Monday, August 10, 2026
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CISF News: क्या आपराधिक मामले में डिस्चार्ज होने के बाद विभागीय जांच जारी रह सकती है?…सीआईएसएफ सीनियर कमांडेंट केस से जानिए

CISF News: दिल्ली हाईकोर्ट ने अर्धसैनिक और सशस्त्र बलों (Armed Forces) में अनुशासन और बल की साख को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

निलंबित सीनियर कमांडेंट की दो याचिकाओं पर सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतसिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक निलंबित सीनियर कमांडेंट की दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही कोर्ट ने कानून के इस स्थापित सिद्धांत को फिर दोहराया कि आपराधिक मामले (Criminal Case) में बरी या डिस्चार्ज होने मात्र से विभागीय जांच पर रोक नहीं लगती। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बल सदस्य या अधिकारी के किसी कृत्य (कमीशन) या चूक (ओमिशन) से सशस्त्र बल की प्रतिष्ठा और छवि धूमिल (Lowering the image) होती है, तो उसे विभागीय जांच (Departmental Enquiry) में चार्जशीट का मुख्य आधार बनाया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि: कार में ड्रग्स प्लांट करने का गंभीर आरोप

यह मामला सीआईएसएफ के एक शीर्ष रैंक के अधिकारी से जुड़ा है, जिनका आचरण बल की छवि के विपरीत पाया गया।

क्या था मामला? याचिकाकर्ता सीआईएसएफ (CISF) में सीनियर कमांडेंट के पद पर तैनात थे। उन्हें दिल्ली पुलिस ने उनके एक वकील दोस्त के साथ मिलकर एक व्यक्ति (अमित सावंत) की कार में 52 पैकेट चरस (वजन 560 ग्राम) प्लांट (साजिश के तहत रखने) और उन्हें झूठे केस में फंसाने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

विभागीय कार्रवाई: इस गिरफ्तारी के बाद विभाग ने उन्हें निलंबित (Suspend) कर दिया और केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965 [CCS(CCA) Rules] के नियम 14 के तहत विभागीय कार्यवाही शुरू कर दो आरोप (Articles of Charge) तय किए।

कमांडेंट की दलील: याचिकाकर्ता ने अपनी चार्जशीट और निलंबन को कोर्ट में चुनौती दी। उनके वकील तुषार रंजन मोहंती ने मुख्य विधिक तर्क यह दिया कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी को ‘कदाचार’ (Misconduct) नहीं माना जा सकता और न ही इसे चार्जशीट का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसके अलावा, अंतरिम अवधि में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) ने उन्हें आपराधिक मामले के सभी आरोपों से डिस्चार्ज (मुक्त) कर दिया था, इसलिए विभागीय जांच का आधार ही खत्म हो गया।

सरकार का पक्ष: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने सरकार और बल का पक्ष रखते हुए कार्रवाई को विधिक रूप से सही ठहराया।

हाई कोर्ट का कानूनी दृष्टिकोण: कदाचार और छवि पर चोट

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के तर्कों को विधिक रूप से कमजोर पाते हुए निम्नलिखित सिद्धांत स्पष्ट किए।

बल की छवि खराब करना सबसे बड़ा कदाचार

अदालत ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि गिरफ्तारी या आपराधिक कृत्य से इमेज खराब होना चार्जशीट का विषय नहीं हो सकता। “इस बात पर कोई विवाद या दो राय नहीं हो सकती कि यदि कोई कर्मचारी अपने किसी भी कृत्य या चूक के कारण बल (Force) की अच्छी छवि को धूमिल करता है, तो निश्चित रूप से उसे विभागीय जांच में आरोप पत्र (Charge-sheet) का विषय बनाया जा सकता है।”

आपराधिक कोर्ट से बरी होना, विभागीय जांच से मुक्ति नहीं

अदालत ने विधिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि क्रिमिनल ट्रायल और विभागीय जांच, दोनों का मानक और दायरा बिल्कुल अलग होता है। “यह कानून की एक स्थापित स्थिति (Settled Position of Law) है कि कर्मचारी के आपराधिक मामले में बरी (Acquittal) या डिस्चार्ज होने के बाद भी विभागीय जांच आगे बढ़ सकती है। अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) यह तय करने के लिए स्वतंत्र है कि ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष का चार्जशीट पर क्या प्रभाव पड़ता है।”

निलंबन की प्रक्रिया पूरी तरह विधिक

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के निलंबन का आदेश सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित किया गया था और यह निलंबन की प्रारंभिक 90 दिनों की अवधि समाप्त होने से बहुत पहले मंजूर हुआ था, इसलिए प्रक्रियात्मक रूप से इसमें कोई खामी नहीं है।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांदिल्ली उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतसिंह अरोड़ा (खंडपीठ)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता के लिए एडवोकेट तुषार रंजन मोहंती; प्रतिवादी (सरकार) के लिए एएसजी चेतन शर्मा
संबंधित वैधानिक कानूनकेंद्रीय सिविल सेवा (CCA) नियम, 1965 का नियम 14
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या बल की छवि खराब करने को चार्जशीट का आधार बनाया जा सकता है? क्या आपराधिक मामले में डिस्चार्ज होने के बाद विभागीय जांच जारी रह सकती है?
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका का निपटारा; अनुशासनात्मक प्राधिकारी को कानून के अनुसार आगे बढ़ने की छूट। याचिकाकर्ता को प्राधिकारी के समक्ष ट्रायल कोर्ट के फैसले को रखने का अधिकार।
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