Saturday, November 7, 2026
HomeDelhi High CourtIT Rules: लिंक्डइन कोई लोक कर्तव्य या सार्वजनिक कार्य नहीं करता; अकाउंट...

IT Rules: लिंक्डइन कोई लोक कर्तव्य या सार्वजनिक कार्य नहीं करता; अकाउंट ब्लॉक करने के खिलाफ रिट याचिका पोषणीय नहीं, सिविल सूट ही उचित उपचार

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी बिंदु

  1. अकाउंट ब्लॉकिंग और याचिकाकर्ता का तर्क:याचिकाकर्ता मयंक जैन ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि लिंक्डइन ने बिना किसी पूर्व चेतावनी या यूजर एग्रीमेंट (User Agreement) व कम्युनिटी गाइडलाइंस के विशिष्ट उल्लंघन का ब्योरा दिए बिना उनके अकाउंट को मनमाने ढंग से ब्लॉक कर दिया।
  2. मध्यस्थ नियम (IT Rules, 2021) और अपीलीय समिति (GAC):अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता पहले ही सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत गठित शिकायत अपीलीय समिति (Grievance Appellate Committee – GAC) के समक्ष संपर्क कर चुके हैं।
  3. निजी बनाम सरकारी कार्य का परीक्षण (Test of Public Function):हाईकोर्ट ने दोहराया कि किसी निजी संस्था के खिलाफ रिट याचिका केवल तभी पोषणीय होती है जब वह संस्था मूलभूत रूप से सरकारी/संवैधानिक प्रकृति के कार्यों को अंजाम दे रही हो या कानून द्वारा निहित शक्ति का प्रयोग कर रही हो। चूंकि लिंक्डइन की सेवाएं स्वैच्छिक, व्यावसायिक और यूजर-ड्रिवन हैं, इसलिए वह अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ या उसकी एजेंसी के दायरे में नहीं आती।

मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की निजी प्रकृति:

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अभिव्यक्ति का माध्यम जरूर हैं, लेकिन जब तक कोई वैधानिक दायित्व न हो, वे अपनी सेवा शर्तों के तहत काम करने वाली निजी संस्थाएं ही बनी रहेंगी।

2. सिविल सूट ही एकमात्र उपाय:

अकाउंट बंद होने या कॉन्ट्रैक्ट (User Agreement) के उल्लंघन के मामलों में उपभोक्ता या यूजर को सामान्य दीवानी कानून (Civil Law) के तहत हर्जाने या बहाली के लिए सिविल कोर्ट में ही मुकदमा चलाना होगा।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार—निजी संस्थाओं के विरुद्ध रिट जारी करने की विधिक सीमाएं), अनुच्छेद 12 (‘राज्य’ की विधिक परिभाषा), प्रशासनिक कानून में ‘सार्वजनिक कार्य / लोक कर्तव्य का सिद्धांत’ (Public Function / Public Duty Test), सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules, 2021) के तहत गठित शिकायत अपीलीय समिति (GAC), तथा सोशल मीडिया व प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म्स के संविदात्मक दायित्वों (Contractual / User Agreement Disputes) पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नज़ीरी फैसला सुनाया है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता मयंक जैन (Mayank Jain) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट विधिक व्यवस्था दी कि लिंक्डइन (LinkedIn) या उसके रेजिडेंट ग्रिवांस ऑफिसर द्वारा किसी उपयोगकर्ता का अकाउंट ब्लॉक या प्रतिबंधित (Restricted) करने के निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।

उच्च न्यायालय ने दो-टूक कहा कि किसी भी निजी संस्था (Private Entity) को रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में लाने का विधिक मानक यह है कि वह ऐसे कार्यों का संपादन करती हो जो मूलतः प्रकृति में शासकीय (Fundamentally Governmental in Nature) हों या कानून द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर किए जाते हों। अदालत ने रेखांकित किया कि लिंक्डइन केवल एक स्वैच्छिक और वाणिज्यिक डिजिटल मंच प्रदान करता है; यह किसी वैधानिक या लोक कर्तव्य का पालन नहीं करता। अतः अकाउंट ब्लॉक किए जाने से व्यथित किसी भी उपयोगकर्ता के लिए उचित कानूनी उपचार दीवानी वाद (Civil Suit) दायर करना है, न कि उच्च न्यायालय में संवैधानिक रिट दाखिल करना।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘जनमत को आकार देना लोक कर्तव्य नहीं; लिंक्डइन का संचालन विशुद्ध निजी है’:

