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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी व्याख्या
- मामले का घटनाक्रम:याचिकाकर्ता ने ₹2.5 करोड़ की वसूली के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था, लेकिन कोर्ट फीस के नाम पर केवल ₹10 चुकाए। हाईकोर्ट रजिस्ट्री ने तुरंत आपत्ति जताते हुए प्लेन्ट लौटा दी और पूर्ण कोर्ट फीस जमा करने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 3 साल बाद (2 अगस्त 2022) बिना फीस के दोबारा प्लेन्ट दाखिल की, और अंततः 15 अक्टूबर 2022 को जाकर फीस जमा की।
- कोविड-19 बहाने को खारिज करना (Condonation of Delay):याचिकाकर्ता ने 3 साल (1,181 दिन) की विशाल देरी को माफ कराने के लिए कोविड-19 महामारी और धन जुटाने की समस्या का हवाला दिया। पीठ ने इसे पूरी तरह अस्पष्ट (Vague) मानते हुए कहा कि यद्यपि कोविड महामारी एक वैध कारण हो सकती है, फिर भी वादी को इतने लंबे समय की देरी का एक-एक दिन का संतोषजनक स्पष्टीकरण देना अनिवार्य है, जो इस मामले में गायब था।
- प्रतिवादियों का उत्पीड़न और न्यायिक दुरुपयोग:अदालत ने कहा कि इस तरह जानबूझकर मामले को लटकाए रखना प्रतिवादियों पर कानूनी कार्यवाही की तलवार लटकाकर उन्हें प्रताड़ित करने जैसा है। याचिकाकर्ता के इस ढुलमुल रवैये के कारण प्रतिवादियों को 7 साल तक मुकदमेबाजी का मानसिक संताप और वित्तीय नुकसान झेलना पड़ा।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष
1. कोर्ट फीस अधिनियम और प्रक्रियात्मक ईमानदारी:
यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि वादी मुकदमों की नंबरिंग या सीमा अवधि (Limitation) का अनुचित लाभ उठाने के लिए नामात्र कोर्ट फीस देकर बाद में सालों तक भुगतान टालने की चालाकी नहीं कर सकते।
2. देरी की माफी (Condonation of Delay) का कठोर दायरा:
अदालत ने पुनः स्थापित किया कि कोविड-19 जैसी वैश्विक आपदाओं का भी बेजा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता; यदि देरी अत्यधिक लंबी है, तो वादी को अदालत के समक्ष ठोस और निर्विवाद साक्ष्य पेश करने होंगे।
चेन्नई: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 148 व 149 (न्यायालय द्वारा कमी वाली कोर्ट फीस के भुगतान हेतु समय विस्तार का विवेकाधिकार और उसकी सीमाएं), आदेश 7 नियम 11(c) (कमी वाली कोर्ट फीस न चुकाने पर वादपत्र की अनिवार्य नामंजूरी / Rejection of Plaint), तमिलनाडु कोर्ट फीस एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1955 (Tamil Nadu Court Fees and Suits Valuation Act, 1955), परिसीमन अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 5 (पर्याप्त कारण / Sufficient Cause के बिना अत्यधिक विलंब माफी पर रोक), तथा कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) पर स्थापित विधिक न्यायशास्त्र के तहत मद्रास उच्च न्यायालय ने एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार (Justice N. Sathish Kumar) और न्यायमूर्ति जी.के. मुथुकुमार (Justice GK Muthukumaar) की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसने वादपत्र को दोबारा प्रस्तुत करने (Representation of Plaint) में हुए 1,161 दिनों के विलंब और कमी वाली कोर्ट फीस (Deficit Court Fee) भरने में हुए 1,181 दिनों के विलंब को माफ करने से साफ इनकार कर दिया था।
खंडपीठ ने वादी के आचरण पर तीव्र क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि लगभग ₹2.5 करोड़ के भारी-भरकम पैसे की वसूली के मुकदमे में मात्र ₹10 की सांकेतिक कोर्ट फीस चुकाकर मुकदमा दाखिल करना और फिर बकाया अदालती शुल्क अदा करने में तीन लंबे वर्षों का समय लेना “पूरी न्यायिक प्रणाली का खुला उपहास (Mockery of the entire judicial system) और कानूनी व्यवस्था के प्रति घोर अनादर” है। अदालत ने इसे प्रतिवादियों को मुकदमे की आड़ में लंबे समय तक प्रताड़ित करने की सोची-समझी रणनीति मानते हुए दोनों अपीलों को खारिज कर दिया और अपीलार्थी पर कुल ₹50,000 (प्रत्येक अपील में ₹25,000) का भारी जुर्माना/हर्जाना (Costs) ठोक दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘₹2.5 करोड़ के दावे पर ₹10 कोर्ट फीस और 3 साल की देरी न्यायिक प्रणाली का उपहास’:
