Cataract Surgery: बिहार राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने आंख के ऑपरेशन के बाद मरीजों के पर्चे और बिलों में की जाने वाली हेरफेर को लेकर एक डॉक्टर को भ्रामक और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी पाया है।
जिला उपभोक्ता फोरम के आदेश को संशोधन कर सुनाया फैसला
राज्य आयोग के अध्यक्ष जस्टिस संजय कुमार और सदस्य राम प्रवेश दास की पीठ ने 5 मई 2026 को जिला उपभोक्ता फोरम के पुराने आदेश में संशोधन करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने कर्मचारियों की गलती के पीछे छिपने वाले डॉक्टरों को कड़ा संदेश देते हुए कहा, विपक्षी दल (डॉक्टर) ने खुद यह स्वीकार किया है कि मेडिकल पर्चे (Prescription) पर लेंस का रैपर और सीरियल नंबर बाद में चिपकाया जाना उनके ही किसी कर्मचारी की एक शरारतपूर्ण, कुख्यात और अनधिकृत करतूत थी। लेकिन इस कृत्य को अनदेखा या माफ नहीं किया जा सकता।
मुंगेर के डाॅक्टर के खिलाफ आया था मामला
आयोग ने मुंगेर के एक डॉक्टर को आदेश दिया है कि वह पीड़िता को ₹75,000 का भुगतान करे, क्योंकि डॉक्टर के स्टाफ ने पर्चे पर दूसरे लेंस का रैपर और सीरियल नंबर अवैध रूप से चिपका दिया था, जिससे मरीज के मन में गंभीर भ्रम पैदा हुआ। आयोग ने कहा, डॉक्टर अपने कर्मचारी के ऐसे कुकर्मों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। यह शिकायतकर्ता के मन में भ्रम पैदा करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास था, जो सीधे तौर पर ‘गलत बयानी’ और ‘दोषपूर्ण व्यापार व्यवहार’ के दायरे में आता है।
मामला क्या था? (Tecnis ब्रांड के पैसे लिए, लगाया Alcon का लेंस)
यह कानूनी विवाद मुंगेर की एक महिला मरीज और डॉ. सुभाष बल्लभ विजेता के बीच साल 2018 से चल रहा है।
बेहतर लेंस की मांग: दिसंबर 2018 में महिला अपने बेटे जितेंद्र कुमार के साथ आंख के इलाज के लिए डॉ. विजेता के क्लिनिक पहुंची। डॉक्टर ने बाईं आंख में लेंस प्रत्यारोपण (Lens Implantation) की सलाह दी। मरीज ने सबसे अच्छी क्वालिटी के ‘टेक्निस आईओएल’ (Tecnis IOL) लेंस की मांग की और इसके लिए ₹23,000 नकद जमा किए।
रैपर देने में आनाकानी और गड़बड़ी: ऑपरेशन के बाद जब मरीज के बेटे ने लगे हुए लेंस का खाली पैकेट (Bag/Wrapper) मांगा, तो क्लिनिक ने नहीं दिया। करीब 40 दिन बाद जब महिला ने रोशनी कम होने की शिकायत की, तो डॉक्टर ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए कोलकाता रेफर कर दिया।
सीरियल नंबर का मिसमैच: महिला के बेटे ने जब डॉक्टर के पर्चे, कैश रसीद और बाद में मिले लेंस के विवरण का मिलान किया, तो सीरियल नंबरों में भारी अंतर (Mismatch) मिला। पीड़िता का आरोप था कि डॉक्टर ने ‘टेक्निस’ के पैसे लेकर चुपके से कम कीमत वाला ‘अल्कॉन’ (Alcon IOL) लेंस लगा दिया।
डॉक्टर का अजीबोगरीब बचाव और कोर्ट का रुख
डॉक्टर ने जिला फोरम के 2024 के उस फैसले को राज्य आयोग में चुनौती दी थी, जिसमें उन पर कुल 4.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था। डॉक्टर की दलीलें थीं कि ऑपरेशन के दौरान उन्होंने मरीज की आंख के लिए ‘अल्कॉन’ लेंस को अधिक उपयुक्त पाया और वही लगाया, जिसकी एंट्री बिल में थी। पर्चे पर जो ‘टेक्निस’ लेंस का रैपर और सीरियल नंबर बाद में चिपका हुआ मिला, वह उनके किसी स्टाफ की ‘शरारत’ (Mischievous Act) थी, इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी। राज्य उपभोक्ता आयोग ने डॉक्टर की इस दलील को तो स्वीकार किया कि ऑपरेशन के समय सही लेंस चुनने का अधिकार डॉक्टर का है, लेकिन पर्चे पर फर्जी रैपर चिपकाकर मरीज को गुमराह करने के लिए सीधे डॉक्टर को जिम्मेदार ठहराया।
विश्लेषण: मुआवजा राशि में संशोधन (The Revised Matrix)
राज्य आयोग ने जिला फोरम (मुंगेर) के आदेश को आंशिक रूप से बदलते हुए मुआवजे की राशि को तार्किक बनाया। आयोग ने पाया कि पुख्ता मेडिकल सबूतों (Evidence) के अभाव में यह साबित नहीं हो सका कि महिला की आंखों की रोशनी डॉक्टर की लापरवाही के कारण ही गई थी, इसलिए रोशनी जाने का ₹3 लाख का मुआवजा हटा दिया गया, लेकिन धोखाधड़ी के लिए जुर्माना बरकरार रखा।
| जिला फोरम का पुराना आदेश (2024) | राज्य उपभोक्ता आयोग का अंतिम फैसला (2026) |
| रोशनी जाने का मुआवजा: ₹3,00,000 | खारिज (Set Aside): पर्याप्त मेडिकल साक्ष्यों की कमी के कारण इसे रद्द किया गया। |
| शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना: ₹1,00,000 | संशोधित: भ्रामक विज्ञापन और गलत बयानी के लिए ₹50,000 का मुआवजा मंजूर। |
| मुकदमेबाजी का खर्च: ₹50,000 | संशोधित: कानूनी लड़ाई के खर्च के रूप में ₹25,000 देने का निर्देश। |
| कुल देय राशि: ₹4,50,000 | कुल संशोधित देय राशि: ₹75,000 (डॉक्टर को हर हाल में देना होगा)। |

