Sunday, October 25, 2026
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Reserve Price: विक्रय विलेख निष्पादित होने तक करार प्रवर्तनीय संविदा नहीं; चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा उच्चतम बोली रद्द करने के निर्णय को ठहराया वैध

मामले की पृष्ठभूमि: दो साइटें, दो बोलियां और रद्द करने का निर्णय

  1. ई-नीलामी नोटिस (अगस्त 2022):चंडीगढ़ प्रशासन ने अगस्त 2022 में सेक्टर 33C में दो समान आकार (744.44 वर्ग गज) के नर्सिंग होम प्लॉट्स (साइट नं. 3 और साइट नं. 4) की नीलामी का नोटिस जारी किया। दोनों का आरक्षित मूल्य (Reserve Price) ₹6.91 करोड़ था।
  2. बोलियों में भारी अंतर (अक्टूबर 2022):
    • साइट नं. 3: अपीलकर्ता की सर्वोच्च बोली ₹18.25 करोड़ स्वीकार की गई।
    • साइट नं. 4: बेदी अस्पताल की बोली ₹12.58 करोड़ स्वीकार की गई। बेदी अस्पताल ने पूरी राशि (100%) जमा कर दी और 28 अक्टूबर 2022 को ‘एग्रीमेंट टू सेल’ निष्पादित किया गया, लेकिन कोई अंतिम आवंटन पत्र या कन्वेयंस डीड जारी नहीं हुई।
  3. प्रशासन द्वारा निरस्तीकरण (जनवरी 2023):प्रशासन ने पाया कि साथ वाले प्लॉट की तुलना में साइट नं. 4 में ₹6 करोड़ से अधिक का अंतर है, जो बाजार के रुझान को नहीं दर्शाता। प्रशासन ने चंडीगढ़ एस्टेट रूल्स, 2007 के नियम 5 के तहत अधिकार का प्रयोग करते हुए बेदी अस्पताल का अनुबंध रद्द कर दिया, पूरा पैसा वापस (Refund) कर दिया और उसे नई नीलामी में शामिल होने का निमंत्रण दिया। बेदी अस्पताल ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट का रुख किया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

1. “एग्रीमेंट टू सेल भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत बाध्यकारी अनुबंध नहीं”:

न्यायामूर्ति आलोक अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में स्पष्ट किया गया कि चंडीगढ़ एस्टेट रूल्स, 2007 और नीलामी की शर्तों के अनुसार, जब तक औपचारिक कन्वेयंस डीड (Conveyance Deed) निष्पादित नहीं हो जाती, तब तक भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 2(h) के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुबंध अस्तित्व में नहीं आता।

2. सार्वजनिक संपत्ति में अधिकतम मूल्य प्राप्त करने का अधिकार (SIPCOT सिद्धांत):

  • सुप्रीम कोर्ट ने Chairman and Managing Director, SIPCOT v. Contromix Pvt. Ltd. नजीर का पुनरोल्लेख करते हुए कहा:

“सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री या लीज में प्रशासनिक प्राधिकरण का प्राथमिक उद्देश्य राज्य के खजाने के लिए सर्वोत्तम/अधिकतम मूल्य प्राप्त करना होता है। जब तक कोई बाध्यकारी अनुबंध नहीं बन जाता, तब तक यदि प्राधिकरण को लगता है कि प्राप्त मूल्य बाजार दर से काफी कम है, तो नीलामी प्रक्रिया को निरस्त कर पुनः नीलामी कराना पूरी तरह से वैध है।”

3. मनमानेपन की अनुपस्थिति और हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर टिप्पणी:

  • सार्वजनिक कानून की सीमा: कोर्ट ने कहा कि प्राधिकरण का यह फैसला मनमाना या अकारण नहीं होना चाहिए। इस मामले में ₹6 करोड़ का स्पष्ट अंतर था, रद्द करने का कारण बताया गया था और पूरा पैसा तुरंत वापस किया गया था।
  • हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश की आलोचना: शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट द्वारा निरस्तीकरण पर स्टे लगाए बिना नई नीलामी कराने की अनुमति देने के अंतरिम आदेश को गलत माना, जिससे दो साल से अधिक समय तक जटिल मुकदमेबाजी चलती रही।