न्यायमूर्ति अमित महाजन ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की प्रकृति और लोक कर्तव्य के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “यद्यपि प्रतिवादी संख्या 2 (लिंक्डइन) द्वारा प्रदान किया गया मंच सूचना के प्रसार और जनमत को आकार देने (Shaping Public Opinion) में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किंतु इसका प्राथमिक कार्य अभिव्यक्ति के लिए एक मंच उपलब्ध कराना मात्र है—जिसमें सार्वजनिक विमर्श इसके संचालन का एक परिणाम (Consequence) मात्र है, न कि कोई सार्वजनिक दायित्व/लोक कर्तव्य (Public Duty)। इसका संचालन विशुद्ध रूप से निजी प्रकृति (Private in Nature) का बना हुआ है, और किसी भी सरकारी अधिदेश ने इसे राज्य के किसी पारंपरिक कार्य का निर्वहन नहीं सौंपा है। प्रतिवादी संख्या 2 किसी लोक कर्तव्य के निर्वहन में ऐसा मंच प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं है, और न ही उसे अपनी सेवाएं प्रदान करने के लिए विधिक रूप से विवश किया गया है। इसकी सेवाएं पूरी तरह स्वैच्छिक और उपयोगकर्ता-संचालित (Voluntary and User-Driven) हैं।”

2. ‘निजी संस्था पर रिट का विधिक थ्रेशोल्ड और सिविल सूट का विकल्प’:

  • पीठ ने निजी संस्थाओं के खिलाफ रिट क्षेत्राधिकार के मानक को रेखांकित किया:“किसी निजी निकाय को अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के अधीन लाने की पूर्व-शर्त यह है कि वह ऐसे कार्यों का निर्वहन कर रहा हो जो प्रकृति में मूलतः संप्रभु/शासकीय हों या कानून द्वारा निहित शक्ति के आधार पर निष्पादित किए जाते हों।लिंक्डइन या उसके रेजिडेंट ग्रिवांस ऑफिसर को रिट क्षेत्राधिकार के अधीन नहीं लाया जा सकता। ऐसी परिस्थितियों में उपयोगकर्ता के संविदात्मक अधिकारों के उल्लंघन के लिए दीवानी मुकदमा (Civil Suit) ही अधिक उपयुक्त और विधिक उपचार है।”

3. वैकल्पिक वैधानिक मंच (Grievance Appellate Committee):

  • अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि याचिकाकर्ता ने पहले ही आईटी नियम, 2021 के तहत केंद्र सरकार द्वारा स्थापित शिकायत अपीलीय समिति (GAC) के समक्ष अपील दायर कर रखी है, जो मध्यवर्तियों द्वारा सामग्री या अकाउंट प्रतिबंधों के निवारण हेतु वैधानिक अर्ध-न्यायिक मंच है।

Also Read; Media Rights: हिंसा की वास्तविक घटना की रिपोर्टिंग करना विभिन्न समूहों में शत्रुता फैलाना नहीं; संवेदनशील खबर के आधार पर पत्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण (2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयदिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) (एकल पीठ)
केस संदर्भमयंक जैन बनाम भारत संघ व अन्य [Mayank Jain v. Union of India & Ors. — W.P.(C) / 2026]
याचिकाकर्तामयंक जैन (Mayank Jain) — लिंक्डइन उपयोगकर्ता जिनका अकाउंट ब्लॉक किया गया था।
प्रतिवादी पक्ष1. भारत संघ (इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय – MeitY)
2. लिंक्डइन कॉर्पोरेशन / लिंक्डइन इंडिया (LinkedIn & Resident Grievance Officer)
विवाद का मूल कारणयाचिकाकर्ता मयंक जैन का लिंक्डइन अकाउंट बिना किसी पूर्व चेतावनी या कारण बताओ नोटिस के अचानक प्रतिबंधित कर दिया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि लिंक्डइन ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि उसने उनके ‘यूजर एग्रीमेंट’ (User Agreement) या ‘प्रोफेशनल कम्युनिटी पॉलिसी’ (Professional Community Policies) के किस विशिष्ट प्रावधान का उल्लंघन किया था।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क• लिंक्डइन आज के डिजिटल युग में पेशेवरों के लिए नेटवर्किंग, आजीविका और करियर से जुड़ा एक अनिवार्य सार्वजनिक मंच है।
• बिना निष्पक्ष सुनवाई और पारदर्शी कारण बताए अकाउंट ब्लॉक करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) व 19(1)(g) का उल्लंघन है।
लिंक्डइन और केंद्र सरकार का रुखलिंक्डइन के वकीलों ने दलील दी कि लिंक्डइन और उपयोगकर्ता के बीच का संबंध एक निजी संविदात्मक अनुबंध (Private Contract) पर आधारित है। कंपनी किसी संप्रभु या लोक कर्तव्य का निर्वहन नहीं करती, अतः उसके विरुद्ध परमादेश (Mandamus) या कोई अन्य रिट जारी नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयरिट याचिका अग्राह्य एवं अपोषणीय (Dismissed as Not Maintainable); उपयोगकर्ता को सिविल कोर्ट में वाद दायर करने की छूट।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 226 और सोशल मीडिया पर “पब्लिक ड्यूटी” का भ्रम’

