Child Marriage: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बाल विवाह के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे देश से पूरी तरह खत्म करने का आह्वान किया है।
बाल विवाह उन्मूलन पर सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-द्वितीय की पीठ ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि वे बाल विवाह आयोजित कराने वाले सभी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई और अभियोजन (Strict Prosecution) सुनिश्चित करें। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि “बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है जिसे इस देश से जड़ से उखाड़ फेंका जाना चाहिए (Must be eradicated)। बाल विवाह का उन्मूलन केवल एक वैधानिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक संवैधानिक आवश्यकता है।”
मामला क्या था? (Factual Background)
- हाई कोर्ट एक 14 वर्षीय नाबालिग लड़की के कथित अपहरण और बाल विवाह के मामले में दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
- आरोप: एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि एक व्यक्ति उसकी 15 वर्षीय बेटी (जो नौवीं कक्षा की छात्रा थी) को बहला-फुसलाकर शादी के इरादे से भगा ले गया। आरोपी और उसके परिवार ने लड़की को छिपाकर रखा था, और लड़की घर से गहने व नकदी भी साथ ले गई थी।
- बचाव पक्ष का तर्क: याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि लड़की ने अपनी मर्जी से शादी की है और वह आरोपी के साथ रह रही है। माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शादी होने के कारण यह झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई है।
- राज्य सरकार का पक्ष: सरकारी वकील ने स्कूल के रिकॉर्ड पेश करते हुए साबित किया कि एफआईआर दर्ज होने के समय लड़की की उम्र केवल 14 वर्ष और 7 महीने थी। आरोपी ने नाबालिग को उसके माता-पिता की वैध संरक्षकता (Lawful Guardianship) से बहला-फुसलाकर दूर किया था।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और चिंताएं
टिप्पणी: अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी अक्सर मुख्य आरोपियों पर तो कार्रवाई करते हैं, लेकिन बाल विवाह को बढ़ावा देने वाले अन्य लोगों को छोड़ देते हैं।
कानून के कड़े क्रियान्वयन की कमी: “चूंकि ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम’ (Prohibition of Child Marriage Act) के प्रावधानों के तहत ऐसे अवैध विवाहों को संपन्न कराने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश में बाल विवाह के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं।”
संवैधानिक दायित्व: कोर्ट ने कहा कि कानून बचपन की रक्षा करता है ताकि वह एक जागरूक वयस्कता में विकसित हो सके। अदालत इस सुरक्षा को किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देगी।
‘चुप रहने’ की संस्कृति पर प्रहार: अदालत ने टिप्पणी की कि यह सामाजिक बुराई तभी खत्म हो सकती है जब न केवल मुख्य आरोपी, बल्कि विवाह को संपन्न कराने, उसका निर्देशन करने या उसमें सहायता करने वाले सभी लोगों के खिलाफ पूरी ताकत से त्वरित और सख्त कार्रवाई की जाए।
धार्मिक और सामाजिक संगठनों को कड़ी चेतावनी
भूमिका: हाई कोर्ट ने बाल विवाह कराने वाली धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका पर भी गंभीर चिंता जताई।
पहचान पत्रों का दुरुपयोग: अदालत ने नोट किया कि बाल विवाह संपन्न कराने वाले सामाजिक और धार्मिक संगठन आम तौर पर कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए लड़की के पहचान पत्र (जैसे Aadhaar Redacted) या उसके द्वारा दिए गए हलफनामे (Affidavit) की आड़ लेते हैं।
अदालत का फैसला: हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि उम्र के पुख्ता और स्पष्ट प्रमाण के बिना कोई भी धार्मिक या सामाजिक संगठन किसी नाबालिग लड़की का विवाह संपन्न नहीं करा सकता।
नाबालिग के हलफनामे की कोई कानूनी वैधता नहीं: कोर्ट ने साफ कहा कि किसी नाबालिग लड़की द्वारा खुद को ‘वयस्क’ (Major) बताने वाला हलफनामा कानूनी रूप से उसे वयस्क नहीं बना देता।
डीजीपी और पुलिस प्रशासन को निर्देश
दिशा-निर्देश जारी करना: यूपी के डीजीपी सभी पुलिस कमिश्नरों और जिला पुलिस कप्तानों (SP/SSP) को निर्देश जारी करें कि जैसे ही जांच के दौरान या किसी अन्य माध्यम से बाल विवाह का मामला सामने आए, तुरंत बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम की धारा 10 और 11 के तहत कार्यवाही शुरू की जाए।
सभी सहयोगियों पर कार्रवाई: वर्तमान मामले में भी, कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) को निर्देश दिया कि वे उन सभी लोगों की भूमिका की जांच करें जिन्होंने विवाह समारोह आयोजित किया, उसका संचालन किया या उसे बढ़ावा दिया, और उन सभी के खिलाफ कानून के अनुसार मामला दर्ज करें।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| हाई कोर्ट बेंच | जस्टिस राजीव गुप्ता और जस्टिस डॉ. अजय कुमार-द्वितीय |
| केंद्रीय अधिनियम | बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (Prohibition of Child Marriage Act) |
| मुख्य धाराएं | धारा 10 (बाल विवाह कराने के लिए दंड) और धारा 11 (बाल विवाह को बढ़ावा देने/अनुमति देने के लिए दंड) |
| अदालत का दृष्टिकोण | उम्र के पुख्ता सबूत के बिना हलफनामे या आईडी कार्ड के आधार पर शादी कराने वाली संस्थाएं भी अपराधी हैं। |
निष्कर्ष (Takeaway)
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला बाल विवाह के खिलाफ कानूनी लड़ाई में एक बड़ा मील का पत्थर है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल शादी करने वाले लड़के पर कार्रवाई काफी नहीं है; जब तक शादी कराने वाले पंडित, मौलवी, मैरिज हॉल के मालिक, गवाह और माता-पिता (जो धारा 10 और 11 के दायरे में आते हैं) जेल नहीं जाएंगे, तब तक इस सामाजिक कुप्रथा पर पूरी तरह लगाम नहीं कसी जा सकती।

