Child Protection: दिल्ली सरकार ने राजधानी के सभी 5,633 स्कूलों में जुलाई के अंत तक बाल संरक्षण समितियां (Child Protection Committees) गठित करने का बड़ा एलान किया है।
पड़ताल में जमीनी हकीकत यह है कि बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली वैधानिक संस्था दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) पिछले तीन साल (जुलाई 2023) से खाली पड़े 7 पदों को भरने में नाकाम रही है। इस ढुलमुल रवैये को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट भी सरकार को कई बार फटकार लगा चुका है।
जुलाई के अंत तक सभी 5,633 स्कूलों में बनेंगी समितियां
सरकार द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सोमवार को राज निवास में एक हाई-लेवल रिव्यू मीटिंग की।
स्थायी व्यवस्था: बैठक में निर्देश दिए गए कि बाल संरक्षण पहलों को सभी शैक्षणिक संस्थानों के कामकाज का स्थायी और अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
डेडलाइन: दिल्ली के सभी 5,633 स्कूलों में जुलाई के अंत तक इन कमेटियों का गठन करने का आदेश दिया गया है।
दायरा: इसमें दिल्ली सरकार, एमसीडी (MCD) और सभी प्राइवेट स्कूल शामिल होंगे।
हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी: कछुआ चाल चलनी है, तो कानून ही खत्म कर दो
इससे पहले फरवरी में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग (WCD) को कड़ी फटकार लगाई थी। एक डिवीजन बेंच ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि “अगर सरकार को इसी कछुआ चाल से काम करना है, तो उसे बाल अधिकार संरक्षण (CPCR) अधिनियम को ही निरस्त (Repeal) कर देना चाहिए।”
तारीखों का खेल: क्यों अटकी हैं नियुक्तियां?
फरवरी 2026: सरकार ने कोर्ट से अप्रैल तक का समय मांगा और दलील दी कि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए वक्त लग रहा है।
अप्रैल 2026: सरकार ने चुने गए उम्मीदवारों के नोटिफिकेशन के लिए 6 हफ्ते का अतिरिक्त समय मांग लिया।
2 जुलाई 2026: सरकार ने नया हलफनामा (Affidavit) दायर कर माना कि नियुक्तियां अभी तक नहीं हुई हैं। विभाग ने सिर्फ इतना कहा कि वे “जल्द से जल्द प्रक्रिया पूरी करने के लिए गंभीर प्रयास कर रहे हैं।”
शासन के शोर में बच्चों की आवाज नहीं दबा सकते
इस मामले में कोर्ट की मदद कर रहीं एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) एडवोकेट प्रभासहाय कौर ने मीडिया से बातचीत में कहा, सुप्रीम कोर्ट के 2018 के एक ऐतिहासिक फैसले (सम्पूर्णा बेहुरा बनाम भारत संघ) का हवाला दिया। कहा, “सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने साफ कहा था कि पोक्सो (POCSO) एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट की निगरानी के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर के बाल संरक्षण आयोगों का होना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि हम शासन के शोर-शराबे में बच्चों की आवाज को नहीं दबा सकते।”