नई दिल्ली: भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) की धारा 2(h) (प्रवर्तनीय संविदा का गठन), चंडीगढ़ एस्टेट नियम, 2007 का नियम 5 (बिना कारण बताए उच्चतम बोली स्वीकार या अस्वीकार करने की संपदा अधिकारी की शक्ति), प्रशासनिक विधि में सार्वजनिक संपत्ति की नीलामी में सर्वोत्तम मूल्य प्राप्त करने का जनहितकारी सिद्धांत (Doctrine of Maximization of Public Revenue), भारत का संविधान के अनुच्छेद 14 (मनमानी के विरुद्ध संरक्षण), तथा विक्रय विलेख (Conveyance Deed) के निष्पादन से पूर्व ‘विक्रय अनुबंध’ (Agreement to Sell) की विधिक प्रकृति पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा (Justice Pamidighantam Sri Narasimha) और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe) की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के 1 अप्रैल 2025 के उस फैसले को पूरी तरह निरस्त (Set Aside) कर दिया, जिसने चंडीगढ़ के सेक्टर 33C स्थित नर्सिंग होम साइट (साइट नं. 4) की उच्चतम बोली और विक्रय अनुबंध को रद्द करने के प्रशासन के आदेश को खारिज कर दिया था।

शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी कि जब तक किसी सार्वजनिक संपत्ति का औपचारिक विक्रय विलेख (Conveyance Deed) निष्पादित नहीं हो जाता, तब तक केवल विक्रय अनुबंध निष्पादित होने या पूरी राशि जमा होने मात्र से कोई बाध्यकारी व प्रवर्तनीय अनुबंध अस्तित्व में नहीं आता। यदि पास के समान भूखंड की तुलना में काफी कम कीमत मिली हो, तो सार्वजनिक राजस्व को अधिकतम करने के उद्देश्य से नीलामी प्रक्रिया पर पुनर्विचार करना और बोली को रद्द करना पूरी तरह वैध और युक्तिसंगत है। अदालत ने निष्पक्षता और न्याय के हित में उक्त भूखंड की तीन महीने के भीतर नए सिरे से पारदर्शी ई-नीलामी (Fresh E-Auction) आयोजित करने का निर्देश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था

1. ‘सार्वजनिक संपत्ति के सर्वोत्तम मूल्य की प्राप्ति सर्वोपरि जनहित’

पीठ ने चंडीगढ़ एस्टेट रूल्स, 2007 के नियम 5 और ई-नीलामी की शर्तों का विश्लेषण करते हुए निर्णय में कहा: “सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री या पट्टे से संबंधित मामलों से निपटते समय, सार्वजनिक संपत्ति के विक्रय/पट्टे से अधिकतम मूल्य प्राप्त करने के उद्देश्य से नीलामी प्रक्रिया को वापस लेने या उस पर पुनर्विचार (Recall or Revisit) करने की किसी सार्वजनिक प्राधिकरण की कार्रवाई पूरी तरह न्यायोचित होगी। यह तब तक विधि सम्मत और अनुमेय है, जब तक कि दोनों पक्षों के बीच कोई कानूनी रूप से प्रवर्तनीय संविदा (Enforceable Contract) अस्तित्व में न आ गई हो।”

2. ‘विक्रय अनुबंध’ (Agreement to Sell) धारा 2(h) के तहत प्रवर्तनीय संविदा नहीं:

  • अदालत ने विधिक स्थिति स्पष्ट की कि नियमों के तहत जारी किया गया ‘विक्रय अनुबंध’ भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2(h) के तहत कोई पूर्ण व अपरिवर्तनीय संविदा नहीं बनाता।
  • सार्वजनिक नीलामी में राज्य और सफल बोलीदाता के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी संविदा केवल तभी पूर्ण होती है जब औपचारिक आवंटन पत्र (Allotment Letter) और विधिक विक्रय विलेख (Conveyance Deed) निष्पादित हो जाए। उससे पहले प्राधिकरण केवल जनहित और निष्पक्षता की शर्तों से बंधा होता है।

3. समान आकार के पड़ोसी भूखंडों में ₹6 करोड़ का भारी अंतर वैध आधार:

