Tuesday, November 3, 2026
HomeHigh CourtHigh Court: पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे का अभिभावक कौन,...

High Court: पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे का अभिभावक कौन, ये रही इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी…

High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मां पांच साल से कम उम्र के बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक होती है और सामान्य तौर पर, उसे अपने नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा की अनुमति होगी।

पारिवारिक अदालत के आदेश के खिलाफ दायर हुई याचिका

न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश की पीठ अमित धामा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने अपनी चार साल की बेटी की कस्टडी अपनी अलग रह रही पत्नी को देने के पारिवारिक अदालत के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जब दंपति अलग हो गए थे…

अपील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही अलग होने के समय बच्चे का साथ पिता को दे दिया गया हो, लेकिन इससे मां को अपने बच्चे की कस्टडी के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा। पीठ ने कहा, सिर्फ इसलिए कि मां को उस समय अपनी बेटी के साथ से वंचित कर दिया गया था, जब दंपति अलग हो गए थे। यह तथ्य कि बेटी कुछ समय तक पिता के साथ रही थी। मां जो उसकी प्राकृतिक संरक्षक है, नाबालिग बेटी की कस्टडी से इनकार करने के लिए पर्याप्त परिस्थिति नहीं होगी।

हाईकोर्ट ने 10 जनवरी को दिए यह आदेश…

10 जनवरी के अपने आदेश में कहा कि चार साल की बेटी की विभिन्न शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक ज़रूरतें उसकी मां की देखभाल और संरक्षण में बेहतर ढंग से संरक्षित होंगी। धामा ने परिवार अदालत के 31 अगस्त, 2024 के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसमें चार वर्षीय बेटी की एकपक्षीय अभिरक्षा प्रतिवादी मां को दी गई थी। दलील दी गई कि पिता बेटी की देखभाल कर रहा है और उसकी कस्टडी मां को देने की कोई जरूरत नहीं है।

वर्ष 2010 में दोनों पक्षों की हुई थी शादी

उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों पक्षों की शादी 2010 में हुई थी और उनका एक बेटा और एक बेटी है। इसमें यह भी कहा गया कि पति ने तलाक की याचिका दायर की थी जबकि पत्नी ने बेटी की कस्टडी के लिए याचिका दायर की थी। अदालत को सूचित किया गया कि बेटा एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहा था, और धामा खर्च उठा रहा था जबकि बेटी पिता के साथ रह रही थी।

बेटी को पिता की देखभाल से हटाना उसके लिए दर्दनाक होगा

अदालत ने कहा कि यह तर्क कि बेटी को पिता की देखभाल से हटाना उसके लिए दर्दनाक होगा, अप्रभावी है। यह माना गया कि भले ही हिरासत के हस्तांतरण से बच्चे के लिए मनोवैज्ञानिक तनाव हो सकता है, लेकिन पार्टियों के हितों को संतुलित करना होगा। यह देखा गया कि मां स्नातक थी, अकेली रहती थी और मां द्वारा बेटी को नुकसान पहुंचाने का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। यह मानते हुए कि मां बेटी की विभिन्न जरूरतों को पूरा कर सकती है, उच्च न्यायालय ने परिवार अदालत के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि, अदालत ने माता-पिता दोनों को मुलाकात का अधिकार दिया।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
clear sky
21.8 ° C
21.8 °
21.8 °
85 %
1.8kmh
0 %
Tue
30 °
Wed
30 °
Thu
30 °
Fri
30 °
Sat
29 °

Recent Comments