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मामले की पृष्ठभूमि और 28 अक्टूबर की हिंसक घटना
- बार एसोसिएशन के पत्र की हकीकत:27 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष डॉ. सी.पी. उपाध्याय और महासचिव संतोष कुमार मिश्रा ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति अजय भानोट की अदालत के बहिष्कार की धमकी दी थी। पत्र में आरोप लगाया गया था कि जज ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता (वी.पी. श्रीवास्तव) का अपमान किया और एक वकील को जेल भेजने की बात कही। हालांकि, सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव ने स्वयं कोर्ट में उपस्थित होकर स्पष्ट किया कि उनके साथ ऐसी कोई अपमानजनक घटना नहीं हुई थी और बार का दावा पूरी तरह काल्पनिक था।
- अदालत परिसर में हिंसा और मारपीट:28 अक्टूबर की सुबह जब जज कोर्ट रूम में प्रवेश करने वाले थे, तब उपद्रवी वकीलों के समूह ने नारेबाजी और हुड़दंग शुरू कर दिया। कोर्ट स्थगित होने के बाद, वकीलों के समूह ने अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA-I) पारितोष कुमार मालवीय और अन्य सरकारी वकीलों पर जानलेवा हमला कर दिया। मालवीय का चेहरा सूज गया और उन्हें गंभीर चोटें आईं। वकीलों ने राज्य सरकार की ओर से पेश होने पर उन्हें परिणाम भुगतने की धमकियां भी दीं।
- अदालत की संपत्तियों को नुकसान:रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के अनुसार, वकीलों ने अदालती कार्यवाही को बाधित किया, फर्नीचर उल्टा-पल्टा और तोड़फोड़ की तथा बीच-बचाव करने आए सुरक्षाकर्मियों के साथ भी मारपीट की।
हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष और निर्देश
1. न्यायपालिका को डराने का प्रयास स्वीकार्य नहीं:
अदालत ने स्पष्ट किया कि सत्ता के सामने सच बोलना बार (Bar) का दायित्व है, लेकिन यह किसी को हिंसा भड़काने या न्यायपालिका जैसी संस्था के खिलाफ विद्वेष फैलाने का लाइसेंस नहीं देता। वकीलों का यह कृत्य न्याय के संचालन को बाधित करने और अदालत को ब्लैकमेल करने का आपराधिक प्रयास है।
2. मुख्य न्यायाधीश को मामले का प्रेषण:
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि वे:
- दोषी वकीलों के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने के लिए इसे उपयुक्त पीठ के पास भेजें।
- रजिस्ट्रार जनरल को हिंसा भड़काने, साजिश रचने, मारपीट और तोड़फोड़ की धाराओं के तहत दोषी वकीलों के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दें।
3. फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट्स पर शिकंजा:
अदालत ने 27 और 28 अक्टूबर की घटनाओं के संबंध में सोशल मीडिया पर गलत जानकारी और भ्रामक पोस्ट साझा करने वाले लोगों पर भी प्राथमिकी दर्ज करने और ऐसी सामग्री को इंटरनेट से तुरंत हटाने/ब्लॉक करने का निर्देश दिया है।
प्रयागराज: न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालत की गरिमा को कलंकित करना, न्यायिक कार्यवाही में प्रत्यक्ष बाधा डालना एवं न्याय प्रशासन में अवरोध), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराएं (दंगा, लोक सेवकों पर हमला, हिंसा के लिए उकसाना, आपराधिक षड्यंत्र), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) के तहत सोशल मीडिया पर न्यायिक संस्था के विरुद्ध भ्रामक सामग्री का विलोपन, तथा बार और बेंच के पारस्परिक संबंधों में ‘सहमति बनाम अराजकता’ (Anarchy is not a species of dissent) के विधिक सिद्धांतों पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक, साहसिक और अत्यंत कठोर आदेश पारित किया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजय भनोट (Justice Ajay Bhanot) और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत (Justice Divesh Chandra Samant) की खंडपीठ ने 28 अक्टूबर 2026 को कोर्ट रूम संख्या 49 में वकीलों के एक समूह द्वारा राज्य विधि अधिकारियों (AGAs), अदालती कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों पर किए गए जानलेवा हमले और अदालत कक्ष में की गई तोड़फोड़ का स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) करार दिया है।