न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति जी.के. मुथुकुमार की खंडपीठ ने अपीलार्थी की दुर्भावनापूर्ण कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लेते हुए अपने आदेश में स्पष्ट दर्ज किया: “हम पाते हैं कि लगभग ₹2.5 करोड़ के मौद्रिक दावे (Money Claim) के लिए मात्र ₹10/- की अदालती फीस चुकाना और उसके बाद वादपत्र को पुनः प्रस्तुत करने तथा कमी वाली कोर्ट फीस का भुगतान करने में तीन लंबे वर्ष लगाना, अपीलार्थी द्वारा पूरी न्यायिक प्रणाली का मखौल उड़ाने (Made a mockery of the entire judicial system) और कानूनी प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग करने के समान है, जिसके लिए भारी हर्जाना अधिरोपित किया जाना सर्वथा उचित है। अपीलार्थी का यह आचरण विधिक प्रणाली के प्रति उसके पूर्ण तिरस्कार और अनादर (Total disregard and disrespect for the legal system) को दर्शाता है।”
2. ‘वादपत्र की री-प्रेजेंटेशन और फीस भुगतान में घोर लापरवाही, मुकदमे की नीयत पर संदेह’:
- अदालत ने वादपत्र के दाखिल होने और रजिस्ट्री द्वारा लौटाए जाने के कालक्रम का विश्लेषण करते हुए कहा:“रजिस्ट्री ने वादपत्र को बिल्कुल सही तरीके से लौटाया था और कमी वाली कोर्ट फीस जमा करने का निर्देश दिया था। इसके बाद अपीलार्थी को 2 अगस्त 2022 को पहली बार वादपत्र दोबारा पेश करने में तीन लंबे वर्ष लग गए। आश्चर्यजनक रूप से, तब भी उसने बकाया कोर्ट फीस नहीं भरी। अंततः कोर्ट फीस का भुगतान 15 अक्टूबर 2022 को जाकर किया गया।वादपत्र को दोबारा पेश करने और कोर्ट फीस भरने में अपीलार्थी का यह संवेदनहीन रवैया स्तब्ध करने वाला है। यह इस मुकदमे को आगे बढ़ाने की अपीलार्थी की वास्तविक मंशा पर गंभीर संदेह पैदा करता है। अपीलार्थी का यह सुस्त और लापरवाह रवैया घोर निंदनीय है। यह कानूनी कार्यवाही की अनिश्चित तलवार लटकाकर प्रतिवादियों को प्रताड़ित करने का कृत्य है, जिसे अदालतें कभी बढ़ावा नहीं दे सकतीं।”
3. ‘कोविड-19 और पैसे का अभाव कोई जादुई बहाना नहीं; अस्पष्ट दलीलों से 1,181 दिन माफ नहीं होंगे’:
- अपीलार्थी ने तर्क दिया था कि कोविड-19 महामारी के कारण और कोर्ट फीस के लिए पैसे जुटाने में समय लगने के कारण यह देरी हुई। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा:“कोविड-19 महामारी का प्रकोप एक ‘पर्याप्त कारण’ (Sufficient Cause) बन सकता था, किंतु फिर भी, अत्यधिक देरी को माफ कराने के लिए अपीलार्थी को इसका संतोषजनक स्पष्टीकरण देना अनिवार्य होता है। इस मामले में विलंब बहुत विशाल (Huge Delay) है।यह कहना कि ‘कोविड था और पैसे जुटाने में समय लगा’, अत्यंत अस्पष्ट और सतही दावा (Very vague averment) है और यह अपने आप में कोई वैध पर्याप्त कारण नहीं बनता। इतने लंबे विलंब का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर नहीं दिया गया है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2019–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | मद्रास उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ चेन्नई (मूल पक्ष अपीलीय क्षेत्राधिकार — Original Side Appeals) |
| पीठ | न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार (Justice N. Sathish Kumar) एवं न्यायमूर्ति जी.के. मुथुकुमार (Justice GK Muthukumaar) |
| निर्णय की तिथि / विधिक संदर्भ | नवंबर 2026 /K.C.Selvam vs. Chairman, Mr.V.S.Venkatraman & others |
