BSF Forgery Case: कलकत्ता हाई कोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक पूर्व कांस्टेबल की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट के जस्टिस अमृता सिन्हा ने संतोष सरदार नाम के एक पूर्व कांस्टेबल की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जालसाजी के जरिए हासिल की गई नौकरी में कोई भी राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जिस व्यक्ति की नौकरी की नींव ही ‘धोखाधड़ी’ पर टिकी हो, वह अपनी कमाई का कानूनी रूप से हकदार नहीं है।
मामला क्या था? (32 Years of Fraud)
- नियुक्ति: संतोष सरदार 28 फरवरी, 1989 को BSF में कांस्टेबल (जनरल ड्यूटी) के रूप में भर्ती हुए थे।
- फर्जीवाड़ा: उन्होंने माध्यमिक (10वीं) पास होने का फर्जी मार्कशीट और सर्टिफिकेट जमा किया था, जबकि हकीकत में वे परीक्षा में फेल हो गए थे।
- बर्खास्तगी: 2021 में ‘पेटी सिक्योरिटी फोर्स कोर्ट’ (PFSC) ने उन्हें दोषी पाते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया और 15 महीने के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सजा कम ही मिली है
- जस्टिस सिन्हा ने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता पर की गई कार्रवाई ‘नरम’ कही जा सकती है।
- सैलरी रिकवरी: कोर्ट ने कहा, “अधिकारी और भी सख्त रुख अपना सकते थे और सेवा के दौरान भुगतान किए गए पूरे वेतन की वसूली का निर्णय ले सकते थे, जिसके वे हकदार नहीं थे।”
- शून्य अधिकार: चूंकि धोखाधड़ी आवेदन के क्षण से ही शुरू हो गई थी, इसलिए वह नौकरी के लिए कभी पात्र ही नहीं थे।
देरी का तर्क खारिज
- याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि यदि वेरिफिकेशन समय पर हो जाता, तो वे कोई और काम ढूंढ लेते।
- जांच की प्रक्रिया: कोर्ट ने कहा: वेरिफिकेशन 1992 में शुरू हुआ था, लेकिन कानूनी अड़चनों और अदालती मुकदमों के कारण इसमें देरी हुई।
- स्वयं की जानकारी: याचिकाकर्ता को शुरू से पता था कि उन्होंने धोखाधड़ी की है, इसलिए देरी का लाभ उन्हें नहीं मिल सकता।
Timeline of the Forgery Case
| घटना | वर्ष | स्थिति |
|---|---|---|
| BSF में भर्ती | 1989 | फर्जी मार्कशीट के आधार पर नियुक्ति। |
| सत्यापन शुरू | 1992 | बोर्ड सर्टिफिकेट पर संदेह पैदा हुआ। |
| आपराधिक मामला | 2002 | IPC 420 के तहत गिरफ्तारी और जमानत। |
| अंतिम बर्खास्तगी | 2021 | कोर्ट मार्शल के बाद नौकरी से निकाला गया। |
न्यायिक समीक्षा की सीमा
- अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) की शक्ति का उपयोग हमेशा गलत कर्मचारी के प्रति सहानुभूति दिखाने के लिए नहीं किया जा सकता:
- अनुशासन: यदि कोर्ट ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करता है, तो नियोक्ता (BSF) का मनोबल गिरेगा और कार्यस्थल पर ईमानदारी बनाए रखना मुश्किल होगा।
- स्वीकारोक्ति: याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया था कि वह परीक्षा में फेल हो गया था, और कानून के अनुसार ‘स्वीकार किए गए तथ्यों’ को साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।
निष्कर्ष: सुरक्षा बलों में शुचिता जरूरी
कलकत्ता हाई कोर्ट का यह फैसला संदेश देता है कि देश की सुरक्षा से जुड़े संगठनों में प्रवेश के लिए ‘ईमानदारी’ पहली शर्त है। 32 साल की सेवा भी उस अपराध को नहीं धो सकती जो नौकरी पाने के लिए ‘फर्जी दस्तावेजों’ के रूप में किया गया था।

