TextBook Row: सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 वीं की सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े एक विवादित अध्याय को लेकर तीन प्रमुख शिक्षाविदों और विशेषज्ञों को बड़ी राहत दी है।
शीर्ष कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने मामले की स्वतः संज्ञान (Suo-Motu) लेते हुए सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया। शीर्ष अदालत ने 22 मई 2026 को अपने पिछले (11 मार्च 2026 के कड़े आदेश में महत्वपूर्ण संशोधन (Modify) किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या बदलाव किए?
- सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को दिए अपने उस आदेश को वापस ले लिया और उसमें दो बड़े संशोधन किए हैं।
- संस्थानों को स्वतंत्र निर्णय की छूट: पहले कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को इन तीनों शिक्षाविदों से हर तरह के संबंध तोड़ने (Disassociate) का सीधा निर्देश दिया था। अब कोर्ट ने कहा है कि केंद्र, राज्य, केंद्र शासित प्रदेश, पब्लिक यूनिवर्सिटी और सरकारी फंड पाने वाले संस्थान इस मामले पर स्वतंत्र रूप से फैसला (Independent Decision) लेने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट की पिछली टिप्पणियों से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है।
- जानबूझकर बदनाम करने की टिप्पणी वापस ली: 11 मार्च के आदेश में कोर्ट ने रिकॉर्ड किया था कि इन तीनों शिक्षाविदों ने कक्षा 8 के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश करने के लिए “जानबूझकर और सोची-समझी रणनीति के तहत तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया” था। कोर्ट ने अब इस सख्त टिप्पणी को भी वापस (Recall) ले लिया है।
किन तीन शिक्षाविदों को मिली राहत?
- इस विवाद में शामिल तीन विशेषज्ञों के खिलाफ कोर्ट ने पहले सख्त रुख अपनाया था।
- प्रोफेसर मिशेल डैनिनो (Professor Michel Danino): वे इस पाठ्यपुस्तक विकास टीम (Textbook Development Team) के अध्यक्ष थे।
- सुपर्णा दिवाकर (Suparna Diwakar): टीम की सदस्य।
- आलोक प्रसन्ना कुमार (Alok Prasanna Kumar): टीम के सदस्य और कानूनी विशेषज्ञ।
शिक्षाविदों का पक्ष और कोर्ट का बदला रुख
तीनों शिक्षाविदों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अपना पक्ष साफ किया था। उन्होंने अदालत को बताया कि किसी भी पाठ्यपुस्तक या अध्याय के निर्माण में किसी एक व्यक्ति की मर्जी नहीं चलती। यह पूरी तरह से एक सामूहिक प्रक्रिया (Collective Process) थी, जिसमें कई स्तरों पर विचार-विमर्श के बाद सामग्री को अंतिम रूप दिया गया था। शिक्षाविदों की दलील सुनने के बाद, बेंच ने स्पष्ट किया कि कोर्ट द्वारा पहले की गई टिप्पणियां केवल अध्याय की सामग्री (Content) के संदर्भ में थीं, न कि उन व्यक्तियों (Individuals) की योग्यता या नीयत पर।
क्या था पूरा विवाद? (The NCERT Textbook Row)
- यह मामला “In Re: Social Science textbook for Grade-8 (part-2) published by NCERT and ancillary issues” शीर्षक के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुद शुरू किया गया था।
- विवादित सामग्री: कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब के एक अध्याय में न्यायपालिका के भीतर कथित भ्रष्टाचार (Corruption in Judiciary) को लेकर कुछ बातें लिखी गई थीं, जिस पर अदालत ने गंभीर आपत्ति जताई थी।
- फरवरी 2026 में पूर्ण प्रतिबंध: इससे पहले 26 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस किताब के आगे प्रकाशन, पुनर्मुद्रण (Reprinting) या डिजिटल प्रसार पर “पूर्ण प्रतिबंध” (Blanket Ban) लगा दिया था। तब कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि “इन्होंने (लेखकों ने) एक गोली चलाई है और न्यायपालिका लहुलुहान (Bleeding) हो रही है।”
- नई समिति का गठन: मार्च में कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक सप्ताह के भीतर विशेषज्ञों की एक समिति बनाने का निर्देश दिया था, जो न केवल कक्षा 8 बल्कि उच्च कक्षाओं के लिए भी एनसीईआरटी के ‘लीगल स्टडीज’ (Legal Studies) के पाठ्यक्रम को नए सिरे से तय कर सके।
मामले का संक्षिप्त विवरण (Case Summary at a Glance)
| मुख्य कानूनी बिंदु | वर्तमान स्थिति और विवरण |
| मामला | एनसीईआरटी कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका पर टिप्पणी को लेकर विवाद। |
| राहत पाने वाले विशेषज्ञ | प्रो. मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार। |
| नया अदालती रुख | पुरानी नकारात्मक टिप्पणियां वापस लीं; संस्थान अब इनके साथ काम करने का फैसला खुद ले सकते हैं। |
| किताब की स्थिति | विवादित अध्याय वाली किताब के डिजिटल और फिजिकल प्रकाशन पर प्रतिबंध जारी रहेगा। |
निष्कर्ष (Analysis Summary)
सुप्रीम कोर्ट का यह संसोधित आदेश अकादमिक स्वतंत्रता (Academic Freedom) और प्रशासनिक संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। शुरुआत में कोर्ट ने न्यायपालिका की छवि को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया था, जिससे इन जाने-माने शिक्षाविदों के करियर और साख पर संकट खड़ा हो गया था। हालांकि, जब कोर्ट को यह समझाया गया कि पाठ्यक्रम का निर्माण एक बहु-स्तरीय और सामूहिक सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा होता है, तो कोर्ट ने बड़प्पन दिखाते हुए अपनी व्यक्तिगत टिप्पणियों को वापस ले लिया और संस्थानों को इस विवाद से अलग हटकर फैसला लेने की आजादी दे दी।