  • अदालत ने पाया कि सेक्टर 33C में दोनों नर्सिंग होम साइट्स (साइट 3 और साइट 4) का आकार बिल्कुल समान (744.44 वर्ग गज) था और दोनों का आरक्षित मूल्य ₹6.91 करोड़ था।
  • जबकि साइट नं. 3 के लिए ₹18.25 करोड़ की उच्चतम बोली स्वीकार की गई, वहीं ठीक बराबर वाली साइट नं. 4 के लिए केवल ₹12.58 करोड़ की बोली आई (लगभग ₹6 करोड़ कम)।
  • चेयरमैन एवं एमडी, सिपकॉट बनाम कॉन्ट्रोमिक्स प्रा. लि. नजीर का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति के निपटान में प्रमुख विचार अधिकतम जनभागीदारी से ‘सर्वोत्तम मूल्य’ सुरक्षित करना होता है। नीलामी में पर्याप्त रूप से कम कीमत मिलना किसी तथाकथित ‘उच्चतम बोलीदाता’ के पक्ष में संविदा को अंतिम रूप न देने का एक अत्यंत प्रासंगिक और वैध आधार है।

4. उच्च न्यायालय की अंतःकालीन व्यवस्था पर टिप्पणी और नई नीलामी का आदेश:

  • सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा अपनाई गई उस प्रक्रिया पर असंतोष व्यक्त किया जिसमें रद्दीकरण आदेश पर रोक लगाए बिना नई नीलामी की अनुमति दी गई और परिणाम घोषित करने पर रोक लगा दी गई, जिससे मुकदमेबाजी दो साल से अधिक खिंच गई।
  • यद्यपि 6 सितंबर 2023 की पुनर्नीलामी में अपीलकर्ता ने ₹18.30 करोड़ की बोली लगाई थी और बेदी हॉस्पिटल ने उस कीमत की बराबरी करने की पेशकश की, किंतु अदालत ने सभी पक्षों के साथ पूर्ण न्याय और सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए 3 महीने के भीतर नए सिरे से ई-नीलामी आयोजित करने का आदेश दिया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2022–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
विवादित संपत्तियांचंडीगढ़ के सेक्टर 33C स्थित दो फ्रीहोल्ड नर्सिंग होम भूखंड: साइट नं. 3 एवं साइट नं. 4 (प्रत्येक का क्षेत्रफल: 744.44 वर्ग गज; आरक्षित मूल्य: ₹6.91 करोड़)।
अक्टूबर 2022 की नीलामी• साइट नं. 3: अपीलकर्ता (सतिंदर पाल सिंह व अन्य) की ₹18.25 करोड़ की बोली स्वीकार हुई।
• साइट नं. 4: बेदी हॉस्पिटल की ₹12.58 करोड़ की बोली स्वीकार हुई।
भुगतान एवं करारबेदी हॉस्पिटल ने 21 अक्टूबर को 25% और 16 नवंबर 2022 को शेष 75% राशि जमा कर दी। 28 अक्टूबर 2022 को ‘विक्रय अनुबंध’ (Agreement to Sell) हुआ, किंतु औपचारिक आवंटन पत्र जारी नहीं हुआ।
प्रशासन का निर्णय (जनवरी 2023)प्रशासन ने 11 जनवरी 2023 को समीक्षा में पाया कि बराबर वाले भूखंड से ₹6 करोड़ कम मिलना बाजार दर के विपरीत है। 27 जनवरी 2023 को बोली रद्द कर पूरी धनराशि वापस की गई और 9 फरवरी को विक्रय अनुबंध निरस्त कर नई नीलामी में शामिल होने का न्योता दिया।
उच्च न्यायालय का रुख (2025)हाईकोर्ट ने सिडको बनाम शिशिर रियल्टी का हवाला देकर रद्दीकरण को मनमाना माना और प्रशासन के पत्रों को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (2026)हाईकोर्ट का निर्णय गलत ठहराया गया; शिशिर रियल्टी पट्टा विलेख रद्द करने का मामला था जबकि यहां विलेख निष्पादित ही नहीं हुआ था; रद्दीकरण वैध माना गया और 3 माह में नई ई-नीलामी का आदेश दिया गया।

विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: सार्वजनिक राजस्व का संरक्षण बनाम उच्चतम बोलीदाता का अधिकार

