Thursday, October 1, 2026
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Church Of South India: क्रोध या प्रतिशोध की भावना से चर्च को मुकदमों में न घसीटें; आंतरिक विवादों को सुलह और शांति से निपटाएं, चुनाव विवाद में सिंगल जज का फैसला पलटा

मुख्य संकेतक (Key Indicators)

  • अदालत की नैतिक व कानूनी सलाह:खंडपीठ ने कहा कि CSI के पदाधिकारी या सदस्य लोक सेवक (Public Servants) के रूप में कार्य करने के लिए पंजीकृत नहीं हैं। वे अपनी आस्था से बंधे हैं।“प्रतिशोध से कार्य करना, गुस्सा जाहिर करना, शत्रुता से काम करना या दूसरों को कष्ट देना अथवा प्रतिद्वंद्वी मुकदमेबाजी में शामिल होकर चर्च को सार्वजनिक विवाद में खींचना उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है, खासकर तब जब सुलह का रास्ता हमेशा उपलब्ध हो।”
  • विवाद की पृष्ठभूमि:तिरुनेलवेली डिओसेसन काउंसिल का कार्यकाल अप्रैल 2024 में समाप्त हो गया था। नए चुनाव न होने पर, मई 2025 में CSI सिनोड (Synod) ने एक आंतरिक आदेश जारी कर अस्थायी रूप से प्रबंधन और चुनाव कराने के लिए एक प्रशासनिक समिति गठित की।इसे तीन सदस्यों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद सिंगल जज ने एक सेवानिवृत्त जज को प्रशासक (Administrator) नियुक्त कर दिया था।
  • अनुच्छेद 226 के तहत क्षेत्राधिकार पर फैसला:डिवाइजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि सिनोड का पत्र एक आंतरिक पत्र व्यवहार था, जिसमें कोई सार्वजनिक कर्तव्य (Public Duty) या लोक तत्व शामिल नहीं था। इसलिए इसके खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका पोषणीय (Maintainable) नहीं थी।
  • बड़ी पीठ (Full Bench) के फैसले के पुनरीक्षण की सिफारिश:खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस फैसले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखे, ताकि 2024 के फुल बेंच फैसले (D Bright Joseph v. Church of South India) के उस कानूनी सिद्धांत पर फिर से विचार करने के लिए एक बड़ी पीठ का गठन किया जा सके कि क्या CSI के आंतरिक पत्रों के खिलाफ रिट दायर की जा सकती है।

चेन्नई: धार्मिक संस्थाओं के आंतरिक प्रशासनिक विवादों, चर्च संविधान के विधिक दर्जे और अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) की सीमाओं पर मद्रास हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संतुलित और महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने CSI तिरुनेल्वली डायोसीज (Tirunelveli Diocese) के प्रशासन और चुनाव से जुड़ी अपीलों के समूह पर फैसला सुनाते हुए एकल पीठ (Single Judge) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत चुनाव कराने के लिए एक सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज को प्रशासक नियुक्त किया गया था। खंडपीठ ने दो-टूक व्यवस्था दी कि चर्च या धर्मसभा (Synod) का कोई भी पदाधिकारी ‘लोक सेवक’ (Public Servant) नहीं है और न ही आंतरिक प्रशासनिक पत्राचार किसी ‘सार्वजनिक कर्तव्य’ (Public Duty) का निर्वहन करता है, अतः ऐसी आंतरिक प्रक्रियाओं पर अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करना विधिक रूप से अनुचित है। उच्च न्यायालय ने चर्च ऑफ साउथ इंडिया (CSI) और उसके सदस्यों से आह्वान किया है कि वे प्रतिशोध (Vengeance) या गुस्से की भावना से मुकदमों का सहारा लेने के बजाय अपने आंतरिक विवादों को आपसी समझ, सुलह और शांति से हल करें।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘क्रोध और प्रतिशोध को शांत करने का जरिया नहीं हो सकती मुकदमेबाजी’ न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल की खंडपीठ ने अपने आदेश में पक्षकारों को उनके धार्मिक मूल्यों और संविधान की याद दिलाते हुए कहा: *”न तो चर्च ऑफ साउथ इंडिया (CSI), न ही इसकी धर्मसभा (Synod), न ही धर्मसभा का कोई पदाधिकारी, न ही तिरुनेल्वली डायोसीज और न ही इसका कोई सदस्य लोक सेवक के रूप में कार्य करने के लिए पंजीकृत है। वे अपनी धार्मिक आस्था (Faith) से बंधे हैं। जब समाधान और सुलह (Reconciliation) का मार्ग सदैव उपलब्ध है, तो प्रतिशोध की भावना से कार्य करना, क्रोध व्यक्त करने के लिए अदालतों की शरण लेना, शत्रुतापूर्ण व्यवहार करना, दूसरों के लिए कष्ट पैदा करना या चर्च को एक दूसरे के खिलाफ मुकदमेबाजी (Adversarial Litigation) में घसीटकर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाना उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है।”*

