Tuesday, August 25, 2026
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Child Custody: तलाक के केस में पति-पत्नी के बीच कैसे फंसता है बच्चे का मामला…कस्टडी विवाद के इस केस को जानिए

Child Custody: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक संवेदनशील बाल कस्टडी (Child Custody) विवाद की सुनवाई की।

हाईकोर्ट के जस्टिस अमित शर्मा की बेंच ने एक पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। पिता ने साकेत फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अपनी बेटी से मिलने के केवल “सीमित और निगरानी वाले” (Supervised Visitation) अधिकार दिए गए थे। कहा है कि एक बच्चे के समग्र व्यक्तित्व विकास के लिए उसे माता और पिता, दोनों का भरपूर प्यार और साथ मिलना अनिवार्य है। कोर्ट ने अलग हो चुके माता-पिता को ‘काउंसलिंग’ (Counselling) कराने का निर्देश दिया ताकि पांच वर्षीय बच्ची को उसके पिता के साथ “बिना निगरानी” (Unsupervised) समय बिताने के लिए तैयार किया जा सके।

कोर्ट की चिंता: “बच्चा मां की नजरों से दूर क्यों नहीं होना चाहता?”

  • अच्छा तालमेल: बच्ची का अपने पिता के साथ अच्छा रिश्ता है और वह उनके साथ समय बिताना पसंद करती है।
  • अजीब व्यवहार: बावजूद इसके, बच्ची अपनी मां की मौजूदगी के बिना पिता के साथ अकेले जाने में कतराती है।
  • अदालत का सवाल: कोर्ट ने यह समझने की कोशिश की कि अगर बच्चा पिता से प्यार करता है, तो वह मां की नजरों से ओझल होने पर असुरक्षित क्यों महसूस करता है? हालांकि इसका सीधा जवाब नहीं मिला, लेकिन कोर्ट ने माना कि माता-पिता को मिलकर बच्चे को सहज बनाना होगा।

‘ट्यूटरिंग’ और ‘एलियनेशन’ का आरोप

  • पक्षपात नहीं: कोर्ट ने पाया कि अगर मां बच्चे को पिता के खिलाफ “पढ़ा” (Tutoring) रही होती, तो बच्चा सामान्य मुलाकातों में भी पिता से नफरत करता, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है।
  • पिता के अधिकार: कोर्ट ने माना कि पिता होने के नाते याचिकाकर्ता को अपनी बेटी की शिक्षा और सामाजिक प्रगति में भाग लेने का पूरा अधिकार है। उसे स्कूल के ई-पोर्टल और PTA मीटिंग्स का एक्सेस पहले ही दिया जा चुका है।

माता-पिता के अपने-अपने तर्क

  • पिता का पक्ष: वकील अरुणाव पटनायक ने दलील दी कि पिता और बेटी के बीच गहरा प्रेम है (पुराने फोटो और संदेशों का हवाला देते हुए)। उन्होंने आरोप लगाया कि “सीमित एक्सेस” के कारण बच्चे को पिता से दूर (Alienation) किया जा रहा है।
  • मां का पक्ष: वकील मालविका राजकोटिया ने दलील दी कि पिता को “गुस्से की समस्या” (Anger Issues) है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिता अक्सर बच्चे की मौजूदगी में मां के प्रति आक्रामक व्यवहार करते हैं और बच्चे से मां की निजी जानकारी निकलवाने की कोशिश करते हैं।

केस की पृष्ठभूमि और कोर्ट का समाधान

घटनाविवरण
अलगावकपल 2023 की शुरुआत से अलग रह रहा है।
फैमिली कोर्ट का आदेशपिता को महीने में केवल दो बार साकेत कोर्ट के ‘चिल्ड्रन रूम’ में मिलने की अनुमति थी।
हाई कोर्ट का निर्देशमाता-पिता को विशेषज्ञ से काउंसलिंग करानी होगी ताकि वे ‘को-पेरेंटिंग’ (Co-parenting) सीख सकें।
उद्देश्यमुलाकातों को ‘निगरानी’ (Supervision) से मुक्त कर ‘स्वतंत्र’ (Unsupervised) बनाना।

बच्चे का हित सर्वोपरि

दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश “बच्चे के सर्वोत्तम हित” (Best Interest of the Child) के सिद्धांत पर आधारित है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कानूनी लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन एक 5 साल की बच्ची को अपने पिता का स्वाभाविक सानिध्य मिलना चाहिए। काउंसलिंग का मकसद माता-पिता के बीच के कड़वाहट को कम करना है ताकि उसका बुरा असर बच्चे के भविष्य पर न पड़े।

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