Monday, August 17, 2026
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Compensation Act: कर्मचारियों के मुआवजा कानून में ‘ आश्रित ’ की परिभाषा में संशोधन जरूरी…जाने अहम टिप्पणी

Compensation Act: सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 (Employees’ Compensation Act, 1923) में ‘आश्रित’ (dependent) की परिभाषा में संशोधन की सिफारिश की है।

कानून आयोग (Law Commission of India) मामले में विचार और संशोधन करें

अदालत ने कहा कि वर्तमान परिभाषा में ‘वयस्क विधवा बहन’ (major widowed sister) को मुआवजा पाने के अधिकार से बाहर रखा गया है, जो आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में “पुरानी और अव्यवहारिक” व्याख्या है। न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि यह मुद्दा कानून आयोग (Law Commission of India) के पास विचार और संशोधन हेतु भेजा जाए।

मामला क्या था

मामला एक मजदूर की मृत्यु के बाद उसकी दो विधवा बहनों को मुआवजा मिलने से जुड़ा था। बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने यह कहते हुए आदेश को चुनौती दी कि विधवा बहनें उस समय ‘वयस्क’ थीं, इसलिए वे कानून की परिभाषा के अनुसार ‘आश्रित’ नहीं मानी जा सकतीं। अदालत ने कंपनी की अपील खारिज करते हुए कहा कि मुआवजा देने का हाईकोर्ट का फैसला सही है।

मौजूदा कानून में क्या लिखा है

धारा 2(1)(d)(iii)(d) के तहत ‘आश्रित’ में शामिल हैं — “नाबालिग भाई या अविवाहित बहन या यदि नाबालिग हो तो विधवा बहन।” इसका मतलब यह हुआ कि केवल ‘नाबालिग विधवा बहन’ को ही आश्रित माना गया है।

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

पीठ ने कहा, “आज के समय में किसी नाबालिग विधवा बहन का होना लगभग असंभव है, खासकर 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम के बाद। इसलिए यह परिभाषा अब व्यवहारिक नहीं रही।” अदालत ने माना कि शाब्दिक (literal) व्याख्या अब “पुरातन (archaic)” हो चुकी है और इसे वास्तविक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप बदला जाना चाहिए। “इस पृष्ठभूमि में यह उचित होगा कि यह विषय कानून आयोग के समक्ष रखा जाए, ताकि 1923 के अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए जा सकें और वयस्क विधवा बहन को भी आश्रित की परिभाषा में शामिल किया जा सके।”

सरकार को भेजा गया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इस आदेश की प्रति कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को भेजी जाए, ताकि वे इसे कानून आयोग की अध्यक्ष को आगे विचारार्थ प्रेषित करें।”

अदालत ने मुआवजा बरकरार रखा

हालांकि अदालत ने कानून की व्याख्या पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह साफ किया कि विधवा बहनों को मुआवजा देने का आदेश बरकरार रहेगा, और इस विषय पर कानूनी स्पष्टता भविष्य में संशोधन के माध्यम से लाई जानी चाहिए। इस फैसले को “सामाजिक यथार्थ और कानून के बीच संतुलन स्थापित करने वाला निर्णय” माना जा रहा है, जो बदलते पारिवारिक ढांचे को ध्यान में रखते हुए ‘आश्रित’ की परिभाषा को आधुनिक संदर्भ में देखने की जरूरत पर जोर देता है।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CIVIL APPELLATE JURISDICTION
CIVIL APPEAL NO.2574 OF 2011
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