केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति अचल सचदेव (इलाहाबाद उच्च न्यायालय) |
| संबंधित कानून | CrPC Section 125 / BNSS Section 144, Article 21, Article 39 |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. Maintenance दान नहीं, वैधानिक और मौलिक अधिकार है। 2. भरण-पोषण न देकर पत्नी को बेसहारा छोड़ना Article 21 (Right to Live with Dignity) का उल्लंघन है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज; ₹20,000 प्रति माह भरण-पोषण का आदेश बरकरार। |
Maintenance To Wife: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक एवं संवैधानिक व्यवस्था देते हुए कहा है कि पत्नी को भरण-पोषण से वंचित करना और उसे बेसहारा जीवन (Destitution) जीने के लिए मजबूर करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत गारंटीकृत ‘गरिमापूर्ण जीवन जीने के मौलिक अधिकार’ का सीधा उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति अचल सचदेव की एकल पीठ ने पति द्वारा दायर उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को खारिज करते हुए यह टिप्पणियां कीं, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट (गौतम बुद्ध नगर) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपनी पत्नी को ₹20,000 प्रति माह भरण-पोषण भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।
न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने फैसले में टिप्पणी की: पत्नी को भरण-पोषण देना कोई दान या दया (Charity/Bounty) नहीं है, बल्कि वैवाहिक संबंधों और कानूनी दायित्वों से उत्पन्न होने वाला एक वैधानिक अधिकार है… भरण-पोषण से इनकार करने से पत्नी बेसहारा जीवन जीने के लिए मजबूर होगी, जिसकी इजाजत कानून नहीं दे सकता। ऐसा अभाव संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत मानवीय गरिमा को आहत करता है।
🏛️ हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व संवैधानिक टिप्पणियां
- संवैधानिक आधार (Articles 15(3), 21, 39 & 41)
- अदालत ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 125 (अब BNSS की धारा 144) केवल एक वैधानिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय (Social Justice) का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 39(a) और 39(f) (जीविका के पर्याप्त साधन और बच्चों का स्वस्थ विकास) तथा अनुच्छेद 15(3) का हवाला देते हुए कहा कि भरण-पोषण के प्रावधान देश की “संवैधानिक चेतना” (Constitutional Conscience) को दर्शाते हैं।
- पति की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी
- हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण करना पति का न केवल कानूनी दायित्व है, बल्कि यह उसका नैतिक कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व भी है—विशेषकर तब जब पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन न हो।
- सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों—भुवन मोहन सिंह बनाम मीना (2014) और चतुर्भुज बनाम सीताबाई (2007)—का हवाला दिया। शीर्ष अदालत ने इन मामलों में तय किया था कि भरण-पोषण का मुख्य उद्देश्य आवारागर्दी, गरीबी और बेसहारापन को रोकना है ताकि पत्नी को घोर दरिद्रता में न जीना पड़े।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- दहेज प्रताड़ना और अलगाव
- पक्षकारों का विवाह जुलाई 2017 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे अतिरिक्त दहेज (स्वीफ्ट कार और 100 वर्ग गज के प्लॉट) की मांग को लेकर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
- मार्च 2018 में मारपीट के बाद से वह अपने बुजुर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर पिता के घर रह रही थी।
- आर्थिक स्थिति और फैमिली कोर्ट का आदेश
- पत्नी का दावा था कि उसका पति एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है जो लगभग ₹70,000 प्रति माह कमाता है और उसके परिवार का व्यवसाय/संपत्तियां हैं, जिससे वे प्रति माह लगभग ₹2,00,000 अर्जित करते हैं।
- फैमिली कोर्ट ने पाया कि पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं है और उसके पास अलग रहने का पर्याप्त कारण है। कोर्ट ने पति को ₹20,000 प्रति माह देने का आदेश दिया, जिसे पति ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
- हाई कोर्ट का निर्णय
- हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को पूरी तरह तर्कसंगत और वैध ठहराते हुए पति की याचिका खारिज कर दी और भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा।

