Friday, October 9, 2026
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Substantive Justice: वकीलों की अधूरी तैयारी व मुव्व्किल पर अदालती जुर्माने…वकील की गलती की सजा मुवक्किल को न दें, समझें दो केस से मामला

Substantive Justice: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कानूनी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय (Substantive Justice) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

याचिकाकर्ता पर ₹10,000 का जुर्माना भी ठोका

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने एक हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वकील के तैयार न होने पर मामले की गुण-दोष (Merits) के आधार पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया गया था और याचिकाकर्ता पर ₹10,000 का जुर्माना भी ठोक दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस जुर्माने को हटाते हुए हाई कोर्ट को मामले की नए सिरे से सुनवाई करने का आदेश दिया है। अदालत ने साफ किया है कि वकीलों की आपसी तालमेल की कमी, तकनीकी चूक या तैयारी न होने के कारण किसी वादी (Litigant) के अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला? (The Dispute)

स्पेशल लीव पिटीशन: यह सिविल अपील अनिल कुमार राय नामक व्यक्ति द्वारा भारत सरकार (Union of India) व अन्य के खिलाफ दायर की गई स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) से जुड़ी थी।

हाई कोर्ट में क्या हुआ?: सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट में दो वकील पेश हुए थे। एक वकील व्यक्तिगत (भौतिक) रूप से अदालत में मौजूद थे, जबकि दूसरे वकील दिल्ली से वर्चुअल माध्यम (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) से जुड़े थे।

तालमेल की कमी: हाई कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि जो वकील कोर्ट रूम में मौजूद हैं, वे बहस के लिए तैयार नहीं हैं। वहीं, दिल्ली से वर्चुअली जुड़े वकील को कोर्ट रूम में मौजूद वकील द्वारा उचित निर्देश (Proper Instructions) नहीं दिए गए थे।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: वकीलों की इस अधूरी तैयारी से नाराज होकर हाई कोर्ट ने मामले की मेरिट पर सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता (मुवक्किल) पर ₹10,000 का हर्जाना (Costs) लगा दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: ‘न्याय के हित में’

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट के रवैये को अनुचित माना। कहा, उचित विचार-विमर्श के बाद और न्याय के हित में, हम विवादित आदेश को रद्द करते हैं और मामलों को वापस हाई कोर्ट भेजते हैं (Remit back) ताकि वह कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से इसका फैसला करे। पीठ ने स्पष्ट किया कि वे मूल विवाद के गुण-दोष में जाए बिना सिर्फ इस बात पर हस्तक्षेप कर रहे हैं कि वादी को अपनी बात रखने का उचित और पूरा अवसर (Effective Hearing) मिलना चाहिए था।

फैसले का महत्व: हाइब्रिड सुनवाई के दौर में बड़ी नजीर

नजीर: सुप्रीम कोर्ट का यह संक्षिप्त लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आदेश देश की अदालतों के लिए एक बड़ी नजीर है।

वकील की गलती की सजा मुवक्किल को नहीं: कोर्ट ने दोहराया कि वकीलों की लापरवाही या तैयारी की कमी के कारण किसी आम नागरिक के मुकदमे को बिना सुने तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

हाइब्रिड कोर्ट की चुनौतियां: आजकल अदालतों में फिजिकल और वर्चुअल (हाइब्रिड) दोनों माध्यमों से सुनवाई हो रही है। ऐसे में अलग-अलग जगहों से जुड़ रहे वकीलों के बीच कम्युनिकेशन गैप (संवादहीनता) या लॉजिस्टिक दिक्कतों को आधार बनाकर मुकदमों को बंद कर देना न्यायसंगत नहीं है। अदालतों का झुकाव हमेशा तकनीकी बारीकियों के बजाय वास्तविक न्याय (Substantive Justice) की ओर होना चाहिए।

एक अन्य मामला: ‘बेंच हंटिंग’ करने वाले वकील पर जुर्माना

कड़ा फैसला: इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) का भी एक कड़ा फैसला सामने आया है, जहां जस्टिस कृष्ण पहल ने पोक्सो (POCSO) एक्ट के एक मामले में 10 महीने के भीतर लगातार तीन जमानत याचिकाएं दाखिल करने पर एक वकील पर ₹2,000 का जुर्माना लगाया है।

फोरम शॉपिंग/बेंच हंटिंग का आरोप: कोर्ट ने नोट किया कि पहली जमानत याचिका 1 मई 2025 को और दूसरी 17 अक्टूबर 2025 को खारिज हुई थी। इसके तुरंत बाद 26 फरवरी 2026 को तीसरी याचिका लगा दी गई। कोर्ट ने कहा कि इतने कम अंतराल पर बार-बार याचिका डालना यह दर्शाता है कि वकील अपनी पसंद की बेंच या अनुकूल आदेश पाने की कोशिश (Bench Hunting / Forum Shopping) कर रहे थे।

अदालती कार्यवाही का अनादर: बहस पूरी होने के बाद जब जज आदेश सुनाने लगे, तो वकील ने स्थगन (Adjournment) की मांग की। कोर्ट ने इस रवैये को अवमानना (Contempt) के योग्य माना, लेकिन नरमी बरतते हुए केवल ₹2,000 का जुर्माना लगाकर छोड़ दिया।

केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)

कानूनी पैरामीटरसुप्रीम कोर्ट का मामलाइलाहाबाद हाई कोर्ट का मामला
माननीय न्यायाधीशजस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारियाजस्टिस कृष्ण पहल
लगाया गया जुर्माना₹10,000 (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया)₹2,000 (वकील के आचरण के लिए बरकरार)
मुख्य मुद्दावकीलों की तैयारी न होने पर केस को बिना सुने खारिज करना गलत।बार-बार जमानत अर्जी डालकर ‘बेंच हंटिंग’ करना गलत।
अदालत का संदेशतकनीकी खामियों पर substantive न्याय की जीत होनी चाहिए।न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

निष्कर्ष (Takeaway)

दोनों ही फैसले देश की न्याय प्रणाली में वकीलों की भूमिका और अदालतों के दृष्टिकोण को संतुलित करते हैं। जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि वकीलों की आपसी संवादहीनता के कारण किसी नागरिक का न्याय पाने का अधिकार न छीना जाए, वहीं इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि वकीलों को अपनी मर्जी के मुताबिक आदेश पाने के लिए अदालती प्रक्रियाओं और बेंचों के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

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