Wednesday, August 19, 2026
HomeHigh CourtDivorce Act: ईसाई महिलाओं को अपने निवास स्थान से तलाक याचिका दायर...

Divorce Act: ईसाई महिलाओं को अपने निवास स्थान से तलाक याचिका दायर करने की मिले अनुमति…कानून में हो बदलाव, यह है पूरा केस

Divorce Act: केरल हाईकोर्ट ने ईसाई महिलाओं के कानूनी अधिकारों और उनके साथ होने वाली प्रक्रियात्मक असुविधा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए देश की संसद से कानून में संशोधन करने की पुरजोर सिफारिश की है।

तलाक अधिनियम, 1869 का किया गया जिक्र

हाईकोर्ट जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ईसाई महिलाओं को भी अन्य धर्मों की महिलाओं की तरह यह सुरक्षात्मक विधिक अधिकार मिलना चाहिए ताकि उन्हें न्याय पाने के लिए भटकना न पड़े। अदालत ने कहा, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत महिलाओं को यह कानूनी अधिकार प्राप्त है कि वे पति से अलग होने के बाद अपने वर्तमान निवास स्थान की अदालत में तलाक का मुकदमा दायर कर सकती हैं। लेकिन 167 साल पुराने तलाक अधिनियम, 1869 (Divorce Act, 1869) के कड़े तकनीकी नियमों के कारण ईसाई महिलाओं को आज भी इस बुनियादी अधिकार से वंचित रखा गया है। संसद को महिलाओं के व्यापक हितों को देखते हुए इस पुराने कानून में तुरंत सुधार करना चाहिए।

मामला क्या है?: वायनाड बनाम कासरगोड का क्षेत्राधिकार विवाद

घरेलू हिंसा और पलायन: यह कानूनी विवाद केरल के वायनाड की रहने वाली एक 32 वर्षीय ईसाई महिला की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता महिला की शादी कासरगोड में हुई थी। लेकिन गंभीर घरेलू हिंसा (Domestic Violence) के कारण उसे अपना ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। वह कासरगोड से भागकर वायनाड में अपने माता-पिता के साथ रहने लगी।

फैमिली कोर्ट का इनकार: महिला ने अपने वर्तमान निवास स्थान वायनाड के कल्पेट्टा स्थित पारिवारिक न्यायालय (Family Court) में तलाक की याचिका दायर की। लेकिन फैमिली कोर्ट ने इस आधार पर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया कि कानूनन उसके पास इस मामले को सुनने का क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) नहीं है।

क्या कहता है मौजूदा कानून?: ईसाई शादियों और तलाक को नियंत्रित करने वाले तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 3(3) के तहत, तलाक की याचिका केवल उसी अदालत में दायर की जा सकती है। जहां शादी संपन्न (Solemnised) हुई हो, या जहाँ पति-पत्नी के रूप में यह जोड़ा आखिरी बार एक साथ रहा हो।

याचिकाकर्ता का विधिक तर्क: पीड़ित महिला ने हाई कोर्ट का रुख करते हुए दलील दी कि कासरगोड जाकर केस लड़ना उसके लिए वित्तीय और शारीरिक रूप से असंभव है। उसने तर्क दिया कि ईसाई महिलाओं को अपने निवास स्थान से केस करने की अनुमति न देना सीधे तौर पर ‘धार्मिक भेदभाव’ (Religious Discrimination) है, इसलिए अदालत को इस धारा की नई और उदार व्याख्या करनी चाहिए।

हाई कोर्ट का रुख: “अदालत कानून नहीं लिख सकती, यह संसद का काम है”

जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने महिला की व्यावहारिक कठिनाइयों और पीड़ा से पूरी सहानुभूति जताई, लेकिन साथ ही उन्होंने कानून की सीमाओं को भी स्पष्ट किया। कोर्ट के मुख्य विधिक बिंदु इस प्रकार हैं।

कानून की उदार व्याख्या की सीमाएं

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस मांग को खारिज कर दिया कि अदालत खुद कानून की धारा 3(3) को संशोधित कर दे। कोर्ट ने कहा कि जब कानून का वैधानिक प्रावधान पूरी तरह से स्पष्ट और अकाट्य हो, तो केवल पक्षकारों की कठिनाई (Hardship) को देखकर अदालत उसमें अपनी तरफ से नए शब्द नहीं जोड़ सकती। कानून बनाने या बदलने का अनन्य अधिकार केवल विधायिका (Legislature) यानी संसद के पास है।

व्यक्तिगत कानूनों में अंतर भेदभाव नहीं

अदालत ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग धार्मिक समुदायों को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में प्रक्रियात्मक अंतर होना संविधान के तहत ‘असंवैधानिक भेदभाव’ की श्रेणी में नहीं आता।

संसद को प्रगतिशील सुधार करने की आवश्यकता

अदालत ने अपने फैसले में संसद के लिए एक मजबूत और स्पष्ट संदेश जारी किया कि ईसाई पत्नी को उसके निवास स्थान पर तलाक याचिका दायर करने में सक्षम बनाने वाला प्रावधान अभी तक कानून की किताब में शामिल नहीं किया गया है। अतः इस अधिनियम के दायरे में आने वाली महिलाओं के हित में, संसद को हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम की तर्ज पर एक समान प्रावधान शामिल करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि ईसाई महिलाएं भी मुकदमा दायर करते समय अपने निवास स्थान की अदालत का लाभ उठा सकें।

केंद्रीय कानून मंत्रालय को निर्देश

अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वे इस फैसले की एक प्रति केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय (Union Ministry of Law and Justice) को भेजें, ताकि सरकार इस विधिक विसंगति को दूर करने के लिए कानून में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर सके।

महिलाओं के लिए तात्कालिक कानूनी उपाय

हाई कोर्ट ने पीड़ित महिला को ढाढस बंधाते हुए याद दिलाया कि भले ही वह सीधे वायनाड में केस फाइल नहीं कर सकती, लेकिन उसके पास एक वैकल्पिक कानूनी रास्ता मौजूद है। वह सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कासरगोड में लंबित या दायर होने वाले मुकदमे को अपनी सुविधा के अनुसार वायनाड की अदालत में ट्रांसफर (Transfer Petition) करने की गुहार लगा सकती है।

अदालत का अंतिम आदेश

केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट विधिक प्रावधानों के अभाव में महिला की रिट याचिका को खारिज (Dismiss) कर दिया, लेकिन इस दृढ़ उम्मीद और न्यायिक टिप्पणी के साथ कि देश की संसद इस ऐतिहासिक विसंगति को जल्द से जल्द दूर करेगी।

केस मैट्रिक्स: केरल हाई कोर्ट का निर्देश (जुलाई 2026)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांकेरल उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court), कोच्चि
माननीय न्यायाधीशजस्टिस बेचू कुरियन थॉमस (एकल पीठ)
संबंधित मूल कानूनतलाक अधिनियम, 1869 (The Divorce Act, 1869) – धारा 3(3)
तुलनात्मक कानूनहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954
याचिकाकर्ता की स्थिति32 वर्षीय ईसाई महिला (वायनाड, केरल)
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका खारिज; लेकिन केंद्रीय कानून मंत्रालय को कानून में संशोधन के लिए सुझाव पत्र भेजने का निर्देश।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
few clouds
29 ° C
29 °
29 °
84 %
4.1kmh
23 %
Wed
29 °
Thu
34 °
Fri
36 °
Sat
36 °
Sun
37 °

Recent Comments