Saturday, June 13, 2026
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Insolvency and Bankruptcy Code: एक बार खिड़की बंद, तो अपील का अधिकार हमेशा के लिए खत्म…क्या है कमियां सुधारने का वक्त

Insolvency and Bankruptcy Code: सुप्रीम कोर्ट ने देश में दिवाला और दिवालियापन संहिता मामलों को समय-सीमा के भीतर निपटाने के संकल्प को दोहराते हुए कड़ा कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

री-फाइलिंग में देरी की माफी का मामला

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने साफ कहा कि कोई भी मुकदमेबाज शुरू में एक त्रुटिपूर्ण (Defective) अपील दाखिल करके और फिर 28 दिनों की अवधि के बाद ‘री-फाइलिंग में देरी की माफी’ (Condonation of Re-filing Delay) मांगकर कानून के सख्त समयबद्ध ढांचे को कमजोर नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक बार जब आईबीसी के तहत अपील दायर करने की अधिकतम 60 दिनों की वैधानिक अवधि और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के नियमों के तहत कमियां (Defects) सुधारने के लिए दी गई 28 दिनों की समय-सीमा समाप्त हो जाती है, तो अपील करने का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त (Extinguished) हो जाता है।

मामला क्या था? (त्रुटिपूर्ण अपील और 82 दिनों की भारी देरी)

शुरुआती अपील: यह पूरा विवाद राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) द्वारा 8 दिसंबर 2025 को पारित एक आदेश से शुरू हुआ था।अपीलकर्ता ने NCLAT के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। यह अपील 7 दिन की देरी से दायर की गई थी, लेकिन यह आईबीसी के तहत कोर्ट द्वारा माफ की जा सकने वाली अतिरिक्त 15 दिनों की अवधि के भीतर थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इस अपील में कुछ कमियां (Defects) पाईं और इसे ‘त्रुटिपूर्ण’ घोषित कर दिया।

लापरवाही और री-फाइलिंग: नियमों के मुताबिक इन कमियों को 28 दिनों के भीतर दूर करना था, लेकिन अपीलकर्ता ने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, कमियों को दूर करके 82 दिनों की अतिरिक्त देरी के बाद दोबारा अपील (Re-file) दायर की गई और साथ में देरी माफी की अर्जी लगाई गई।

मुख्य कानूनी सवाल: क्या सुप्रीम कोर्ट आईबीसी की धारा 62 के तहत उस स्थिति में दोबारा फाइलिंग की देरी को माफ कर सकता है, जब सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 के तहत तय 28 दिनों के भीतर कमियां दूर न की गई हों?

सुप्रीम कोर्ट का दोटूक जवाब: ‘खामियों वाली अपील केवल समय बचाने का हथकंडा नहीं हो सकती’

सर्वोच्च न्यायालय ने अपील को पूरी तरह से काल-बाधित (Time-Barred) मानते हुए खारिज कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने मुकदमेबाजों की इस प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की। क्या कोर्ट इस ढिलाई की अनुमति दे सकता है? कोर्ट ने स्वयं से दो तीखे सवाल पूछे, “क्या किसी मुकदमेबाज को केवल समय-सीमा की म्याद (Limitation) को बचाने के लिए एक ‘त्रुटिपूर्ण अपील’ दायर करने और उसके बाद अपनी फुर्सत से उन कमियों को सुधारने की अनुमति दी जानी चाहिए? क्या इस कोर्ट को ऐसी प्रथा को बढ़ावा देना चाहिए? इन दोनों सवालों का जवाब केवल एक ही है बिल्कुल नहीं’ (A resounding NO)।

28 दिन बाद केस मृत (Lis Frozen): कोर्ट ने कहा कि 28 दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद आईबीसी के तहत अपील कानूनी रूप से ‘जीवित’ नहीं रहती। यदि इस सख्त नियम को ढीला किया गया, तो लोग महीनों तक कमियां नहीं सुधारेंगे और पूरी दिवाला प्रक्रिया (Insolvency Process) लटक जाएगी, जो आईबीसी के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।