| केस संदर्भ | ओरिजिनल साइड अपील्स (OSA Nos. … / 2026) — विलंब माफी याचिकाएं खारिज करने के विरुद्ध अपील |
| अपीलार्थी (वादी) | एक निजी वादी/ऋणदाता जिसने ₹2.5 करोड़ की धन वसूली (Money Suit) का वाद दायर किया था। |
| प्रतिवादी पक्ष | प्रतिवादीगण (देनदार), जिन्हें 7 वर्षों तक मुकदमे के अनिश्चित खतरे में रखा गया। |
| मूल मुकदमे का स्वरूप | लगभग ₹2,50,00,000/- (दो करोड़ पचास लाख रुपये) की बकाया राशि की वसूली हेतु दीवानी वाद। |
| प्रारंभ में चुकाई गई कोर्ट फीस | मात्र ₹10/- (दस रुपये) (जबकि तमिलनाडु कोर्ट फीस एक्ट के अनुसार देय फीस लाखों रुपये में बनती थी)। |
| विलंब की अवधि (Quantum of Delay) | 1. वादपत्र दोबारा प्रस्तुत करने में विलंब: 1,161 दिन (1,161 Days) 2. कमी वाली कोर्ट फीस चुकाने में विलंब: 1,181 दिन (1,181 Days) (तीन वर्ष से अधिक का समय)। |
| एकल पीठ (Single Judge) का आदेश | एकल न्यायाधीश ने पाया कि वादी के पास 3 साल से अधिक समय तक कोर्ट फीस न चुकाने का कोई वैध व संतोषजनक कारण नहीं है; अतः सीपीसी धारा 149 व लिमिटेशन एक्ट धारा 5 के तहत विलंब माफी आवेदन खारिज कर दिए गए। |
| डिवीजन बेंच का अंतिम आदेश | एकल पीठ का निर्णय पूर्णतः संपुष्ट; दोनों अपीलें खारिज; वादी पर ₹50,000 (₹25,000 प्रति अपील) का हर्जाना अधिरोपित। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘सीपीसी की धारा 149, आदेश 7 नियम 11 और सीमा अधिनियम की धारा 5’
- सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 149 का विधिक दायरा:
- सीपीसी की धारा 149 अदालत को यह विवेकाधिकार देती है कि यदि किसी दस्तावेज या वादपत्र पर पूरी कोर्ट फीस नहीं चुकाई गई है, तो अदालत अपने विवेक से वादी को कमी वाली फीस भरने का अतिरिक्त समय दे सकती है। एक बार फीस भर दिए जाने पर वादपत्र उसी दिन से वैध माना जाता है जिस दिन वह पहली बार पेश किया गया था (Relation Back Doctrine)।
- किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने ए. नवाब जॉन बनाम वी.एन. सुब्रमण्यम [(2012) 7 SCC 738] में स्पष्ट किया है कि धारा 149 के तहत विवेकाधिकार केवल सद्भावी (Bona fide) वादियों के लिए है, उन चालाक वादियों के लिए नहीं जो केवल परिसीमन (Limitation) बचाने के लिए बिना कोर्ट फीस के खाली या ₹10 का वादपत्र दाखिल कर देते हैं और फिर प्रतिवादी को परेशान करने के लिए वर्षों तक फीस नहीं भरते।
- मद्रास हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का स्थापित सिद्धांत (K. Natarajan Case):
- मद्रास उच्च न्यायालय की फुल बेंच ने के. नटराजन बनाम पी.के. राजशेखरन [AIR 2004 Mad 380] में यह कड़े दिशा-निर्देश दिए थे कि जब भी कोई वादपत्र भारी कमी वाली कोर्ट फीस के साथ पेश किया जाए, तो अदालत को बिना सोचे-समझे धारा 149 के तहत समय नहीं बढ़ाना चाहिए।
- वादी को यह साबित करना होगा कि वह गंभीर आर्थिक तंगी या अपरिहार्य कारणों से फीस नहीं भर सका। प्रस्तुत मामले में ₹2.5 करोड़ का दावा करने वाला व्यक्ति 3 साल तक यह बहाना बनाता रहा कि वह कोर्ट फीस की व्यवस्था नहीं कर पाया, जिसे अदालत ने साफ तौर पर झूठा और कपटपूर्ण माना।
- प्रतिवादी का उत्पीड़न और विधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग:
- जब कोई वादी किसी व्यक्ति के खिलाफ करोड़ों की वसूली का मुकदमा दाखिल करके उसे अधर में लटकाए रखता है, तो प्रतिवादी की संपत्ति, साख और मानसिक शांति पर 7 वर्षों तक अनिश्चितता का साया बना रहता है।
- कोर्ट ने रेखांकित किया कि ऐसी सुस्त और दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी न्याय व्यवस्था पर बोझ है और इसे भारी हर्जाना लगाकर ही रोका जा सकता है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: मद्रास उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ चेन्नई (मूल पक्ष अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: ओरिजिनल साइड अपील्स [OSA Nos. … / 2026]