पीठ ने आगे जोड़ा: “जिस आस्था का पालन करने के लिए रिट याचिकाकर्ता सुख, दुख, शत्रुता या क्रोध के समय भी स्वयं को प्रतिबद्ध मानते हैं, वह उन्हें केवल एक ही मार्ग दिखाती है—क्षमा करना, विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाना और शांति व सद्भाव को बढ़ावा देना। यदि वे चर्च ऑफ साउथ इंडिया के संविधान में प्रदान किए गए विवाद समाधान के वैकल्पिक मार्ग की अनदेखी करते हैं, तो यह कतई उचित नहीं है।”

2. आंतरिक धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम (Judicial Restraint):

  • अदालत ने जोर देकर कहा कि संवैधानिक अदालतों को धार्मिक निकायों के निजी और आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए:“न्यायालय को पूर्ण न्यायिक संयम (Judicial Restraint) बरतना चाहिए। आंतरिक धार्मिक मामलों में न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप से पूरी तरह बचा जाना चाहिए।”

3. सार्वजनिक कर्तव्य का अभाव और अनुच्छेद 226 की सीमाएं:

  • खंडपीठ ने माना कि सिनॉड द्वारा अस्थायी प्रशासनिक समिति गठित करने के लिए जारी किया गया संचार पत्र पूरी तरह से एक आंतरिक प्रशासनिक पत्राचार (Internal Communication) था।
  • इसमें किसी भी प्रकार के सार्वजनिक कार्य (Public Function) या वैधानिक कर्तव्य का कोई तत्व शामिल नहीं था। इसलिए एकल न्यायाधीश द्वारा अनुच्छेद 226 के असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर आंतरिक चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना और रिटायर्ड जज को प्रशासक नियुक्त करना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था।

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बड़ी पीठ (Larger Bench) को संदर्भ: 2024 के ‘डी. ब्राइट जोसेफ’ फैसले पर पुनर्विचार की मांग

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण विधिक पहलू यह है कि खंडपीठ ने CSI के आंतरिक पत्राचार के खिलाफ रिट याचिकाओं की पोषणीयता (Maintainability) के व्यापक कानूनी प्रश्न को पुनर्विचार हेतु मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा है:

  • विधिक टकराव: मद्रास उच्च न्यायालय की 2024 की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने डी. ब्राइट जोसेफ बनाम चर्च ऑफ साउथ इंडिया मामले में कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में रिट पोषणीय मानी थी।
  • पुनर्विचार का आग्रह: खंडपीठ ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस निर्णय को मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, ताकि वे यह तय करने के लिए एक बड़ी पीठ (Larger Bench) का गठन कर सकें कि क्या किसी सार्वजनिक कर्तव्य या सार्वजनिक तत्व (Public Element) के अभाव में भी आंतरिक CSI संचार के विरुद्ध अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिकाएं विचारणीय हो सकती हैं।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

