सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और AI पर कड़ी टिप्पणी
- स्वतंत्र जांच में खुली पोल: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में उद्धृत फैसलों की खुद जांच की और पाया कि वे मुकदमे या तो अस्तित्व में ही नहीं थे, या फिर असली मुकदमों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले गए थे, वे AI का भ्रम (AI Hallucination) थे।
- AI केवल मदद के लिए, निर्णय के लिए नहीं: पीठ ने न्यायिक व अर्ध-न्यायिक कार्यों में एआई के उपयोग पर ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा:“सहायता कभी भी निर्णय (Adjudication) का विकल्प नहीं हो सकती। AI प्रशिक्षण के पहियों (Training Wheels) की तरह काम कर सकता है, लेकिन इसे पायलट की सीट सौंपना अविवेकपूर्ण और बेहद खतरनाक होगा।”
- न्यायिक अधिकारी पर कार्रवाई का विकल्प: शीर्ष अदालत ने पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू एंड कश्मीर बैंक मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि बिना सत्यापित AI सामग्री के उपयोग पर ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ होना चाहिए। कोर्ट ने नियुक्ति प्राधिकारी को दोषी सीमा शुल्क अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार करने की छूट दी है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) के अनियंत्रित और गैर-जिम्मेदाराना उपयोग पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए एक हीरा व्यापारी पर लगाया गया ₹425.28 करोड़ का भारी-भरकम जुर्माना रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने सूरत के अतिरिक्त सीमा शुल्क आयुक्त (Additional Commissioner of Customs, Surat) के आदेश और उसकी पुष्टि करने वाले गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने पाया कि कस्टम्स विभाग के निर्णय अधिकारी (Adjudicating Officer) ने अपने आदेश में ऐसे फैसलों, फर्जी साइटेशन्स और कानूनी सिद्धांतों पर भरोसा किया था जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थे और AI द्वारा गढ़े गए (AI Hallucinations) थे [विजय घनश्याम गाडिया बनाम भारत संघ एवं अन्य]।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व मार्गदर्शक टिप्पणियां
1. AI सहायक हो सकता है, न्यायनिर्णयन का विकल्प नहीं न्यायिक और अर्ध-न्यायिक प्रक्रियाओं में AI की भूमिका को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा: “सहायता (Assistance) कभी भी वास्तविक न्यायनिर्णयन (Adjudication) का स्थान नहीं ले सकती। AI सीखने के लिए सहायक पहियों (Training Wheels) के रूप में तो काम आ सकता है, लेकिन इसे पायलट की सीट (Pilot’s Seat) सौंपना अविवेकपूर्ण और बेहद खतरनाक होगा।”
2. फर्जी साइटेशन और AI हेलुसिनेशन पर सख्त रुख अदालत ने स्वतः सत्यापन के बाद दर्ज किया: “इस मामले में AI का उपयोग और अधिकारी द्वारा संदिग्ध सामग्री पर भरोसा किया जाना आदेश की वैधता के लिए घातक साबित हुआ है। जांच में सामने आया कि जिन फैसलों का हवाला दिया गया, वे या तो पूरी तरह अस्तित्वहीन (Non-existent) थे या उनके साइटेशन फर्जी थे। कुछ मौजूद फैसलों में वह कानूनी सिद्धांत था ही नहीं जो निकाला गया—यह पूरी तरह से AI का मतिभ्रम (AI Hallucination) प्रतीत होता है।”
3. ‘शून्य सहनशीलता’ (Zero Tolerance) की नजीर पीठ ने अपने पूर्व फैसले (पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड) का हवाला दिया, जिसमें वकीलों और जजों दोनों द्वारा अप्रमाणित AI-जनरेटेड नजीरों के इस्तेमाल के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ अपनाने की बात कही गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- ₹425.28 करोड़ का जुर्माना: 8 अक्टूबर 2025 को अतिरिक्त सीमा शुल्क आयुक्त, सूरत ने कस्टम्स एक्ट, 1962 की धारा 114 के तहत हीरा व्यापारी विजय घनश्याम गाडिया पर ₹425.28 करोड़ का जुर्माना लगाया था। आरोप था कि टैरिफ कम करने के लिए प्राकृतिक हीरों की खेप को ‘लैब-ग्रोन डायमंड’ (Lab-grown diamonds) घोषित किया गया था।
- गुजरात हाईकोर्ट का रुख: व्यापारी ने जुर्माने को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 20 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: अपीलकर्ता ने साबित किया कि कस्टम्स अधिकारी ने अपने लंबे आदेश में जिन कानूनी फैसलों और अनुच्छेदों का हवाला देकर जुर्माना लगाया था, वे सब AI द्वारा तैयार किए गए फर्जी और मनगढ़ंत उद्धरण थे।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश
- जुर्माना आदेश और हाईकोर्ट का फैसला रद्द: शीर्ष अदालत ने ₹425.28 करोड़ के जुर्माने के मूल आदेश और गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया।
- नए अधिकारी द्वारा नए सिरे से सुनवाई: मामले को पुनः विचारार्थ (Remand) वापस भेजते हुए निर्देश दिया गया कि मूल आदेश पारित करने वाले अधिकारी के अलावा, उसी रैंक के किसी अन्य निष्पक्ष अधिकारी द्वारा मामले की नए सिरे से सुनवाई कर निर्णय लिया जाए।
- लापरवाह अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की छूट: अदालत ने नियुक्ति प्राधिकारी (Appointing Authority) पर यह निर्णय छोड़ा कि वह फर्जी AI सामग्री पर आधारित आदेश लिखने वाले कस्टम्स अधिकारी के खिलाफ उचित प्रशासनिक/विभागीय कार्रवाई शुरू करने पर विचार करे।
AI Hallucination: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति शील नागू |
| केस का शीर्षक | विजय घनश्याम गडिया बनाम भारत संघ व अन्य |
| मूल मामला | प्राकृतिक हीरों को लैब-ग्रोन बताकर सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 114 के तहत ₹425.28 करोड़ का जुर्माना। |
| अदालत का फैसला | फर्जी AI साइटेशन्स के कारण जुर्माना रद्द; मामले को किसी अन्य अधिकारी द्वारा नए सिरे से सुनने का निर्देश। |