पीठ ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया ताकि इसे विधि अनुसार आपराधिक अवमानना की सुनवाई हेतु उपयुक्त खंडपीठ के समक्ष रखा जा सके। इसके साथ ही, खंडपीठ ने मुख्य न्यायाधीश से औपचारिक अनुरोध किया है कि वे उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) को हिंसा, साजिश, तोड़फोड़ और अदालत के बहिष्कार में शामिल संबंधित वकीलों तथा सोशल मीडिया पर झूठी पोस्ट फैलाने वाले तत्वों के विरुद्ध नियमित आपराधिक प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने का निर्देश जारी करने पर विचार करें। अदालत ने दो-टूक कहा कि बार और बेंच के बीच सौहार्द के नाम पर हिंसा का तुष्टीकरण नहीं किया जा सकता; तुष्टीकरण से अदालतों को ब्लैकमेल करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जबकि कानून का कठोर भय ही ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोक सकता है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘हिंसा का तुष्टीकरण अदालतों को ब्लैकमेल के प्रति संवेदनशील बनाएगा’:
न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने अदालत कक्ष के भीतर हुई हिंसा और तोड़फोड़ पर तल्ख टिप्पणी करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: *”अदालत बार और बेंच के बीच सौहार्द (Harmony between Bar and Bench) के नाम पर इस प्रकार की बर्बर घटना पर अपनी आँखें नहीं मूँद सकती (Cannot turn a blind eye)। अदालत के भीतर हिंसा का तुष्टीकरण (Appeasement of violence) अदालतों को ब्लैकमेल के प्रति संवेदनशील बना देगा, और इससे हिंसा की पुनरावृत्ति कभी नहीं रुकेगी। हिंसा तुष्टीकरण से शांत नहीं होती; इसे अपराधियों को कानून के कटघरे में खड़ा करके और कानून का खौफ/निवारक प्रभाव (Deterrence of law) स्थापित करके ही रोका जा सकता है।”*
2. ‘अराजकता असहमति का रूप नहीं है; बार की स्वतंत्रता बेंच को बदनाम करने का लाइसेंस नहीं’:
- खंडपीठ ने वकीलों के अभिव्यक्ति के अधिकार और आचरण की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया:*”सत्ता के सामने सच बोलने (Speak truth to power) का बार का दायित्व किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा भड़काने और संस्था के विरुद्ध असंतोष फैलाने का लाइसेंस नहीं है।अराजकता असहमति का कोई रूप नहीं है (Anarchy is not a species of dissent)। बार में बोलने की आज़ादी का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आपको बेंच को बदनाम करने (Freedom to slander the Bench) की छूट मिल गई है।*विधिक प्रक्रिया में बार और बेंच के बीच बहस और संवाद के लिए सुदृढ़ परंपराएं और ढांचे मौजूद हैं, किंतु इसमें धमकी, भय या हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। हिंसा को भड़काना और स्वयं हिंसा करना विधिक विमर्श (Legal Discourse) के घटक नहीं हैं, बल्कि वे आपराधिक अपराधों (Criminal Offences) के मूल तत्व हैं।”
3. सोशल मीडिया पर झूठी सूचनाओं और दुष्प्रचार के खिलाफ FIR व Takedown:
- अदालत ने 27 और 28 अक्टूबर की घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया पर न्यायपालिका को बदनाम करने वाली फर्जी पोस्ट्स और आधे-अधूरे सच के प्रसार पर गंभीर चिंता जताई:“मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध है कि वे विचार करें कि क्या उन व्यक्तियों के विरुद्ध भी प्राथमिकी दर्ज कराई जाए जिन्होंने सोशल मीडिया पर उच्च न्यायालय की घटनाओं के बारे में झूठी और भ्रामक पोस्ट्स प्रसारित की हैं। ऐसी पोस्ट्स को तुरंत ब्लॉक और डिलीट (Blocked and Deleted) कराया जाना चाहिए ताकि संस्था के प्रति असंतोष फैलने से रोका जा सके।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं 28 अक्टूबर की हिंसक घटनाएं
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज (स्वतः संज्ञान आपराधिक अवमानना कार्यवाही) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति अजय भनोट एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत (खंडपीठ) |
| घटनास्थल व समय | कोर्ट रूम संख्या 49, इलाहाबाद उच्च न्यायालय — 28 अक्टूबर 2026 (प्रातःकालीन सत्र)। |