  • ‘सार्वजनिक प्रभाव’ और ‘सार्वजनिक कार्य’ में मौलिक अंतर (Public Impact vs Public Duty):
    • आधुनिक युग में एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक/इंस्टाग्राम), यूट्यूब और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म्स करोड़ों नागरिकों की राय और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करते हैं।
    • किंतु दिल्ली हाईकोर्ट ने इस महत्वपूर्ण अंतर को विधिक रूप से रेखांकित किया: किसी प्लेटफॉर्म का समाज पर बड़ा प्रभाव होना (Public Impact) उसे ‘सार्वजनिक कर्तव्य’ (Public Duty) करने वाला निकाय नहीं बना देता।
    • लोक कर्तव्य वह होता है जो राज्य के संप्रभु कार्यों (जैसे शिक्षा, पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य या वैधानिक लाइसेंसिंग) से जुड़ा हो और कानून द्वारा उस पर अनिवार्य दायित्व के रूप में सौंपा गया हो। लिंक्डइन पर खाता खोलना या न खोलना पूरी तरह नागरिक और कंपनी की स्वैच्छिक संविदात्मक इच्छा पर निर्भर है।
  • ‘अंदी मुक्था सद्गुरु’ [(1989) 2 SCC 691] और ‘जी. बस्सी रेड्डी’ के सिद्धांत:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 226 के तहत “किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी” के विरुद्ध रिट जारी की जा सकती है, किंतु उसके लिए यह आवश्यक है कि उस प्राधिकारी के विरुद्ध कोई लोक विधि दायित्व (Public Law Element / Positive Public Duty) लागू होता हो।
    • चूंकि लिंक्डइन को सरकार द्वारा कोई पारंपरिक राज्य कार्य नहीं सौंपा गया है, इसलिए इसके द्वारा किसी खाते को बंद करना विशुद्ध रूप से दो निजी पक्षों के बीच सेवा की शर्तों (Terms of Service) के उल्लंघन का विवाद है, जो निजी कानून (Private Law) के दायरे में आता है।
  • आईटी नियम, 2021 का त्रि-स्तरीय तंत्र और सिविल कोर्ट:
    • सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 ने सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए शिकायत निवारण तंत्र बनाया है:
      1. पहले प्लेटफॉर्म के रेजिडेंट ग्रिवांस ऑफिसर (RGO) के पास शिकायत;
      2. उससे संतुष्ट न होने पर केंद्र सरकार की शिकायत अपीलीय समिति (GAC) के समक्ष अपील;
      3. इसके अलावा, संविदा के अवैध समापन या प्रतिष्ठा को नुकसान के लिए सिविल कोर्ट में क्षतिपूर्ति या बहाली हेतु दीवानी वाद (Civil Suit)।
    • हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका दायर करके इस वैधानिक व सामान्य कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: मयंक जैन बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan) (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: रिट याचिका खारिज (अधिकार-विहीन एवं अपोषणीय करार); लिंक्डइन के खिलाफ रिट पोषणीय नहीं मानी गई।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (मयंक जैन) की ओर से: अधिवक्ता अंजलि (Advocate Anjali)।
  • भारत संघ (MeitY) की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी वकील (CGSC) पीयूष गुप्ता (Piyush Gupta) एवं अधिवक्ता अतिशय जैन (Advocate Atishay Jain)।
  • प्रतिवादी (लिंक्डइन व ग्रिवांस ऑफिसर) की ओर से:
    • अधिवक्ता अभिषेक के. सिंह (Advocate Abhishek K Singh)
    • अधिवक्ता धनंजय दत्ता श्रीमाली (Advocate Dhananjay Dutta Shrimali)
    • अधिवक्ता सक्षम चतुर्वेदी (Advocate Saksham Chaturvedi)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 12 (‘राज्य’ की परिभाषा)
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 सहपठित सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 — नियम 3 व नियम 3A (ग्रिवांस मैकेनिज्म एवं Grievance Appellate Committee)
    • भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) — यूजर एग्रीमेंट और संविदात्मक सेवा शर्तें
    • विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) — संविदा के प्रवर्तन या क्षतिपूर्ति हेतु सिविल सूट
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • निजी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के विरुद्ध रिट पोषणीयता का विधिक मानक: ‘किसी निजी कॉर्पोरेट निकाय या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के विरुद्ध संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका केवल तभी पोषणीय हो सकती है जब वह निकाय किसी सकारात्मक लोक कर्तव्य (Positive Public Duty) का निर्वहन कर रहा हो या उसे कानूनन राज्य के संप्रभु कार्यों का उत्तरदायित्व सौंपा गया हो; लिंक्डइन जैसी वाणिज्यिक संस्थाएं केवल स्वैच्छिक मंच प्रदान करती हैं; उनकी गतिविधियों से सार्वजनिक विमर्श का उत्पन्न होना एक परिणाम मात्र है, लोक कर्तव्य नहीं; उपयोगकर्ता और प्लेटफॉर्म के बीच का विवाद संविदात्मक प्रकृति का है, जिसके तहत अकाउंट बंद करने या प्रतिबंधित करने के फैसले को केवल आईटी नियमों के तहत शिकायत तंत्र (GAC) अथवा सक्षम दीवानी अदालत में सिविल सूट (Civil Suit) के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: दिल्ली उच्च न्यायालय के इस निर्णय से यह विधिक स्थिति पुनः सुदृढ़ हो गई है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (जैसे लिंक्डइन, एक्स, मेटा) द्वारा अकाउंट सस्पेंड या रिस्ट्रिक्ट करने के मामलों में उपयोगकर्ता सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल नहीं कर सकते; उन्हें या तो आईटी मंत्रालय की Grievance Appellate Committee (GAC) के समक्ष अपील करनी होगी या फिर सिविल जज की अदालत में दीवानी वाद दायर कर संविदात्मक उल्लंघन की अनुतोष मांगनी होगी।

