Monday, August 10, 2026
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Court Guidelines: सिर्फ शक के आधार पर संपत्ति कुर्क नहीं कर सकती पुलिस…BNSS की धारा 107 पर सख्त गाइडलाइंस यहां जानिए

Court Guidelines: कोलकाता हाईकोर्ट ने नई आपराधिक न्याय प्रणाली के तहत पुलिस और निचली अदालतों को मिली शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस अजय कुमार मुखर्जी की एकल पीठ ने दो अलग-अलग मामलों में आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि ट्रायल (मुकदमे) के पूरा होने से पहले ही संपत्ति कुर्क करने की शक्ति बहुत व्यापक है। यदि इसका उपयोग बिना ठोस सबूतों या लापरवाही से किया गया, तो यह नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर संपत्ति के अधिकार (Right to Property) का हनन होगा। अदालत ने ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023’ (BNSS) की धारा 107 के तहत जांच के दौरान संपत्तियों को मनमाने ढंग से कुर्क (Attach) करने की प्रवृत्ति पर पुलिस और ट्रायल कोर्ट को कड़ी चेतावनी दी है।

‘संदेह’ और ‘विश्वास का कारण’ (Reason to Believe) में क्या अंतर है?

अदालत ने करोड़ों रुपये के वित्तीय गबन (Financial Misappropriation) से जुड़े एक मामले में निचली अदालत द्वारा कुर्की आदेश को रद्द करने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए ‘शक’ और ‘विधिक विश्वास’ के अंतर को समझाया।

शक (Suspicion) काफी नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘संदेह’ या ‘शक’ संतुष्टि का एक बहुत निचला स्तर है, जिसके आधार पर न तो किसी को गिरफ्तार किया जा सकता है और न ही संपत्ति कुर्क हो सकती है।

विश्वास का कारण (Reason to Believe) ठोस होना चाहिए: BNSS की धारा 107 में इस्तेमाल शब्द ‘विश्वास का कारण’ का पैमाना बहुत ऊंचा है। यह किसी ठोस साक्ष्य (Evidence-based) पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल अनुमान या अटकलों (Speculative) पर। पुलिस के पास मौजूद सामग्री और उनके निष्कर्ष के बीच एक तार्किक संबंध होना चाहिए।

अरविंद केजरीवाल केस की नजीर: चुन-चुन कर सबूत नहीं दिखा सकती पुलिस

उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरविंद केजरीवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय (ED) मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए जांच एजेंसियों को अपनी मर्जी से साक्ष्य चुनने (Selective Reliance) के खिलाफ आगाह किया। जांच एजेंसियां ‘विश्वास का कारण’ बनाते समय केवल अपनी पसंद या मर्जी से काम नहीं कर सकतीं। अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकती कि वह केवल आरोपी को फंसाने वाली सामग्री (Incriminating Materials) को चुन ले और उसे बेगुनाह साबित करने वाले सबूतों (Exculpatory Evidence) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दे। शक्तियों का प्रयोग किसी की सनक या पसंद-नापसंद पर आधारित नहीं हो सकता। एजेंसियों को पूरी सामग्री का निष्पक्ष मूल्यांकन (Fair Evaluation) करना होगा, न कि केवल अभियोजन (Prosecution) के पक्ष की।

हाई कोर्ट द्वारा जारी की गई 8 सूत्रीय गाइडलाइंस (Guidelines)

अदालत ने भविष्य के लिए कुछ कड़े मार्गदर्शक सिद्धांत (Principles) तय किए हैं, जिनका पालन हर अदालत और पुलिस अधिकारी को धारा 107 BNSS का उपयोग करते समय करना होगा।

पर्याप्त आधार: ‘विश्वास का कारण’ किसी ठोस और पर्याप्त आधार पर होना चाहिए, न कि महज संदेह पर।

वस्तुनिष्ठ परीक्षण: अधिकारियों को ‘तार्किक व्यक्ति’ (Reasonable Person) के दृष्टिकोण से मूल्यांकन करना होगा, न कि अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के आधार पर।

स्पष्ट संबंध (Nexus): पुलिस के पास मौजूद सामग्री और इस विश्वास के बीच सीधा संबंध होना चाहिए कि संपत्ति ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) से बनी है।

लिखित कारण: कुर्की के कारणों को लिखित रूप में रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और यह वास्तविक बरामदगी या साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।

सद्भावना (Good Faith): यह निर्णय पूरी तरह सद्भावनापूर्ण होना चाहिए, न कि यांत्रिक (Mechanical) या मनमाने तरीके से।

बेगुनाही के सबूत न छुपाएं: जांच एजेंसियों को आरोपी के पक्ष में जाने वाले साक्ष्यों को भी रिकॉर्ड पर रखना होगा।

निष्पक्ष मूल्यांकन: अदालतों को केवल पुलिस के दावों को सच नहीं मानना है, बल्कि सभी सामग्रियों का निष्पक्ष मूल्यांकन करना होगा।

अंतिम उपाय के रूप में प्रयोग: संपत्ति के अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए इस असाधारण शक्ति का प्रयोग बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए।

बिना नोटिस दिए महिला की संपत्ति कुर्की पर कोर्ट की फटकार

एक अन्य जुड़े हुए मामले में, कलकत्ता हाई कोर्ट ने उस ट्रायल कोर्ट के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया, जिसने एक ऐसी महिला की संपत्ति कुर्क करने की अनुमति दे दी थी जो मामले में आरोपी भी नहीं थी। कोर्ट ने पाया कि महिला को धारा 107(2) और (3) के तहत सुनवाई का कोई मौका (Opportunity of being heard) नहीं दिया गया और न ही कोई नोटिस भेजा गया।

कोर्ट ने कहा कि बिना प्रभावित पक्ष को सुने ‘एकतरफा आदेश’ (Ex-parte Order) केवल अत्यंत दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही पारित किए जाने चाहिए, जहां जल्दबाजी का कोई ठोस और वैध कारण लिखित में मौजूद हो। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सब्यसाची बनर्जी, अयान भट्टाचार्य और सांदीपन गांगुली जैसे वरिष्ठ वकील पेश हुए, जबकि राज्य सरकार का पक्ष लोक अभियोजक (Public Prosecutor) देबाशीष रॉय ने रखा।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांकलकत्ता उच्च न्यायालय की विधिक कार्यवाही (२३ जून, २०२६)
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस अजय कुमार मुखर्जी (एकल पीठ)
मुख्य विधिक प्रावधानभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 107 (Property Attachment)
विवाद का मुख्य विषयबिना ठोस सबूतों और बिना नोटिस दिए (एकतरफा) संपत्ति कुर्क करने की पुलिसिया प्रवृत्ति।
सुप्रीम कोर्ट की नजीरअरविंद केजरीवाल बनाम ईडी (ED) मामला (निष्पक्ष साक्ष्य मूल्यांकन का सिद्धांत)।
कोर्ट का अंतिम आदेशपुलिस और अदालतों के लिए कड़े नियम जारी; बिना नोटिस वाली कुर्की को पूरी तरह रद्द किया।
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