Saturday, September 26, 2026
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Failure To Affix Hologram: शराब की बोतलों पर होलोग्राम न लगाना आपराधिक अपराध नहीं…आरोपी पर FIR रद्द कर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया

केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (August 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति संदीप शर्मा (हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय)
संबंधित कानूनHimachal Pradesh Excise Act, 2011 (Sections 39(1), 39(2) & 43)
मुख्य कानूनी सिद्धांततकनीकी या प्रशासनिक चूक (जैसे होलोग्राम न होना) आपराधिक अपराध नहीं है; यह केवल वित्तीय दंड योग्य (Compoundable Contravention) है।
अदालत का अंतिम आदेश1. एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही रद्द।
2. याचिकाकर्ता पर धारा 43 के तहत ₹1 लाख का जुर्माना।

Failure To Affix Hologram: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आबकारी कानून से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शराब की बोतलों पर केवल होलोग्राम (Hologram) न लगाना हिमाचल प्रदेश आबकारी अधिनियम, 2011 (Himachal Pradesh Excise Act, 2011) की धारा 39(1) और 39(2) के तहत कोई आपराधिक अपराध (Criminal Offence) नहीं बनाता है।

न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की एकल पीठ ने माना कि ऐसी चूक/भूल अधिनियम की धारा 43 के अंतर्गत आती है, जो मौद्रिक दंड (Monetary Penalty) और शमनीय (Compoundable) कार्यवाही का प्रावधान करती है। इसके आधार पर कोर्ट ने बॉटलिंग यूनिट के प्रोपराइटर के खिलाफ दर्ज एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया तथा उल्लंघन के लिए ₹1 लाख का जुर्माना लगाया।

न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने आदेश में टिप्पणी की: जैसा कि ऊपर देखा गया है, लाइसेंसधारी द्वारा होलोग्राम न लगाने की चूक (Omission) अधिनियम की धारा 39(1) और 39(2) के तहत कोई अपराध नहीं बनाती है। इसके बजाय, उक्त चूक के लिए अधिनियम की धारा 43 के प्रावधानों के तहत लाइसेंसधारी पर केवल जुर्माना लगाया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  1. मामला और एफआईआर
    • ‘मेसर्स मार्स बॉटलर्स’ (M/s Mars Bottlers) के प्रोपराइटर ने CrPC की धारा 482 (अब BNSS की धारा 528) के तहत हाई कोर्ट में याचिका दायर कर आबकारी अधिनियम की धारा 39(1) और 39(2) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।
    • एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि शराब की बोतलें बिना वैध लाइसेंस और बिना होलोग्राम के ले जाई जा रही थीं। हालांकि, जांच के दौरान बिना लाइसेंस के अवैध परिवहन का कोई सबूत नहीं मिला।
  2. आबकारी विभाग की राय और पुलिस का रवैया
    • आबकारी एवं कराधान विभाग (Excise Department) ने खुद पुलिस को सूचित किया था कि मानवीय भूल के कारण होलोग्राम न लग पाना धारा 43 के तहत एक ‘कम्पाउंडेबल’ (समझौता योग्य) उल्लंघन है और मामला आबकारी अधिकारियों को स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
    • इसके बावजूद, पुलिस जांच एजेंसी ने इस राय को नजरअंदाज करते हुए कोर्ट में धारा 39(1) और 39(2) के तहत चार्जशीट दाखिल कर दी।

🏛️ हाई कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां

  1. धारा 39 बनाम धारा 43 का अंतर
    • धारा 39 (Section 39): गैर-कानूनी उत्पादन, परिवहन या शराब की बिक्री जैसे गंभीर आपराधिक कृत्यों के लिए लागू होती है।
    • धारा 43 (Section 43): नियमों व शर्तों का पालन न करने (जैसे होलोग्राम न लगाना) से संबंधित है, जिसमें केवल जुर्माना लगाकर मामले का निपटारा किया जा सकता है।
  2. अधिकारियों की दोहरी जिम्मेदारी
    • कोर्ट ने नोट किया कि फैक्टरी में होलोग्राम लगाने की प्रक्रिया की निगरानी की जिम्मेदारी केवल लाइसेंसधारी (प्रोप्लाइटर) की नहीं, बल्कि वहां तैनात आबकारी एवं कराधान अधिकारी (Excise Officer) की भी होती है। इसी घटना में शामिल आबकारी अधिकारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को हाई कोर्ट की एक समन्वित पीठ (Coordinate Bench) पहले ही रद्द कर चुकी थी।
  3. न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Law)
    • कोर्ट ने माना कि आपराधिक मुकदमा जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही, धारा 43 के तहत स्वीकार किए गए उल्लंघन को देखते हुए कोर्ट ने खुद ₹1,00,000 का जुर्माना लगाया और आदेश दिया कि यह राशि 4 सप्ताह के भीतर आबकारी विभाग में जमा कराई जाए, जिसके बाद धारा 43 के तहत लंबित कार्यवाही भी समाप्त मानी जाएगी।

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