केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला (इलाहाबाद हाई कोर्ट) |
| मामले की प्रकृति | प्रथम अपील (First Appeal) में वकीलों/पक्षकार की गैर-मौजूदगी और स्थगन की प्रवृत्ति |
| मुख्य मुद्दा | पक्षकारों द्वारा बार-बार एडजर्नमेंट (Adjournment) मांगना और फिर सोशल मीडिया पर अदालती विलंब पर सवाल उठाना |
| कोर्ट का सख्त निर्देश | 1. उपस्थित न होने वाले वकीलों से लिखित जवाब तलब। 2. प्रतिवादी को 14 अगस्त 2026 को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश। |
| कानूनी चेतावनी | अनुचित देरी की कुप्रथा के बाद अदालतों को दोष देना Contempt Jurisdiction को आकर्षित कर सकता है। |
Adjournment Appeal: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालती कार्यवाही के दौरान पक्षकारों (Litigants) द्वारा बार-बार सुनवाई स्थगित कराने (Adjournment) की प्रवृत्ति और उसके बाद सोशल मीडिया पर अदालतों में देरी को लेकर आलोचना करने के दोहरे रवैये पर कड़ा प्रहार किया है।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने एक प्रथम अपील (First Appeal) की सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने पक्षकारों के इस रवैये को आड़े हाथों लेते हुए आदेश में दर्ज किया। कहा, कम से कम इस राज्य की अदालतों में हर दूसरे मामले की यही कहानी है, जहाँ पक्षकार बिना किसी झिझक के अनुचित तरीके से सुनवाई टालने पर जोर देते हैं और फिर अगली ही सांस में सोशल मीडिया साइटों पर बैठकर अदालती देरी की आलोचना करते हैं। न्यायिक प्रक्रिया में अधिकांश देरी उन पक्षकारों के कारण होती है जो इसका फायदा उठाते हैं।
🏛️ हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व प्रशासनिक टिप्पणियां
- अवमानना (Contempt Jurisdiction) की चेतावनी
- पीठ ने इस रवैये को एक पुरानी “कुप्रथा” (Malpractice) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की हरकतों में शामिल होने के बाद अदालतों में देरी का रोना रोना एक ऐसा आचरण है जो अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की सीमा में आता है और इसके लिए अवमानना क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जा सकता है।
- अदालत को गुमराह करने का प्रयास
- यह टिप्पणी उस मामले में आई जहाँ व्यक्तिगत नोटिस तामील होने और दो वकीलों द्वारा वकालतनामा दाखिल करने के बावजूद प्रतिवादी (Respondent) की ओर से कोई पेश नहीं हुआ। पीठ ने माना कि पेशी का दिखावा केवल अदालती कार्यवाही से बचने और समय खींचने की एक चाल (Ploy) थी।
- वकीलों से स्पष्टीकरण और पेशी का आदेश
- कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि 24 जुलाई 2026 को वकालतनामा दाखिल करने वाले दोनों वकीलों को लिखित सूचना भेजकर उनसे स्पष्टीकरण मांगा जाए कि उनमें से कोई भी कोर्ट में उपस्थित क्यों नहीं हुआ।
- इसके साथ ही, प्रतिवादी को 14 अगस्त 2026 को दोपहर 2 बजे व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दिया गया है।
पूर्व में भी दी जा चुकी है ऐसी चेतावनी
पिछले वर्ष भी इलाहाबाद हाई कोर्ट (न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर की एकल पीठ) ने न्यायिक देरी में पक्षकारों के योगदान पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने इसे एक ऐसा “खतरा” (Menace) बताया था जिसके बारे में न तो बात की जाती है और न ही इसकी निंदा की जाती है।
अदालत ने कहा था कि यह आश्चर्यजनक है कि अदालती देरी के खिलाफ व्यापक विरोध के बावजूद, जब देश के नागरिक खुद मुकदमेबाज के रूप में अदालत में आते हैं, तो वे अपने फायदे के हिसाब से सुनवाई टालना और तारीखें लेना पसंद करते हैं। इस प्रवृत्ति को सख्ती से हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

