Friday, June 12, 2026
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Criminal Trials: बहस सुने बिना सजा सुनाना फेयर ट्रायल और आर्टिकल 21 का उल्लंघन…वकील न आएं तो अमिकस क्यूरी नियुक्त करें

Criminal Trials: आपराधिक मामलों के मुकदमों में आरोपियों के अधिकारों और ‘फेयर ट्रायल’ (निष्पक्ष सुनवाई) को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मणन की वेकेशन खंडपीठ ने हत्या के एक मामले में निचली अदालत (Trial Court) द्वारा दी गई सजा के फैसले को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया और मामले को वापस (Remit) ट्रायल कोर्ट भेज दिया। अदालत ने साफ किया है कि बचाव पक्ष (Defence) की मौखिक दलीलें/बहस सुने बिना सुनाया गया कोई भी फैसला कानूनी रूप से अमान्य है। यदि आरोपी का वकील कोर्ट में उपस्थित नहीं होता है, तब भी जज सीधे सजा नहीं सुना सकते; उन्हें आरोपी के लिए सरकारी खर्च पर वकील या ‘अमिकस क्यूरी’ (Amicus Curiae) नियुक्त करना होगा।

यह रही अदालत की टिप्पणी

मद्रास हाई कोर्ट ने मौखिक बहस के अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए अपने आदेश में कहा, हम यह दोहराते हैं कि अदालत के सामने खड़े होकर मौखिक बहस (Oral Arguments) करने का अधिकार न केवल एक वैधानिक (Statutory) अधिकार है, बल्कि यह संविधान के तहत एक ‘मौलिक अधिकार’ (Fundamental Right) का रूप ले चुका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मौखिक दलीलें निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। यदि अभियुक्त इस अधिकार का लाभ नहीं उठा पाता है, तो न्याय के व्यापक हित में ट्रायल जज का यह कर्तव्य है कि वह उसके लिए लीगल एड (कानूनी सहायता) वकील या अमिकस क्यूरी (अदालत का मित्र) नियुक्त करे। अपील को डिफ़ॉल्ट (वकील की अनुपस्थिति) के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था? (हाई कोर्ट की समय-सीमा के दबाव में जज ने जल्दबाजी की)

यह पूरा मामला सलेम सेंट्रल जेल (Salem Central Prison) में बंद एक पिता और पुत्र से जुड़ा हुआ है, जिन्हें हत्या के एक मामले में दोषी पाकर जेल भेज दिया गया था।

अंतरिम राहत के लिए आए थे हाई कोर्ट: बेटी की शादी में शामिल होने के लिए पिता-पुत्र ने सजा को अंतरिम रूप से निलंबित (Suspension of Sentence) करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच का दरवाजा खटखटाया था।

हाई कोर्ट ने पकड़ी बड़ी चूक: जब जजों ने मामले की फाइल देखी, तो उन्हें पता चला कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष (Prosecution) की दलीलें तो पूरी सुन ली थीं, लेकिन उसके बाद बचाव पक्ष (आरोपी के वकील) की अंतिम बहस सुने बिना ही अपना फैसला सुना दिया था।

जज की मजबूरी (4 महीने की डेडलाइन): दरअसल, हाई कोर्ट ने ही पहले इस ट्रायल को ४ महीने के भीतर खत्म करने का समयबद्ध (Time-bound) आदेश दिया था। इस डेडलाइन के दबाव में, जब आरोपी के वकील बहस के लिए उपस्थित नहीं हुए, तो ट्रायल जज ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के आधार पर सीधे सजा का फैसला सुना दिया।

मद्रास हाई कोर्ट के प्रमुख कानूनी निष्कर्ष

हाई कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या हाई कोर्ट की समय-सीमा का पालन करने के लिए बचाव पक्ष की बहस के बिना फैसला सुनाया जा सकता है? कोर्ट ने इसका उत्तर “कदापि नहीं” में दिया और निम्नलिखित कानूनी सिद्धांत तय किए।

आर्टिकल 21 और फेयर ट्रायल (Fair Trial): कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Personal Liberty) के तहत एक मौलिक अधिकार है। कोई भी आरोपी चाहकर भी इस अधिकार को छोड़ (Waive) नहीं सकता। अगर उसका वकील नहीं आ रहा, तो कोर्ट को वैकल्पिक व्यवस्था करनी ही होगी।

धारा 235 क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (Section 235 CrPC): कानून की भाषा का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने कहा कि धारा २३५ के अनुसार, जज ‘बहस सुनने के बाद’ ही फैसला सुनाएगा। इसका सीधा मतलब है कि बहस (Arguments) हमेशा फैसले की घोषणा से पहले होनी चाहिए। बिना इसके जज अगले चरण पर नहीं जा सकते।

ट्रायल कोर्ट और अपीलीय कोर्ट की बहस में अंतर: मद्रास हाई कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ (तत्कालीन जज, इलाहाबाद HC) के उस पुराने नजरिए से असमर्थता (Disagree) जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि ट्रायल कोर्ट में बहस छूट गई हो, तो उसकी भरपाई अपीलीय चरण (Appeal Stage) में मौका देकर की जा सकती है।

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि जो विस्तृत और गहन बहस ट्रायल के स्तर पर गवाहों के बयानों को लेकर हो सकती है, वैसी बहस अपील के स्तर पर नहीं की जा सकती। ट्रायल कोर्ट का वकील और अपीलीय अदालत का वकील अलग तरीके से केस रखते हैं, इसलिए यह कमी बाद में पूरी नहीं हो सकती।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

मद्रास हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में ‘फेयर ट्रायल’ के अधिकार का घोर उल्लंघन हुआ है। कोर्ट ने आदेश दिया कि निचली अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द किया जाता है।

मामले को वापस उसी ट्रायल जज के पास केवल बहस के चरण (Hearing Oral Arguments) के लिए भेजा जाता है।

ट्रायल जज दोनों पक्षों को बुलाकर उनकी अंतिम दलीलें सुनेंगे। यदि आरोपी या उसके वकील सहयोग नहीं करते हैं, तो कोर्ट तुरंत एक अमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) नियुक्त कर उनके माध्यम से बहस पूरी कराएगी और फिर नया फैसला जारी करेगी।

विश्लेषण: क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में राइट टू कौंसिल

यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के उन स्तंभों को मजबूत करता है जो यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी व्यक्ति को बिना पूरी सुनवाई के अपराधी घोषित न किया जाए।

कानूनी प्रावधान / अवधारणाकोर्ट की व्यवस्था और इसका महत्व
अनुच्छेद 21 (Article 21)जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में ‘सच्ची और निष्पक्ष कानूनी रक्षा’ का अधिकार शामिल है। बिना बहस के जेल भेजना अवैध है।
अमिकस क्यूरी (Amicus Curiae)यदि कोई आरोपी वकील की फीस नहीं दे सकता या उसका वकील बार-बार कोर्ट से गायब रहता है, तो कोर्ट ‘अदालत का मित्र’ (स्वतंत्र वकील) नियुक्त करने के लिए बाध्य है।
प्रक्रियात्मक शुद्धता बनाम गतिहाई कोर्ट ने साफ किया कि मुकदमों का तेजी से निपटारा (Speedy Trial) जरूरी है, लेकिन न्याय की बलि चढ़ाकर नहीं। समय-सीमा (Deadline) का पालन करने के लिए बुनियादी प्रक्रिया को नहीं छोड़ा जा सकता।
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