विश्लेषण: IBC और सुप्रीम कोर्ट रूल्स (SCR) का टाइमलाइन ग्रिड

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब समय-सीमा की बात आती है, तो आईबीसी के सख्त विधायी इरादे के सामने प्रक्रियात्मक रियायतों की कोई जगह नहीं है।

कानूनी चरण / प्रावधानआईबीसी और अदालती नियमों के तहत सख्त समय-सीमा
मूल अपील की अवधि45 दिन: NCLAT का आदेश मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए (धारा 62(1) IBC)।
कंडोनेबल/अतिरिक्त अवधि15 दिन: यदि कोई उचित और पर्याप्त कारण हो, तो कोर्ट अधिकतम १५ दिन की देरी और माफ कर सकता है। यानी अपील के लिए कुल बाहरी सीमा 60 दिन है।
कमियां सुधारने की अवधि28 दिन: रजिस्ट्री द्वारा कमियों (Defects) को अधिसूचित करने के बाद उन्हें सुधारने की अधिकतम अवधि (Supreme Court Rules – SCR)।
सुप्रीम कोर्ट रूल्स बनाम आईबीसीआईबीसी सर्वोपरि है: कोर्ट ने यह तर्क खारिज कर दिया कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट रूल्स में री-फाइलिंग की देरी माफ करने की अधिकतम सीमा नहीं है, इसलिए उदारता दिखाई जाए। कोर्ट ने कहा कि आईबीसी एक मूल वैधानिक कानून है, जबकि SCR एक अधीनस्थ कानून (Subordinate Legislation) है। दोनों में टकराव होने पर आईबीसी ही प्रभावी रहेगा।

आइए जानते हैं Insolvency and Bankruptcy Code के बारे में विस्तार से यहां पर

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC), 2016 भारत के कॉर्पोरेट और आर्थिक इतिहास में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी सुधार है। आसान भाषा में इसे “दिवाला और दिवालियापन संहिता” कहा जाता है। इस कानून के आने से पहले, अगर कोई कंपनी या बिजनेसमैन बैंकों का कर्ज नहीं चुका पाता था, तो बैंकों को अपना पैसा वसूलने में सालों (औसतन 4 से 5 साल) लग जाते थे। IBC ने इस पूरी प्रक्रिया को बेहद तेज, पारदर्शी और समयबद्ध (Time-bound) बना दिया है।

IBC कानून की पूरी बारीकियां और इसके नियम नीचे विस्तार से समझाए गए

दो जरूरी शब्द: Insolvency और Bankruptcy में अंतर

आगे बढ़ने से पहले इन दो शब्दों का मतलब समझना जरूरी है, क्योंकि लोग अक्सर इन्हें एक ही समझ लेते हैं।

इन्सॉल्वेंसी (Insolvency – दिवाला): यह एक वित्तीय स्थिति (Financial State) है। जब कोई व्यक्ति या कंपनी अपनी संपत्तियों (Assets) से अधिक कर्ज (Debts) ले लेती है और अपने चालू बिल या कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाती है, तो उसे ‘इन्सॉल्वेंट’ कहा जाता है। यह स्थिति सुधारी जा सकती है।

बैंकरप्सी (Bankruptcy – दिवालियापन): यह एक कानूनी घोषणा (Legal Declaration) है। जब कोर्ट या कानूनी अथॉरिटी यह मान लेती है कि यह व्यक्ति या कंपनी अब अपना कर्ज चुकाने के बिल्कुल लायक नहीं रही है, तो उसे आधिकारिक तौर पर ‘बैंकरप्ट’ (दिवालिया) घोषित कर दिया जाता है और उसकी संपत्ति बेचकर कर्जदारों का पैसा चुकाया जाता है।

IBC क्यों लाया गया? (उद्देश्य)

