कानूनी जटिलता और हाईकोर्ट का रुख
- मिसाल का अभाव: भारतीय दत्तक कानूनों (हिदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 और किशोर न्याय अधिनियम, 2015) के तहत एक बार गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद दत्तक बच्चे को जैविक/प्राकृतिक संतान का दर्जा मिल जाता है। ऐसे में कानूनी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद कस्टडी वापस सरकार को सौंपने का कोई स्पष्ट प्रावधान या न्यायिक मिसाल (Precedent) मौजूद नहीं है।
- अदालत का कदम: कोर्ट ने माना कि यह मामला दत्तक माता-पिता के अधिकारों, बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of Child) और विशेष जरूरतों वाले बच्चों की सुरक्षा का एक जटिल और दुर्लभ मामला है। कोर्ट ने CARA और बाल कल्याण समिति को निर्देश दिया है कि वे 30 सितंबर तक बच्चे के आवास, विशेष देखभाल और कस्टडी स्थानांतरण पर अपना स्पष्ट रुख रखें।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने देश के दत्तक ग्रहण कानून (Adoption Law), बाल कल्याण और गोद लेने के बाद पैदा होने वाली व्यावहारिक व सुरक्षात्मक चुनौतियों से जुड़े एक अत्यंत संवेदनशील और अभूतपूर्व कानूनी प्रश्न पर विस्तृत विधिक परीक्षण शुरू किया है।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने 56 वर्षीय विधवा दत्तक मां (सूफिया नदीम चिश्ती) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह संज्ञान लिया। अदालत ने कहा कि दत्तक ग्रहण के अंतिम रूप से निष्पादित हो जाने के कई वर्षों बाद किसी नाबालिग को वापस लौटाने (Relinquishment/Return of Adopted Minor) से संबंधित कानून पर बहुत कम या न के बराबर न्यायिक नजीरें (Scarcity of Legal Precedents) मौजूद हैं। अदालत इस बात की पड़ताल कर रही है कि क्या केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के माध्यम से कानूनी रूप से गोद लिए गए किसी बच्चे को वर्षों बाद, उसके हिंसक व्यवहार, बौद्धिक अक्षमता और परिवार की सुरक्षा को खतरे के आधार पर वापस सरकारी देखरेख (State Care) या किसी संस्था को सौंपा जा सकता है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) और लाजपत नगर स्थित कस्तूरबा निकेतन कॉम्प्लेक्स की बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee – CWC) को नोटिस जारी कर 30 सितंबर 2026 तक विस्तृत स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं पारिवारिक संकट
- 2018 में CARA के जरिए गोद लेना: याचिकाकर्ता महिला और उनके पति ने वर्ष 2018 में असम के एक अनाथालय से छह वर्षीय बच्चे को CARA की औपचारिक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए विधिवत गोद लिया था।
- दत्तक ग्रहण के बाद सामने आई अक्षमता: याचिका में आरोप लगाया गया है कि गोद लेने के समय बच्चे की मेडिकल जांच में या तो कोई चूक हुई या डॉक्टर उसकी बीमारी को पकड़ नहीं पाए। बाद में पता चला कि बच्चा बौद्धिक अक्षमता (Intellectual Disability) से ग्रसित है और उसमें अत्यधिक आक्रामक व हाइपरसेक्सुअल व्यवहार के लक्षण विकसित हो रहे हैं।
- परिवार की सुरक्षा और पति का निधन:
- वर्ष 2021 में याचिकाकर्ता के पति का देहांत हो गया। इसके बाद महिला ग्रेटर नोएडा में अपनी बुजुर्ग मां और अविवाहित बहन के साथ रहने लगी।
- घर में केवल तीन महिलाएं हैं और कोई वयस्क पुरुष सदस्य नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील अली बिन सैफ ने पीठ को बताया कि 14 वर्षीय किशोर के हिंसक व्यवहार, पैसे न मिलने पर मारपीट करने, घर से गहने-पैसे चुराने और महिलाओं के साथ अनुचित आचरण के चलते तीनों महिलाएं निरंतर भय के साये में जी रही हैं।
- स्कूलों से निष्कासन: छात्र के आक्रामक और आपत्तिजनक व्यवहार के कारण उसे कई शैक्षणिक संस्थानों से निष्कासित (Expelled) किया जा चुका है।
याचिकाकर्ता की मांग और हाईकोर्ट की कार्रवाई