- विधिक रिपोर्टिंग साइटेशन: 2026 LiveLaw (Mad) 525
- पीठ: न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार (Justice N. Sathish Kumar) एवं न्यायमूर्ति जी.के. मुथुकुमार (Justice GK Muthukumaar)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: अपीलें पूर्णतः खारिज; एकल न्यायाधीश का विलंब माफी से इनकार करने का आदेश संपुष्ट; अपीलार्थी पर ₹50,000 का हर्जाना अधिरोपित।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलार्थी (वादी) की ओर से: अपीलार्थी के अधिवक्तागण।
- प्रतिवादीगण (देनदार) की ओर से: प्रतिवादी के अधिवक्तागण।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- धारा 149 — कमी वाली कोर्ट फीस को स्वीकार करने की न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति
- धारा 148 — प्रक्रियात्मक समय विस्तार की सीमा
- धारा 35 व 35A — अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग पर हर्जाना अधिरोपित करने की शक्ति
- आदेश 7 नियम 11(c) — कोर्ट फीस न भरने पर वादपत्र की नामंजूरी
- तमिलनाडु कोर्ट फीस एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1955 — मौद्रिक दावों पर मूल्यांकन व देय स्टाम्प शुल्क
- परिसीमन अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) — धारा 5 (विलंब माफी हेतु ‘पर्याप्त कारण’ की अनिवार्यता)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- कमी वाली कोर्ट फीस, अत्यधिक विलंब और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग का विधिक मानक: ‘करोड़ों रुपये के मौद्रिक वसूली वाद में मात्र ₹10 जैसी हास्यास्पद कोर्ट फीस चुकाना और उसके बाद बकाया अदालती शुल्क अदा करने में तीन वर्ष से अधिक (1,181 दिन) का अकारण विलंब करना न्याय प्रशासन का खुला उपहास और कानूनी प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) है; सीपीसी की धारा 149 के तहत रियायत केवल वास्तविक और सद्भावी वादियों को दी जा सकती है, उन मुकदमों में नहीं जहाँ वादी परिसीमन की अवधि को छलने के उद्देश्य से अपूर्ण वादपत्र दाखिल कर प्रतिवादी को वर्षों तक अनिश्चित कानूनी भय में रखता है; महामारी (Covid-19) या धन जुटाने की अस्पष्ट दलीलें इतने विशाल विलंब को माफ करने हेतु ‘पर्याप्त कारण’ (Sufficient Cause) का गठन नहीं करतीं; तथा अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसी लापरवाह और दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी को हतोत्साहित करने हेतु अनुकरणीय हर्जाना (Heavy Costs) अधिरोपित करें।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: मद्रास उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद ₹2.5 करोड़ की वसूली का मूल वाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया है क्योंकि विलंब माफी खारिज होने के फलस्वरूप वादपत्र विधिक रूप से खारिज माना जाएगा; इसके अतिरिक्त अपीलार्थी को प्रतिवादियों को मानसिक संताप और 7 वर्षों के कानूनी खर्च की क्षतिपूर्ति के रूप में ₹50,000 की हर्जाना राशि का भुगतान करना होगा।
Abuse Of Law: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार एवं न्यायमूर्ति जी. के. मुथुकुमार |
| साइटेशन | K.C.Selvam vs. Chairman, Mr.V.S.Venkatraman & others/OSA Nos.82 & 83 of 2025 |
| दावे की राशि बनाम दी गई कोर्ट फीस | दावा: ₹2.5 करोड़ (वसूली का मुकदमा) प्रारंभिक कोर्ट फीस: केवल ₹10 |
| देरी की अवधि | 1,161 दिन (प्लेन्ट दोबारा प्रस्तुत करने में) एवं 1,181 दिन (घाटा कोर्ट फीस भरने में) |
| याचिकाकर्ता का बहाना | कोविड-19 महामारी (COVID-19 Pandemic) और फंड जुटाने में लगा समय। |
| अदालत का अंतिम आदेश | अपील खारिज व जुर्माना: एकल पीठ का फैसला बरकरार; दोनों अपीलों में ₹25,000-₹25,000 (कुल ₹50,000) का हर्जाना रोपित। |