| विवाद का कथित कारण | इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों द्वारा 27 अक्टूबर को जारी एक पत्र, जिसमें आरोप लगाया गया था कि जस्टिस अजय भनोट ने एक वकील को अपमानित किया, जेल भेजने की बात कही और एक वरिष्ठ अधिवक्ता का उपहास उड़ाया, जिसके चलते अदालत के बहिष्कार का आह्वान किया गया था। |
| तथ्यों का खंडन | वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव (VP Srivastava) ने स्वयं 28 अक्टूबर को अदालत में उपस्थित होकर रिकॉर्ड पर स्पष्ट किया कि 27 अक्टूबर को उनके साथ किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार या अपमान की कोई घटना नहीं हुई थी और कार्यवाहियां पूरी तरह सौहार्दपूर्ण थीं। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि किसी वकील को जेल भेजने का कोई आदेश कभी पारित ही नहीं हुआ था। पदाधिकारियों ने पत्र जारी करने से पहले तथ्यों का कोई सत्यापन नहीं किया था। |
| 28 अक्टूबर की हिंसा का विवरण | • जजों के चैंबर से निकलते ही वकीलों के एक आक्रामक समूह ने कोर्ट रूम में घुसकर तेज नारेबाजी शुरू कर दी, जिससे न्यायिक कार्य ठप हो गया और अदालत को उठना पड़ा। • जजों के उठने के बाद वकीलों के समूह ने अदालत कक्ष के भीतर प्रथम अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA-I) पारितोष कुमार मालवीय पर जानलेवा हमला किया। जब वे चैंबर में पहुंचे तो उनका चेहरा सूजा हुआ था और वे चलने में असमर्थ थे। उन्हें सरकार की ओर से पेश होने पर गंभीर धमकियां दी गईं। • अन्य सरकारी वकीलों—संजीव पांडे, प्रदीप जायसवाल और संदीप तिवारी—सहित अदालती कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों पर भी शारीरिक हमले किए गए। • कोर्ट रूम के फर्नीचर को तोड़ा गया और कुर्सियों-मेजों को उलट दिया गया। |
| बेंच द्वारा की गई कानूनी कार्रवाई | 1. घटना को सीपीसी/अवमानना कानून के तहत आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) माना गया और मामला उपयुक्त खंडपीठ द्वारा सुनवाई हेतु मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित किया गया। 2. मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया गया कि वे रजिस्ट्रार जनरल को दोषी वकीलों और सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो/पोस्ट डालने वालों के विरुद्ध FIR दर्ज कराने का निर्देश दें। 3. रजिस्ट्रार जनरल की 28 अक्टूबर की जांच रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया। |
विधिक एवं संस्थागत विश्लेषण: ‘न्यायिक गरिमा, आपराधिक अवमानना और बार का आचरण’
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) का सीधा उल्लंघन:
- धारा 2(c) आपराधिक अवमानना को परिभाषित करती है—जिसमें किसी भी प्रकाशन या कृत्य द्वारा अदालत के प्राधिकार को कलंकित करना (Scandalize the court), न्यायिक कार्यवाही के सम्यक अनुक्रम में पूर्वाग्रह या हस्तक्षेप करना, या न्याय प्रशासन के मार्ग में किसी भी तरीके से बाधा डालना शामिल है।
- अदालत कक्ष के भीतर घुसकर तोड़फोड़ करना, फर्नीचर पलटना, न्यायिक कार्यवाही को जबरन रोकना, और राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकारी वकीलों को लहूलुहान कर देना आपराधिक अवमानना का सबसे प्रत्यक्ष और गंभीर रूप (Grossest form of Criminal Contempt) है।
- संविधान पीठ का ऐतिहासिक सिद्धांत (Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India):
- सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने स्पष्ट निर्धारित किया है कि किसी भी बार एसोसिएशन या वकील को अदालतों के बहिष्कार (Boycott of Courts) या हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
- यदि किसी न्यायिक आदेश या व्यवहार से कोई पक्ष व्यथित है, तो कानून में अपील, पुनरीक्षण या मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक शिकायत का वैधानिक मार्ग उपलब्ध है। अदालत कक्ष में हिंसा और गुंडागर्दी करना सीधे भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत गैर-जमानती अपराध है।
