Tuesday, August 4, 2026
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Maintenance Principles: पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण तय करने के नियम तय करें अदालतें…दिल्ली हाईकोर्ट

Maintenance Principles: हाईकोर्ट ने कहा, बिना ठोस कारण और आय के आकलन के न दें मेंटेनेंस आदेश, जल्दबाजी से हो सकता है अन्याय।

भरण-पोषण संबंधी आदेश कारण-सहित और तर्कसंगत दें

दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण (मेंटेनेंस) तय करते समय अपनाए जाने वाले प्रमुख सिद्धांतों को स्पष्ट किया और राजधानी की फैमिली व महिला अदालतों को आदेश दिए कि वे भरण-पोषण संबंधी आदेश कारण-सहित और तर्कसंगत दें। जस्टिस स्वरना कांत शर्मा ने कहा कि वैवाहिक विवादों में दिए जाने वाले अंतरिम भरण-पोषण के आदेश अनुमान या अटकलों पर नहीं, बल्कि आय और परिस्थितियों के स्पष्ट आकलन पर आधारित होने चाहिए।

कोर्ट ने इन पर स्पष्ट देने की बात कही

“संक्षिप्त आदेश देना स्वीकार्य है, लेकिन बिना तर्क के आदेश नहीं। आदेश में यह स्पष्ट होना चाहिए कि —
(i) आय आंकने के लिए किन दस्तावेजों व सामग्री पर भरोसा किया गया,
(ii) कितनी आय या कमाई की क्षमता मानी गई, और
(iii) तय राशि के पीछे क्या आधार या तर्क है।”

पति की याचिका खारिज, मामला दोबारा विचार के लिए फैमिली कोर्ट को भेजा

जस्टिस शर्मा यह टिप्पणी उस याचिका पर कर रही थीं जिसमें पति ने परिवार न्यायालय द्वारा पत्नी और बेटे के लिए ₹20,000 मासिक भरण-पोषण तय करने के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने यह आदेश रद्द कर मामला नए सिरे से विचार के लिए फैमिली कोर्ट को भेज दिया। कोर्ट ने कहा कि, भरण-पोषण तय करने का पहला और सबसे अहम कदम है माता-पिता की आय का सही आकलन। जब तक यह स्पष्ट न हो कि कमाने वाला जीवनसाथी वास्तव में कितना कमा रहा है या कमा सकता है, तब तक न्यायसंगत और अनुपातिक राशि तय नहीं की जा सकती।”

“मेंटेनेंस आदेश सिर्फ औपचारिकता नहीं”

हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का आदेश महज औपचारिकता नहीं, बल्कि यह उस व्यक्ति की तात्कालिक आजीविका से जुड़ा मुद्दा है जो खुद की जरूरतें पूरी करने में सक्षम नहीं है। इसमें देरी या लापरवाही कमजोर पक्ष को बुनियादी जीवन से वंचित कर सकती है। कोर्ट ने आगे कहा कि पत्नी के पहले नौकरी करने या शिक्षित होने का अर्थ यह नहीं कि वह आज भी आर्थिक रूप से सक्षम है। वर्षों तक परिवार और बच्चों की देखभाल करने के बाद उसकी रोजगार-क्षमता पर असर पड़ता है। “सिर्फ इसलिए मेंटेनेंस कम या नकारा नहीं जा सकता कि पत्नी शादी से पहले काम करती थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति से अलग रहने के बाद पत्नी अपने माता-पिता के साथ रह रही है, यह मेंटेनेंस घटाने या रोकने का आधार नहीं बन सकता।

अदालतों को भेजी जाएगी कॉपी

अंत में जस्टिस शर्मा ने कहा, “उम्मीद है कि परिवार और महिला अदालतें इन दिशानिर्देशों को ध्यान में रखेंगी।” हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति दिल्ली के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को भेजी जाए ताकि वे इसे विशेष रूप से परिवार न्यायालयों के जजों तक पहुंचाएं। साथ ही, निर्णय की कॉपी दिल्ली न्यायिक अकादमी के निदेशक (एकेडमिक्स) को भी भेजने का निर्देश दिया गया ताकि इसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल किया जा सके।

IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
CRL.REV.P.(MAT.) 123/2024 & CRL.M.A. 36001/2024,
CRL.M.A. 3589/2025
TASMEER QURESHI versus ASFIA MUZAFFAR

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