  • ‘हाईएस्ट बिडर’ का कोई निहित संविदात्मक अधिकार नहीं (No Vested Right):
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान राज्य बनाम मेसर्स जी.डी. बंसल और हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम बी. शर्मा सहित कई निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि नीलामी में किसी बोली का स्वीकार होना केवल एक प्रस्ताव (Offer) की स्वीकृति की प्रक्रिया है।
    • जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा अंतिम रूप से विक्रय विलेख (Conveyance Deed) पंजीकृत न कर दिया जाए, तब तक बोलीदाता के पक्ष में संपत्ति का कोई स्वत्व या अहस्तांतरणीय विधिक अधिकार (Vested Right) उत्पन्न नहीं होता।
  • संविधान का अनुच्छेद 14 और ‘सकारण निर्णय’:
    • सार्वजनिक प्राधिकरण की नीलामी रद्द करने की शक्ति पर केवल एक ही संवैधानिक अंकुश है—कि उसकी कार्रवाई मनमानी (Arbitrary) नहीं होनी चाहिए।
    • इस मामले में चंडीगढ़ प्रशासन ने कोई गुप्त या दुर्भावनापूर्ण कदम नहीं उठाया; उसने आदेश में स्पष्ट रूप से ₹6 करोड़ के भारी अंतर का कारण दर्ज किया, बेदी हॉस्पिटल का पूरा पैसा उसी दिन वापस लौटाया, और उसे आगामी खुली ई-नीलामी में भाग लेने की पूरी छूट दी। यह कार्रवाई लोक-प्रशासन के पारदर्शी मानकों के अनुकूल थी।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: सतिंदर पाल सिंह व अन्य बनाम बेदी हॉस्पिटल व अन्य [सिविल अपील संख्या / 2026]
  • उत्पत्ति: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 33791 एवं 33793 / 2025
  • पीठ: न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे
  • निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026
  • संबद्ध निचली अदालत का आदेश: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का निर्णय दिनांक 1 अप्रैल 2025 (निरस्त)

विधिक प्रतिनिधित्व:

अंतिम परिणाम: सिविल अपील पूर्णतः स्वीकार; पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का आदेश निरस्त; चंडीगढ़ प्रशासन को नियमानुसार तीन महीने के भीतर सेक्टर 33C स्थित साइट नं. 4 की नए सिरे से खुली ई-नीलामी आयोजित करने का निर्देश जारी।

अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार (Senior Advocate Guru Krishna Kumar)

चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से: अपर सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी (Additional Solicitor General Vikramjit Banerjee)

प्रतिवादी (बेदी हॉस्पिटल) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पटवालिया (Senior Advocate P.S. Patwalia)

प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 — धारा 2(h) (संविदा की परिभाषा व विधिक प्रवर्तनीयता) एवं धारा 10

चंडीगढ़ एस्टेट नियम, 2007 — नियम 5 (नीलामी प्रक्रिया, बिना कारण बताए उच्चतम बोली स्वीकार/अस्वीकार करने की संपदा अधिकारी की शक्तियां)

भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता व मनमानी पर विधिक रोक) एवं अनुच्छेद 226/136

संबद्ध न्यायिक नजीरें: सीएमडी, सिपकॉट बनाम कॉन्ट्रोमिक्स प्रा. लि. (सार्वजनिक राजस्व अधिकतम करने का सिद्धांत)

संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:

सार्वजनिक नीलामी में बोली रद्दीकरण का विधिक मानक: ‘सार्वजनिक संपत्ति के विक्रय में राज्य का प्राथमिक कर्तव्य अधिकतम राजस्व प्राप्त करना है; जब तक औपचारिक विक्रय विलेख निष्पादित न हो, तब तक विक्रय अनुबंध धारा 2(h) संविदा अधिनियम के तहत पूर्ण बाध्यकारी अनुबंध नहीं बनाता; निकटवर्ती समान संपत्ति की तुलना में पर्याप्त कम मूल्य प्राप्त होना बोली रद्द करने का युक्तिसंगत आधार है, बशर्ते प्राधिकरण ने सकारण आदेश देकर संपूर्ण धनराशि वापस की हो।’

Reserve Price: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे
मामले का नामसतिंदर पाल सिंह व अन्य बनाम बेदी अस्पताल व अन्य (Satinder Pal Singh & Ors. v. Bedi Hospital & Ors.)
विवादित संपत्तिसाइट नं. 4, सेक्टर 33C, चंडीगढ़ (नर्सिंग होम प्लॉट, क्षेत्रफल: 744.44 वर्ग गज)
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या उच्चतम बोली स्वीकार होने व राशि जमा होने के बाद भी जनहित/अधिकतम मूल्य प्राप्त करने हेतु नीलामी निरस्त की जा सकती है?
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णयहाईकोर्ट का आदेश रद्द; एग्रीमेंट टू सेल बाध्यकारी अनुबंध नहीं है। चंडीगढ़ प्रशासन को 3 महीने में नई ई-नीलामी आयोजित करने का निर्देश।
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