IT Rules: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली
न्यायाधीशन्यायमूर्ति अमित महाजन (Justice Amit Mahajan)
मामला/साइटेशनमयंक जैन बनाम भारत संघ व अन्य (Mayank Jain v. Union of India & Ors.)
याचिकाकर्ता (Petitioner)मयंक जैन (अकाउंट ब्लॉक किए जाने से व्यथित यूजर) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता अंजलि
प्रतिवादी (Respondents)भारत संघ (प्रतिनिधित्व: CGSC पीयूष गुप्ता व अधिवक्ता अतिशय जैन) एवं लिंक्डइन (प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता अभिषेक के. सिंह, धनंजय दत्ता श्रीमाली व सक्षम चतुर्वेदी)
मूल विवादलिंक्डइन द्वारा याचिकाकर्ता का अकाउंट बिना अग्रिम चेतावनी या स्पष्ट कारण बताए प्रतिबंधित/ब्लॉक कर देना।
अदालत का अंतिम निर्णयरिट याचिका खारिज (Non-maintainable): लिंक्डइन के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में रिट याचिका पोषणीय नहीं है; पीड़ित व्यक्ति दीवानी अदालत (Civil Court) में सिविल सूट दायर करे या GAC का रुख करे।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
19.1 ° C
19.1 °
19.1 °
81 %
1.9kmh
0 %
Sat
29 °
Sun
30 °
Mon
30 °
Tue
30 °
Wed
30 °

Recent Comments