- कस्टडी वापस लेने का अनुरोध: बेसहारा मां ने अदालत से गुहार लगाई है कि वह अब बच्चे की देखरेख करने में शारीरिक, मानसिक और चिकित्सीय रूप से असमर्थ है। अतः बच्चे की कस्टडी CARA, बाल कल्याण समिति या किसी अन्य सक्षम सरकारी/निजी विशेष गृह को सौंपी जाए।
- चिकित्सीय खर्च उठाने की पेशकश: मां ने अदालत में अंडरटेकिंग दी है कि बच्चे के उचित इलाज, विशेष देखरेख और मेडिकल उपचार में जो भी खर्च आएगा, वह अपनी वित्तीय क्षमता के अनुसार उसे वहन करने के लिए तैयार है।
- लाजपत नगर CWC को नोटिस: न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कस्तूरबा निकेतन कॉम्प्लेक्स (लाजपत नगर) स्थित बाल कल्याण समिति से यह भी बताने को कहा है कि क्या उनके बाल गृह में इस नाबालिग को रखने और उसकी विशिष्ट जरूरतों की देखभाल करने की उपयुक्त व्यवस्था उपलब्ध है।
विधिक पेचीदगियां एवं कानूनी ढांचा
- दत्तक ग्रहण की विधिक अपरिवर्तनीयता (Irrevocability):
- भारतीय कानून में हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) की धारा 15 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि एक बार वैध रूप से किया गया दत्तक ग्रहण न तो दत्तक माता-पिता द्वारा रद्द किया जा सकता है और न ही बच्चा अपनी दत्तक स्थिति को त्यागकर प्राकृतिक परिवार में वापस जा सकता है।
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) और एडॉप्शन रेगुलेशंस, 2022 के तहत दत्तक माता-पिता कानूनी अभिभावक होते हैं और जैविक माता-पिता के समान ही उनके सभी वैधानिक अधिकार और कर्तव्य होते हैं।
- दत्तक ग्रहण में विफलता (Adoption Disruption / Dissolution):
- दत्तक नियमों के तहत शुरुआती निगरानी अवधि (Post-adoption follow-up) के दौरान तो ‘डिसरप्शन’ (व्यवधान) की व्यवस्था है, परंतु अंतिम एडॉप्शन ऑर्डर पारित होने और वर्षों बीत जाने के बाद बच्चे को ‘सरेंडर’ करने का कोई सुगम वैधानिक रास्ता उपलब्ध नहीं है।
- ऐसी स्थिति में बच्चे को किशोर न्याय अधिनियम की धारा 2(14) के तहत “देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक” (Child in Need of Care and Protection – CNCP) के रूप में वर्गीकृत करने और बाल कल्याण समिति (CWC) के माध्यम से संस्थागत देखरेख (Institutional Care) या फॉस्टर केयर में भेजने की कानूनी संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सूफिया नदीम चिश्ती बनाम भारत संघ, CARA, बाल कल्याण समिति (CWC) व अन्य [W.P.(C) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (दत्तक मां) की ओर से: अधिवक्ता अली बिन सैफ
- केंद्र सरकार / CARA की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी वकील
- प्रासंगिक कानून एवं विनियम:
- किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act, 2015) की धारा 2(14), 27, 31, 37 एवं धारा 56 से 73 (दत्तक ग्रहण अध्याय)
- एडॉप्शन रेगुलेशंस, 2022 (CARA विनियम)
- हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) की धारा 15 (दत्तक ग्रहण को रद्द न किए जाने का सिद्धांत)
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) — बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित बच्चों की राज्य द्वारा देखरेख
- पीठ: न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- आगामी सुनवाई तिथि: 30 सितंबर 2026 (केंद्र सरकार, CARA और CWC को अपना औपचारिक जवाब/हलफनामा दाखिल करने का निर्देश)।
Adoption Disruption: मामले का विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति स्वरणा कांता शर्मा (Justice Swarana Kanta Sharma) |
| याचिकाकर्ता | गोद लेने वाली विधवा मां (सूफिया नदीम चिश्ती) |
| गोद लेने का वर्ष | 2018 (असम के अनाथालय से CARA के जरिए, तब बच्चे की उम्र 6 वर्ष थी) |
| मुख्य समस्या | बच्चे की बौद्धिक विकलांगता (Intellectual Disability), अत्यधिक आक्रामक व चोरी का व्यवहार |
| मांग | बच्चे की कस्टडी CARA या किसी उपयुक्त संस्था को सौंपी जाए और उसके इलाज की व्यवस्था हो |