IBC 2016 से पहले भारत में दिवाला निकालने के लिए कई बिखरे हुए कानून थे (जैसे SICA, SARFAESI Act, RDDBFI Act)। इनमें तालमेल की कमी थी, जिससे मामले सालों-साल लटके रहते थे। IBC को निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए लाया गया। समय सीमा के अंदर समाधान (Time-bound Resolution): मामलों को एक निश्चित समय में निपटाना।

कंपनी को बचाना: इसका पहला मकसद कंपनी को बंद करना नहीं, बल्कि उसे दोबारा पटरी पर लाना (Revival) है, ताकि रोजगार और बिजनेस बचा रहे।

बैंकों का NPA कम करना: बैंकों का फंसा हुआ पैसा (Bad Loans) तेजी से वापस दिलाना।

Ease of Doing Business: भारत में व्यापार करने के माहौल को सुगम बनाना।

यह प्रक्रिया कैसे काम करती है? (The IBC Ecosystem)

नियामक: IBBI
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कानूनी अदालतें पेशेवर / संस्थाएं
NCLT (कंपनियों के लिए) IP (इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स)
DRT (व्यक्तियों के लिए) IU (इन्फॉर्मेशन यूटिलिटीज)

IBC के तहत एक मजबूत ढांचा तैयार किया गया है, जिसमें 4 मुख्य स्तंभ काम करते हैं।

Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI): यह इस पूरे कानून को चलाने वाली मुख्य सरकारी नियामक संस्था (Regulator) है।

Adjudicating Authorities (कानूनी अदालतें)

NCLT (National Company Law Tribunal): कंपनियों और लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) के मामलों की सुनवाई यहां होती है।

DRT (Debt Recovery Tribunal): व्यक्तिगत व्यापारियों और पार्टनरशिप फर्मों के मामले यहाँ जाते हैं।

Insolvency Professionals (IP): ये कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए एक्सपर्ट्स (जैसे CA, CS या वकील) होते हैं। जब कोई कंपनी दिवालिया होने की कगार पर होती है, तो कंपनी के प्रमोटर्स को हटाकर इस IP को कंपनी का पूरा कंट्रोल सौंप दिया जाता है।

Information Utilities (IU): यह एक डिजिटल डेटाबेस है जो कंपनियों के कर्ज और डिफॉल्ट का सटीक रिकॉर्ड रखता है, ताकि अदालतों में सबूत खोजने में वक्त बर्बाद न हो।

कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) के चरण

केस दर्ज करना (Initiation): डिफॉल्ट सीमा: ₹1 करोड़.

बैंक (Financial Creditor), वेंडर/सप्लायर (Operational Creditor) या खुद कंपनी का मालिक NCLT के पास केस दर्ज करा सकता है। वर्तमान नियम के अनुसार, कम से कम 1 करोड़ रुपये का डिफॉल्ट होने पर ही मामला IBC में जाएगा।

केस की स्वीकार्यता और IP की नियुक्ति: 14 दिनों के भीतर.

NCLT केस की समीक्षा करता है। केस स्वीकार होते ही कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को सस्पेंड कर दिया जाता है और कंपनी को चलाने के लिए एक Interim Insolvency Professional (IRP) नियुक्त किया जाता है।

कर्जदाताओं की समिति (CoC) का गठन: क्रेडिटर्स का नियंत्रण.

IRP उन सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को मिलाकर एक Committee of Creditors (CoC) बनाता है जिन्होंने कंपनी को लोन दिया है। कंपनी के भविष्य का फैसला अब यही कमेटी करती है (वोटिंग के आधार पर)।

समाधान योजना (Resolution Plan) की तलाश: समय सीमा: 180 से 330 दिन.

मार्केट से दूसरी कंपनियों या निवेशकों को आमंत्रित किया जाता है कि वे आएं और इस डूबती कंपनी को खरीदने या दोबारा शुरू करने के लिए अपना ‘बिजनेस प्लान’ (Resolution Plan) दें।

अंतिम फैसला: पुनरुद्धार या परिसमापन: Final Output.

