Friday, May 22, 2026
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Case Load: जज भी इंसान हैं, भूखे-प्यासे रात तक काम नहीं कर सकते…केस को फास्ट-ट्रैक करने के रूटीन आदेश पर यह गंभीर टिप्पणी

Case Load: हाई कोर्ट के जजों पर काम के बढ़ते बोझ और उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक मामले को जल्द निपटाने की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने साफ कर दिया है कि सुप्रीम कोर्ट अब जमीनी हकीकत और जजों के केसलोड (Caseload) को देखे बिना, हाई कोर्ट्स को किसी मामले की जल्द सुनवाई करने (Fast-track) की रूटीन समय-सीमा (Timelines) तय नहीं करेगा।

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इलाहाबाद HC के जज का दर्द: भूखा हूं, थक गया हूं, अब फैसला नहीं लिखवा सकता

  • इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी के एक हालिया न्यायिक आदेश (Judicial Order) का विशेष रूप से जिक्र किया, जो पूरे सिस्टम के लिए आंखें खोलने वाला है।
  • शाम 7:10 बजे तक सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक केस को जल्द तय करने की समय-सीमा दी गई थी। उसे पूरा करने के लिए जस्टिस सुभाष विद्यार्थी नियमित मुकदमों को निपटाने के बाद भी शाम 7 बजकर 10 मिनट तक कोर्ट रूम में बैठे रहे।
  • न्यायिक आदेश में लिखा दर्द: आखिरकार जज साहब को आदेश सुरक्षित रखना पड़ा और उन्होंने बाकायदा अपनी फाइल पर दर्ज किया कि “वे दोपहर का लंच भी नहीं कर पाए हैं, पूरी तरह से थक चुके हैं और शारीरिक रूप से इस स्थिति में नहीं हैं कि आगे फैसला डिक्टेट (लिखवा) करा सकें।”
  • CJI की आत्मशंषा (Introspection): इस घटना को याद करते हुए सीजेआई सूर्य कांत ने भावुक होकर कहा, “एक जज ने जो लिखा, वह शायद बिल्कुल सही था… उनके सामने उस दिन 200 से ज्यादा नए मामले (Fresh Matters) लिस्टेड थे। यहां दिल्ली में बैठकर हमारे द्वारा सिर्फ एक ‘अनुरोध’ (Request) शब्द लिख देना भी वहां के जजों के लिए काम करना बेहद मुश्किल बना देता है। यह स्थिति हमारे लिए भी आत्ममंथन (Introspection) की मांग करती है।”

गरीब वादियों (Poor Litigants) के साथ अन्याय की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने ‘फास्ट-ट्रैक’ निर्देशों के एक और बड़े व्यावहारिक और सामाजिक पहलू को सामने रखा। कहा, अगर हम यहां बैठकर किसी नए केस (जैसे साल 2021 के मामले) को जल्द निपटाने का आदेश देते हैं, तो वह किसी बेहद पुराने केस की कीमत पर होता है। कोई गरीब वादी जिसके पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट आकर ‘फास्ट-ट्रैक’ का आदेश ले सके, वह इस व्यवस्था का शिकार (Victim) बन जाता है क्योंकि उसका पुराना केस और पीछे छूट जाता है। सीजेआई ने कहा कि हर दिन सुप्रीम कोर्ट में 4-5 ऐसी याचिकाएं आती हैं जिनमें से 3 अकेले इलाहाबाद हाई कोर्ट की होती हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट हर केस में समय-सीमा तय करने लगा, तो यह एक गलत परंपरा होगी और यह ‘डी फैक्टो’ (Virtually) हाई कोर्ट के रोस्टर को अपने नियंत्रण में लेने जैसा हो जाएगा।

दोनों पक्षों की दलीलें और कोर्ट का अंतिम फैसला

  • याचिकाकर्ता के वकील का पक्ष: वकील ने दलील दी कि उनका मामला साल 2021 से लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट को इसे जल्दी तय करने का निर्देश दिया जाए। जब सीजेआई ने उनसे पूछा कि क्या वे जानते हैं कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में सबसे पुराना लंबित मामला किस साल का है? तो वकील के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: बेंच ने याचिका को आगे सुनने से साफ इनकार (Dismiss) कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता (Liberty) दी कि वे सीधे इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष ही जाएं और यदि कोई बहुत असाधारण परिस्थिति हो, तो वहां ‘आउट-ऑफ-टर्न’ (बारी से पहले) सुनवाई की गुहार लगाएं।

फैसले का मुख्य सारांश (Key Takeaways at a Glance)

मुख्य बिंदुसुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का रुख
मूल समस्यासुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई कोर्ट्स को बिना सोचे-समझे ‘जल्दी फैसला करने’ की डेडलाइन देना।
जमीनी हकीकतजजों के सामने रोजाना 200+ केस लिस्ट होते हैं; समय-सीमा के दबाव में जजों को भूखे-प्यासे देर रात तक बैठना पड़ता है।
सिस्टम पर असररसूखदार लोगों के नए केस फास्ट-ट्रैक होने से, अदालतों के चक्कर काट रहे गरीब वादियों के पुराने केस और पिछड़ जाते हैं।
भविष्य की नीतिसुप्रीम कोर्ट अब हाई कोर्ट के जजों पर रूटीन तरीके से समय-सीमा का बोझ नहीं डालेगा।

निष्कर्ष (Analysis Summary)

यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के मानवीय चेहरे को दर्शाता है। अक्सर जजों को एक ‘मशीन’ की तरह देखा जाता है, लेकिन सीजेआई ने यह याद दिलाकर कि जज भी इंसान हैं, न्यायिक गरिमा और स्वास्थ्य दोनों को प्राथमिकता दी है। इसके साथ ही, यह आदेश उन रसूखदार मुवक्किलों पर भी एक लगाम है जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धौंस दिखाकर हाई कोर्ट में अपने नए मुकदमों को पहले सुनवाना चाहते हैं, जिससे अदालतों का पूरा रोस्टर बिगड़ जाता है।

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