- ‘बर्निंग डेक पर सच बोलने वाले नायक’ (The Burning Deck Reference):
- खंडपीठ ने अपने आदेश के अंत में वरिष्ठ अधिवक्ता वी.पी. श्रीवास्तव और घायल अपर शासकीय अधिवक्ताओं (AGAs) के साहस की विशेष सराहना की।
- अदालत ने साहित्यिक रूपक का प्रयोग करते हुए दर्ज किया कि इन वकीलों ने ‘जलते हुए डेक पर खड़े होकर सच बोला’ (Stood on the burning deck to tell the truth) और संस्था की मर्यादा तथा अदालती प्रक्रिया की रक्षा के लिए वकीलों के आक्रामक दबाव का सामना किया।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ प्रयागराज (स्वतः संज्ञान आपराधिक अवमानना क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: स्वतः संज्ञान अवमानना कार्यवाही [Suo Motu Criminal Contempt Reference / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति अजय भनोट एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत (खंडपीठ)
- घटना की तिथि: 28 अक्टूबर 2026
- आदेश की तिथि: 28–29 अक्टूबर 2026 (जारी विस्तृत आदेश)
- कार्यवाही का स्वरूप: आपराधिक अवमानना हेतु मुख्य न्यायाधीश को संदर्भ; वकीलों व सोशल मीडिया दुष्प्रचारकों पर आपराधिक FIR दर्ज कराने और पोस्ट्स हटाने की आधिकारिक सिफारिश।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अवमानना शक्तियां)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 14/15 (प्रक्रिया एवं संज्ञान)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — दंगा, बलवा, लोक सेवक पर हमला, आपराधिक धमकी, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान (PDPP Act) एवं आपराधिक षड्यंत्र
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) — न्यायिक संस्था के विरुद्ध भ्रामक सामग्री का विलोपन व अभियोजन
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक संस्था की शुचिता और बार-बेंच संबंधों का विधिक मानक: ‘बार और बेंच के बीच सौहार्द बनाए रखने के नाम पर अदालत कक्ष के भीतर होने वाली हिंसा, गुंडागर्दी और तोड़फोड़ पर आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं; हिंसा का तुष्टीकरण न्यायपालिका को ब्लैकमेल के प्रति संवेदनशील बना देता है; बार को प्राप्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बेंच को बदनाम करने या न्यायिक प्रक्रिया को पंगु बनाने का लाइसेंस नहीं है; अदालत कक्ष में सरकारी वकीलों पर हमला और तोड़फोड़ आपराधिक अवमानना के साथ-साथ गंभीर संज्ञेय अपराध हैं, जिनमें शामिल वकीलों के विरुद्ध कानूनी निवारण (Deterrence) स्थापित करने हेतु कठोर आपराधिक अभियोजन और अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिवार्य है।’
- वर्तमान स्थिति व भावी प्रक्रिया: आदेश के अनुपालन में पत्रावली इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की जा रही है; मुख्य न्यायाधीश द्वारा आपराधिक अवमानना की नियमित सुनवाई के लिए एक विशेष वृहद/खंडपीठ का गठन किया जाएगा; साथ ही, रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दोषी चिन्हित वकीलों और सोशल मीडिया हैंडल्स के खिलाफ प्रयागराज के संबंधित थाने में औपचारिक आपराधिक प्राथमिकियां दर्ज कराए जाने की विधिक प्रक्रिया विचाराधीन है।
FIR Against Lawyers:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज |
| पीठ | न्यायमूर्ति अजय भानोट एवं न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत |
| घटना की तिथि | 28 अक्टूबर 2026 (कोर्ट नंबर 49 में) |
| घटना का कारण | 27 अक्टूबर को जस्टिस अजय भानोट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता के अपमान और वकील को जेल भेजने की भ्रामक/झूठी अफवाह। |
| पीड़ित पक्ष | अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA-I पारितोष कुमार मालवीय, संजीव पांडे, प्रदीप जायसवाल, संदीप तिवारी), कोर्ट स्टाफ व सुरक्षाकर्मी। |
| अदालत की सिफारिशें | 1. दोषी वकीलों व फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट डालने वालों पर FIR दर्ज करना। 2. वकीलों के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करना। 3. भ्रामक सोशल मीडिया पोस्ट्स को तुरंत ब्लॉक/डिलीट करना। |

