Breach of Promise: झारखंड हाईकोर्ट ने महिलाओं के कानूनी संरक्षण और ‘शादी के झूठे वादे’ को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
विधवा महिला से शादी का झूठा वादा कर यौन शोषण करने का मामला
हाईकोर्ट के जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने रमेश साहु बनाम झारखंड राज्य मामले में गुमला की निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को बरकरार रखते हुए सख्त टिप्पणी की। कहा, यदि कोई पुरुष अपनी पहली शादी की बात छिपाकर किसी विधवा महिला से शादी का झूठा वादा करता है और उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी करता है, तो ऐसी स्थिति में महिला की सहमति ‘तथ्य की भूल’ (Misconception of Fact) के तहत अमान्य हो जाती है। यह कृत्य कानूनन दुष्कर्म (Rape) की श्रेणी में आता है।
मामला क्या है?: 25 साल पुराना कानूनी विवाद और धोखे की दास्तान
यह मामला एक पीड़ित विधवा महिला के साथ हुए लंबे विधिक और मानसिक शोषण से जुड़ा है।
उत्पीड़न की शुरुआत: अभियोजन पक्ष के अनुसार, शादी के महज दो साल बाद पति की टीबी (Tuberculosis) से मृत्यु होने के कारण महिला विधवा हो गई थी और मायके में रह रही थी। आरोप है कि दिसंबर 1999 में आरोपी रमेश साहु ने उसे जान से मारने की धमकी देकर पहली बार दुष्कर्म किया।
शादी का झूठा झांसा: इसके बाद, आरोपी ने महिला और उसके माता-पिता को विश्वास दिलाया कि वह उससे शादी करेगा, उसका पूरा खर्च उठाएगा और उसे अपनी पत्नी बनाकर रखेगा। इस वादे के भरोसे महिला उसके साथ कई वर्षों तक ‘लिव-इन’ (सह-जीवन) में रही।
गर्भावस्था और एफआईआर: इस दौरान महिला दो बार गर्भवती हुई, लेकिन आरोपी ने जबरन उसका गर्भपात (Miscarriage) करा दिया। जब आरोपी लगातार शादी टालता रहा और अंततः साफ मना कर दिया, तब जनवरी 2004 में पीड़ित महिला ने एफआईआर दर्ज कराई।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘वादे को न निभा पाना’ बनाम ‘शुरुआत से ही नियत में खोट’
बचाव पक्ष (आरोपी) ने हाई कोर्ट में तर्क दिया था कि यह रिश्ता आपसी सहमति (Consensual) से था और यह केवल ‘शादी का वादा न निभा पाने’ (Breach of Promise) का मामला है, न कि शुरू से ही झूठा वादा करने का।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए इस दलील को खारिज कर दिया और निम्नलिखित कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किए।
शुरुआत से ही धोखाधड़ी की मंशा: कोर्ट ने पाया कि आरोपी की शादी साल 1997 में ही किसी अन्य महिला से हो चुकी थी। इस सच को पूरी तरह छिपाकर उसने 1999 में पीड़िता को शादी का झांसा दिया। यह साफ दर्शाता है कि उसका इरादा कभी शादी करने का था ही नहीं, बल्कि वह केवल अपनी शारीरिक वासना शांत करने के लिए महिला को धोखा दे रहा था।
सहमति का विधिक रूप से शून्य होना: अदालत ने कहा कि चूंकि पुरुष पहले से शादीशुदा था (जिसके कारण वह कानूनी रूप से दूसरी शादी नहीं कर सकता था), इसलिए उसके द्वारा दिया गया शादी का आश्वासन शुरुआत से ही एक ‘झूठा वादा’ था। ऐसी भ्रामक स्थिति में महिला द्वारा दी गई सहमति को कानूनन ‘स्वैच्छिक सहमति’ नहीं माना जा सकता।
देरी से एफआईआर दर्ज होने का औचित्य: अदालत ने 4 साल की देरी से केस दर्ज होने पर आरोपी की आपत्ति को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक परिस्थितियों और शादी के लगातार मिलते रहे आश्वासनों के कारण यह देरी पूरी तरह तार्किक और स्वाभाविक थी।
अदालत का आंशिक फैसला और सजा
अदालत ने मामले के सभी पहलुओं की गहन समीक्षा करने के बाद आदेश पारित किया।
दुष्कर्म की सजा बरकरार: कोर्ट ने आरोपी रमेश साहु को बलात्कार का दोषी मानते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई 7 साल की जेल की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा।
एक धारा से बरी (साक्ष्यों का अभाव): हालांकि, बिना सहमति के गर्भपात कराने के आरोप (तत्कालीन आईपीसी की धारा 313) के मामले में कोई पुख्ता मेडिकल दस्तावेज या डॉक्टर की गवाही सामने नहीं आई। इसलिए कोर्ट ने उसे इस विशिष्ट धारा से बरी कर दिया।
आत्मसमर्पण का निर्देश: हाई कोर्ट ने दोषी को आदेश दिया है कि वह शेष बची सजा काटने के लिए दो महीने के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट (गुमला) के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करे।
केस मैट्रिक्स: झारखंड हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | झारखंड उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति (2026) |
| संबंधित अदालत | झारखंड उच्च न्यायालय, राँची |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव |
| केस संदर्भ | रमेश साहु बनाम झारखंड राज्य (Ramesh Sahu v. State of Jharkhand) |
| कानूनी मुद्दा | पहली शादी छिपाकर, शादी के वादे पर संबंध बनाना। |
| प्रासंगिक विधिक सिद्धांत | तथ्य की भूल (Misconception of Fact) के तहत सहमति का अमान्य होना। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | अपील आंशिक रूप से स्वीकार; रेप के लिए 7 साल की सजा बरकरार। दोषी को 2 महीने में सरेंडर करने का आदेश। |

