुए सुनाया।
हाई कोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- विभिन्न स्याही के प्रयोग पर विधिक स्थिति:“केवल इसलिए कि हस्ताक्षर एक स्याही का उपयोग करके किए गए थे और प्रविष्टियां (Entries) दूसरी स्याही का उपयोग करके की गई थीं, यह स्वतः ही नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट को एक अमान्य दस्तावेज़ नहीं बनाएगा और न ही इसके संभावित निष्पादन (Execution) पर संदेह करने का आधार बनेगा।”
- देनदारी मुक्ति (Discharge of Liability) का बोझ: अदालत ने दोहराया कि जब कोई आरोपी यह दावा करता है कि उसने कर्ज चुका दिया है (Discharge of Liability), तो उसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से इसे साबित करना होता है:“यह अच्छी तरह से स्थापित कानून है कि जब कोई पक्ष देनदारी के निपटान/भुगतान का दावा करता है, तो उसे ठोस और ठोस सबूतों की मदद से इसे साबित करना होगा।”
- घर में नकदी रखना कोई अप्राकृतिक बात नहीं: अदालत ने आरोपी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता द्वारा घर में ₹7 लाख की नकदी रखना अस्वाभाविक है। कोर्ट ने कहा कि जब तक विपरीत साक्ष्य न हों, घर पर नकदी रखना अपने आप में कोई असम्भाव्यता (Improbability) नहीं है।
मामला क्या था? (Case Background)
- मामले की पृष्ठभूमि
- शिकायतकर्ता (डी. चंद्रन) ने एस. अनिलकुमार द्वारा जारी 7 लाख रुपये का चेक बैंक में जमा किया, जो “Payment stopped by drawer” (खाताधारक द्वारा भुगतान रोका गया) के कारण बाउंस हो गया।
- मजिस्ट्रेट अदालत ने आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया कि शिकायतकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि वह एनआई एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत विधिक उपधारणा (Presumptions) पाने का हकदार है।
- आरोपी का बचाव
- आरोपी का तर्क था कि उसने 2011 में केवल ₹2.35 लाख उधार लिए थे और सुरक्षा (Security) के रूप में दो हस्ताक्षर किए हुए खाली चेक (Blank Signed Cheques) दिए थे, तथा उसने पूरा कर्ज चुका दिया था।
- उसने यह भी तर्क दिया कि चेक पर हस्ताक्षर और बाकी विवरण अलग-अलग स्याही से लिखे गए थे, जो चेक के निष्पादन पर संदेह पैदा करता है।
- हाई कोर्ट का विश्लेषण
- हाई कोर्ट ने पाया कि आरोपी ने शिकायतकर्ता से पैसे लेने और चेक पर अपने हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार की थी।
- आरोपी द्वारा ₹2.35 लाख चुकाने का दावा करने के बावजूद, केवल ₹35,000 के भुगतान का रिकॉर्ड मिला, बाकी ₹2 लाख के भुगतान का कोई सबूत नहीं था।
- कोर्ट ने कहा कि हस्ताक्षर स्वीकार होने के बाद धारा 118 और 139 NI Act के तहत कानूनी उपधारणाएं (Statutory Presumptions) शिकायतकर्ता के पक्ष में लागू होती हैं, जिन्हें आरोपी केवल संभावित बचाव उठाकर खंडित नहीं कर सकता।
⚖️ केरल हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
- बरी करने का आदेश निरस्त: हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने के फैसले को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया।
- दोषसिद्धि (Conviction): आरोपी (एस. अनिलकुमार) को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया गया।
- सजा व जुर्माना:
- आरोपी को अदालत की कार्यवाही समाप्त होने तक (Till the rising of the court) 1 दिन की साधारण कैद की सजा सुनाई गई।
- ₹8.15 लाख का जुर्माना भरने का निर्देश दिया गया (जिसमें से राशि शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगी)। जुर्माना न देने पर 6 महीने की अतिरिक्त साधारण कैद का प्रावधान किया गया।