अगर CoC को कोई प्लान पसंद आता है (66% वोटिंग से), तो कंपनी नए मालिक को सौंप दी जाती है। अगर कोई खरीदार नहीं मिलता या प्लान फेल हो जाता है, तो NCLT कंपनी को Liquidation (परिसमापन) यानी बंद करने का आदेश देता है, जिसके बाद संपत्ति बेचकर कर्ज चुकाया जाता है।

जब कोई कंपनी डिफॉल्ट करती है, तो प्रक्रिया कुछ इस तरह चलती है।

वॉटरफॉल मैकेनिज्म (Waterfall Mechanism) – पैसा किसे पहले मिलेगा?
अगर कंपनी को बंद (Liquidation) करना पड़े, तो संपत्ति बेचकर मिलने वाले पैसे को एक तय प्राथमिकता के आधार पर बांटा जाता है, जिसे Waterfall Mechanism (धारा 53) कहते हैं:

नंबर 1: इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया का खर्च (IP की फीस और अदालती खर्च)।

नंबर 2: सुरक्षित कर्जदाता (Secured Creditors – जिनके पास कोई संपत्ति गिरवी थी) और पिछले 24 महीनों का मजदूरों का बकाया वेतन।

नंबर 3: कर्मचारियों का बकाया (पिछले 12 महीनों का)।

नंबर 4: असुरक्षित कर्जदाता (Unsecured Creditors – जैसे बिना गारंटी वाले लोन)।

नंबर 5: सरकार का टैक्स (पिछले 2 साल का) और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स (सप्लायर्स)।

नंबर 6: शेयरहोल्डर्स (सबसे आखिरी में इक्विटी शेयरधारकों को पैसा मिलता है, यदि कुछ बचे तो)।

समय सीमा (Timeline) और इसके लाभ

कड़ा नियम: IBC के तहत पूरी समाधान प्रक्रिया 180 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए। विशेष परिस्थितियों में इसे एक बार के लिए बढ़ाया जा सकता है, लेकिन कानूनी मुकदमों को मिलाकर भी अधिकतम सीमा 330 दिन तय की गई है।

IBC के फायदे

प्रमोटर्स के मनमाने रवैये पर रोक: पहले मालिक लोन नहीं चुकाते थे और कंपनी पर कब्जा बनाए रखते थे। अब उन्हें डर है कि डिफॉल्ट करते ही कंपनी उनके हाथ से निकल जाएगी।

रिकवरी रेट में सुधार: पुराने कानूनों की तुलना में बैंकों को अब अपना फंसा हुआ पैसा बहुत तेजी से और बेहतर अनुपात में वापस मिल रहा है। (जैसे भूषण स्टील, एस्सार स्टील जैसे बड़े मामलों का निपटारा इसी के तहत हुआ)।

संशोधन (MSME को राहत): सरकार ने छोटे उद्योगों (MSMEs) के लिए Pre-packaged Insolvency Resolution Process (PIRP) की शुरुआत की है, जिससे वे बिना अपना बिजनेस गंवाए कम खर्चे में बैंकों के साथ समझौता कर सकते हैं।

ऐतिहासिक फैसलों का हवाला

अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ही पुराने ऐतिहासिक मामलों जैसे मोबिलॉक्स इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम किरुसा सॉफ्टवेयर, कल्पराज धरमशी बनाम कोटक इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स और वी. नागराजन बनाम एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड का हवाला दिया। इन सभी मामलों में यह स्थापित किया जा चुका है कि दिवाला प्रक्रिया में समय-सीमा का कड़ाई से पालन करना रीढ़ की हड्डी के समान है ताकि संकटग्रस्त कंपनियों का जल्द से जल्द समाधान निकाला जा सके।

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