Women Alive: पटना हाई कोर्ट में एक बेहद अजीबोगरीब मामला सामने आया है, जहां पुलिस ने एक 62 वर्षीय जीवित महिला को कागजों पर ‘मृत’ घोषित कर दिया था।
बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर थाने का मामला
यह मामला बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर थाने में साल 2011 में दर्ज एक एफआईआर और उसके बाद 2015 में दायर की गई एक आपराधिक अपील से जुड़ा है। हालांकि, महिला के खुद अदालत के सामने पेश होने और पुलिस द्वारा बिना शर्त माफी मांगे जाने के बाद, हाई कोर्ट ने इसे एक “मानवीय भूल” माना और संबंधित थाना प्रभारी (SHO) का निलंबन (Suspension) रद्द कर दिया।
यह था पूरा मामला? (How a Living Woman Died on Paper)
हाई कोर्ट का आदेश: पटना हाई कोर्ट ने समस्तीपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को निर्देश दिया था कि वे लंबित मामलों के याचिकाकर्ताओं की स्थिति और कुशलता (Well-being Inquiry) की जांच कर रिपोर्ट सौंपें।
पुलिस की लापरवाही: इस आदेश के अनुपालन में ताजपुर थाने के तत्कालीन एसएचओ (SHO) और समस्तीपुर एसपी ने 11 फरवरी 2026 को अदालत को एक आधिकारिक पत्र भेजा। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि मामले की एकमात्र मुख्य याचिकाकर्ता सकली देवी (Sakali Devi) की मृत्यु हो चुकी है।
केस बंद (Abated): पुलिस की इस रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए 8 मई 2026 को चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की पीठ ने आदेश दर्ज किया कि चूंकि याचिकाकर्ता की मौत हो चुकी है और किसी रिश्तेदार ने केस जारी रखने की अनुमति नहीं मांगी है, इसलिए यह कानूनी अपील स्वतः समाप्त (Abated) मानी जाती है।
महिला ने कहा: ‘मैं जिंदा हूं और पूरी तरह स्वस्थ हूं’
बहाली की याचिका दायर: जब सकली देवी को पता चला कि अदालत ने उन्हें मृत मानकर उनका केस बंद कर दिया है, तो वे तुरंत हाई कोर्ट पहुंचीं। उन्होंने अदालत में बहाली (Restoration) याचिका दायर की, जिसमें कहा गया।
कागजी गड़बड़ी: सकली देवी एक अनपढ़ और निर्दोष महिला हैं। अनजाने में उनके [Aadhaar Redacted] कार्ड और पैन कार्ड में उनकी जन्मतिथि 01.01.1935 दर्ज हो गई थी (जिससे कागजों पर उनकी उम्र 90 साल से अधिक दिख रही थी)। जबकि 2018 में जारी उनके राशन कार्ड के अनुसार उनकी वास्तविक उम्र करीब 62 वर्ष थी।
चेंबर में बैठकर बनाई रिपोर्ट: याचिका में आरोप लगाया गया कि ताजपुर थाने के एसएचओ ने जमीन पर जाकर (Spot Verification) कोई वास्तविक जांच नहीं की, बल्कि अपने चेंबर में बैठकर ही लापरवाही से यह रिपोर्ट तैयार कर दी कि महिला की मौत हो चुकी है।
अपूरणीय क्षति: महिला ने दलील दी कि यदि उनकी अपील को बहाल नहीं किया गया, तो उन्हें भारी कानूनी और व्यक्तिगत नुकसान (Irreparable Loss) झेलना पड़ेगा।
एसपी की माफी और हाई कोर्ट का नरम रुख
हलफनामा दायर: महिला के जीवित सामने आने के बाद समस्तीपुर पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए समस्तीपुर के एसपी ने तुरंत अदालत में एक कारण बताओ हलफनामा (Show-cause affidavit) दायर किया।
एसएचओ का निलंबन: एसपी ने कोर्ट को बताया कि लापरवाही बरतने वाले ताजपुर के एसएचओ ‘राकेश कुमार शर्मा’ को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है और उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई है।
बिना शर्त माफी: एसपी ने इस बड़ी चूक के लिए अदालत से “बिना शर्त और बिना योग्यता के” (Unconditional and Unqualified) माफी मांगी।
कोर्ट का फैसला: हाई कोर्ट ने एसपी की माफी को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने माना कि यह गलती जानबूझकर नहीं की गई थी, बल्कि पहचान के भ्रम के कारण हुई एक ‘Genuine Mistake’ थी। अदालत ने एसएचओ का निलंबन रद्द करने का आदेश देते हुए कहा, चूंकि यह गलती एक वास्तविक मानवीय भूल प्रतीत होती है, इसलिए हम निलंबन आदेश को रद्द करने का निर्देश देते हैं। हालांकि, यह अपेक्षा की जाती है कि ताजपुर के एसएचओ भविष्य में इस तरह की रिपोर्ट सौंपते समय पूरी सावधानी बरतेंगे।
भविष्य के लिए नई व्यवस्था: नाम और पते का भ्रम होगा दूर
व्यवहारिक समस्या: सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील (State Counsel) ने एक व्यावहारिक समस्या की ओर कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि अदालतों से जो आदेश थानों में जांच के लिए आते हैं, उनमें अक्सर याचिकाकर्ता के नाम के साथ उनके माता-पिता या पति का नाम (Parentage) दर्ज नहीं होता, केवल नाम और गांव का पता होता है। बिहार के गांवों में एक ही नाम के कई व्यक्ति एक ही मोहल्ले या गांव में रह रहे होते हैं, जिससे पुलिस के लिए सही व्यक्ति की पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है।
अदालत का सुधारात्मक कदम: इस समस्या को संज्ञान में लेते हुए हाई कोर्ट के ज्वाइंट रजिस्ट्रार (Joint Registrar) ने अदालत को आश्वस्त किया कि भविष्य में जब भी किसी आपराधिक अपील में ऐसी स्टेटस रिपोर्ट मांगी जाएगी, तो याचिका के मूल शीर्षक (Cause Title) के अनुसार याचिकाकर्ता का पूरा और स्पष्ट पता (Complete Address) व विवरण पुलिस को भेजा जाएगा ताकि ऐसा भ्रम दोबारा न हो।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी और प्रशासनिक बिंदु | विवरण |
| पटना हाई कोर्ट बेंच | चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार |
| मुख्य पक्षकार | सकली देवी (याचिकाकर्ता – उम्र 62 वर्ष) बनाम बिहार राज्य |
| विवाद का कारण | पुलिस ने जीवित महिला को मृत बताकर कोर्ट में रिपोर्ट जमा की, जिससे केस बंद हो गया था। |
| जिम्मेदार अधिकारी | राकेश कुमार शर्मा (एसएचओ, ताजपुर थाना, समस्तीपुर) |
| अंतिम निर्णय | महिला की अपील बहाल की गई; एसपी की माफी के बाद एसएचओ का निलंबन वापस लिया गया। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह मामला भारतीय प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की जमीनी कार्यप्रणाली की कमियों को उजागर करता है, जहां दस्तावेजों की जांच किए बिना या बिना मौके पर जाए गंभीर रिपोर्ट तैयार कर दी जाती हैं। हालांकि, पटना हाई कोर्ट ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाई—जहां एक तरफ एक गरीब महिला को दोबारा ‘जीवित’ मानकर उसका कानूनी हक लौटाया, वहीं पुलिस की व्यावहारिक दिक्कतों को समझते हुए अधिकारी को सुधरने का मौका भी दिया।