  • तिरुनेल्वली डायोकेसन काउंसिल चुनाव: तिरुनेल्वली डायोकेसन काउंसिल का कार्यकाल अप्रैल 2024 में समाप्त हो गया था, परंतु समय पर नए चुनाव संपन्न नहीं कराए जा सके।
  • मई 2025 का सिनॉड आदेश: कार्यकाल समाप्त होने के बाद, CSI सिनॉड ने मई 2025 में एक आधिकारिक संचार जारी कर डायोसीज के अस्थायी प्रबंधन और नए चुनाव कराने के लिए एक तदर्थ प्रशासनिक समिति (Administrative Committee) नियुक्त कर दी।
  • एकल पीठ का आदेश: चर्च के तीन सदस्यों ने इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए रिट याचिकाएं दायर कीं। एकल न्यायाधीश ने याचिकाओं को स्वीकार करते हुए चुनाव कराने के लिए हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को प्रशासक नियुक्त कर दिया था।
  • डिवीजन बेंच का अंतिम निर्णय: खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को निरस्त कर दिया, मूल रिट याचिकाओं, अवमानना याचिका और सभी संबद्ध अंतरिम आवेदनों को पूरी तरह खारिज कर दिया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: चर्च ऑफ साउथ इंडिया बनाम सेल्वा कुमार व अन्य [रिट अपील समूह – मद्रास उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ चेन्नई]
  • पीठ: न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल (खंडपीठ)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • रिट याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता वी. प्रभाकर (साथ में अधिवक्ता एन.जे. रामचंद्रन एवं के. कवियरसन)
    • चर्च ऑफ साउथ इंडिया (CSI) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता वी. प्रकाश (निर्देशन: अजमल एसोसिएट्स)
    • तिरुनेल्वली डायोसीज की ओर से: अधिवक्ता पी.पी. एल्विन बालन
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार – ‘अन्य प्राधिकरण’ और ‘सार्वजनिक कर्तव्य’ का सिद्धांत)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 25 एवं 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन और अंतःकरण की स्वतंत्रता)
    • चर्च ऑफ साउथ इंडिया का संविधान (विवाद निपटान और सुलह तंत्र)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • डी. ब्राइट जोसेफ बनाम चर्च ऑफ साउथ इंडिया (2024, मद्रास हाईकोर्ट फुल बेंच) — ‘CSI के विरुद्ध रिट की पोषणीयता’ (जिस पर वर्तमान पीठ ने पुनर्विचार हेतु संदर्भ की सिफारिश की है)।
    • जी. बस्सी रेड्डी बनाम इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कोई निकाय किसी वैधानिक दायित्व या सार्वजनिक कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है, तो उसके आंतरिक प्रशासनिक निर्णयों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी नहीं की जा सकती।’
    • रामकृष्ण मिशन बनाम कानी कनिमुनि (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘निजी और आंतरिक विवादों में सार्वजनिक कानून (Public Law Remedy) लागू नहीं होता।’
  • अंतिम निर्णय: रिट अपीलें स्वीकार; सिंगल जज द्वारा रिटायर्ड जज की प्रशासक के रूप में नियुक्ति रद्द; मूल रिट याचिकाएं खारिज; मामले को बड़ी पीठ के गठन हेतु मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित किया गया।

Church Of South India: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठन्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन एवं न्यायमूर्ति आर. शक्तिवेल
संबंधित संस्थाचर्च ऑफ साउथ इंडिया (CSI) – तिरुनेलवेली सूबा
मुख्य मुद्दाक्या गैर-सरकारी धार्मिक निकाय (CSI) के आंतरिक प्रशासनिक पत्रों के खिलाफ अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका (Writ Petition) सुनवाई योग्य है?
अदालत का फैसलासिंगल जज के फैसले को रद्द किया; धार्मिक संस्थाओं के आंतरिक मामलों में संयम बरतने का निर्देश दिया।
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